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भरतपुर की ऐतिहासिक बगीचियों का बुरा हाल, अखाड़ों की गूंज और पहलवानी की परंपरा अब गुमनामी के साये मेंराजस्थान
17 अक्तू॰ 2026, 4:57 pm (2 घंटे पहले)· 0

भरतपुर की ऐतिहासिक बगीचियों का बुरा हाल, अखाड़ों की गूंज और पहलवानी की परंपरा अब गुमनामी के साये में

भरतपुर की पुरानी बगीचियां जो कभी पहलवानी, सुबह की सैर और मेलजोल का मुख्य केंद्र हुआ करती थीं, वे आज बदहाली और उपेक्षा का शिकार होकर अपनी पहचान खो रही हैं।

राजस्थान के भरतपुर शहर की पहचान केवल प्राचीन किलों, शानदार महलों और धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की ऐतिहासिक बगीचियां भी इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग रही हैं। एक ऐसा दौर भी था जब ये हरी-भरा परिसर शहरवासियों की दिनचर्या का अहम हिस्सा हुआ करते थे। सुबह की पहली किरण के साथ ही इन स्थानों पर रौनक छा जाती थी, जहां लोग खुली हवा में सैर करने और कसरत करने के लिए बड़ी संख्या में पहुंचते थे। इसके अलावा, ये स्थान स्थानीय स्तर पर सामाजिक मेलजोल और भाईचारे के जीवंत केंद्र माने जाते थे।

पहलवानी और अखाड़ों का गढ़ हुआ करती थीं ये जगहें

इन पुरानी बगीचियों की सबसे बड़ी खासियत वहां बने पारंपरिक अखाड़े थे, जहां युवा पहलवान घंटों पसीना बहाकर अपने शरीर को फौलादी बनाते थे। कुश्ती के इन दांवपेंचों के बीच गूंजने वाली पहलवानों की हुंकार इस पूरे माहौल में एक अलग ही ऊर्जा भर देती थी। स्थानीय निवासी और पहलवान चुन्नी कप्तान ने बताया कि पहले ये स्थान शहर की खास पहचान हुआ करते थे, जहां लोग नियमित रूप से पहलवानी और व्यायाम करने आते थे। इन अखाड़ों में केवल शारीरिक दमखम ही नहीं सुधारा जाता था, बल्कि युवाओं को जीवन में अनुशासन और कड़ी मेहनत का पाठ भी पढ़ाया जाता था। बुजुर्गों से लेकर नौजवानों तक, हर कोई अपनी सेहत को दुरुस्त रखने के लिए इन परिसरों का रुख करता था।

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बदलाव और उपेक्षा के कारण मिट रहा है वजूद

वक्त बीतने के साथ शहर की जीवनशैली में भारी बदलाव आया है और आधुनिकता की दौड़ में इन प्राचीन विरासतों की सुध लेना लोग भूल गए हैं। वर्तमान में स्थिति यह है कि देखरेख के अभाव और तेजी से बढ़ती आबादी के दबाव के चलते ये बगीचियां अपनी मूल खूबसूरती और पहचान खोती जा रही हैं। कभी जिन जगहों पर हरियाली और पहलवानों की चहलकदमी हुआ करती थी, वहां अब उपेक्षा की परतें जमी हुई हैं। यदि प्रशासन और स्थानीय स्तर पर इन ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण की दिशा में तुरंत ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां भरतपुर की इस अनमोल परंपरा से पूरी तरह अनजान रह जाएंगी। इन परिसरों को बचाने के लिए विशेष सफाई अभियानों, पौधों के रोपण और अखाड़ों के जीर्णोद्धार की सख्त दरकार है ताकि यह पुरानी विरासत फिर से जीवित हो सके।

सवाल-जवाब

भरतपुर की इन बगीचियों में पहले किस तरह की गतिविधियां होती थीं?
इन बगीचियों में सुबह के समय लोग सैर करते थे, व्यायाम करते थे और पारंपरिक अखाड़ों में पहलवान पहलवानी का अभ्यास करते थे।
पहलवान चुन्नी कप्तान ने इन बगीचियों के बारे में क्या जानकारी दी है?
उन्होंने बताया कि ये स्थान कभी शहर की विशेष पहचान हुआ करते थे जहां युवा अनुशासन और मेहनत की सीख लेने आते थे।
ये ऐतिहासिक बगीचियां अब गुमनामी में क्यों जा रही हैं?
बढ़ती आबादी, बदलती जीवनशैली और उचित रखरखाव के अभाव के कारण ये बगीचियां अपनी पुरानी पहचान खोती जा रही हैं।
इन ऐतिहासिक स्थलों को बचाने के लिए क्या कदम उठाने की जरूरत है?
इनकी सुध लेते हुए नियमित साफ-सफाई, हरियाली बढ़ाने और अखाड़ों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·42 मिनट पहले

चुन्नी कप्तान का यह कहना दिल को छू गया कि ये अखाड़े युवाओं को अनुशासन सिखाते थे। आज के दौर में ऐसी जगहों का खंडहर बनना वाकई दुखद है।

Ravikash Gupta@ravikash·41 मिनट पहले

अर्जुन, बात सही है पर सिर्फ अखाड़े टूटने से सब खत्म नहीं होता, असली कमी तो आज के युवाओं के खेल से दूर होने की है।

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

भरतपुर की इन बगीचियों और अखाड़ों की हालत देखकर दुख हुआ। यूपी के कई शहरों में भी ऐसी ही पुरानी खेल और संस्कृति की जगहें अनदेखी का शिकार हो रही हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

रोहन भाई, यूपी का तो पता नहीं, पर भरतपुर में सिर्फ उपेक्षा ही कारण नहीं है, लोग खुद अब जिम और पार्कों की तरफ भाग रहे हैं।

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