राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों में धौलपुर नगर परिषद का नतीजा राजनीतिक हलकों में खासी चर्चा बटोर रहा है। यहां वार्ड स्तर के मुकाबलों में कांग्रेस 27 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी, लेकिन शीर्ष पद यानी सभापति की कुर्सी गिरीश गर्ग के पाले में चली गई। इस सियासी घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि गिरीश गर्ग ने मौजूदा चुनावों में पार्षद पद के लिए कोई पर्चा ही दाखिल नहीं किया था। बिना पार्षद बने ही वे सीधे नगर परिषद के मुखिया की कुर्सी तक पहुंच गए, जो राज्य के चुनावी नियमों में शामिल हाइब्रिड मॉडल के कारण संभव हुआ है।
धौलपुर नगर परिषद का चुनावी समीकरण और सीटों का ब्योरा
धौलपुर नगर परिषद के अंतर्गत कुल 60 वार्ड आते हैं। हालिया चुनाव परिणामों में किसी भी एक पार्टी को अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल नहीं हुआ था। परिणामों के मुताबिक कांग्रेस ने 27 वार्डों में विजय प्राप्त की, जबकि बीजेपी के खाते में 11 सीटें आईं। इसके अलावा 19 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की और बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा को 3 वार्डों में कामयाबी मिली थी।
नगर परिषद में अपना सभापति बनाने के लिए 31 पार्षदों के समर्थन का जादुई आंकड़ा जरूरी था। कांग्रेस पार्टी 27 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी तो जरूर बन गई, मगर बहुमत के जरूरी आंकड़े से चार कदम दूर रह गई। सभापति पद की दौड़ के लिए कुल सात उम्मीदवारों ने अपना नामांकन दाखिल किया था। नामांकन प्रक्रिया के बाद छह प्रत्याशियों ने चुनावी मैदान से अपने नाम वापस ले लिए। नाम वापसी की मियाद खत्म होने के बाद मैदान में केवल गिरीश गर्ग अकेले प्रत्याशी बचे, जिसके चलते मतदान की नौबत नहीं आई और उन्हें निर्विरोध सभापति घोषित कर दिया गया।
पार्षद का चुनाव लड़े बिना सीधे सभापति पद पर नामांकन
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली बात गिरीश गर्ग का चुनावी सफर रहा। उन्होंने नगर परिषद के किसी भी वार्ड से पार्षद का चुनाव नहीं लड़ा था। इसके बावजूद वे सीधे सभापति पद के चुनाव में बतौर प्रत्याशी उतरे। छह अन्य दावेदारों के नाम वापस लेने से उनके सामने कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं बचा। बिना किसी विरोध के वे सीधे धौलपुर नगर परिषद के सभापति निर्वाचित हो गए।
क्या है राजस्थान का हाइब्रिड चुनावी मॉडल?
आम तौर पर निकाय चुनावों में यह माना जाता है कि वही व्यक्ति अध्यक्ष या सभापति बन सकता है जो पहले वार्ड स्तर पर पार्षद चुना गया हो। राजस्थान में लागू हाइब्रिड व्यवस्था इस पारंपरिक प्रक्रिया से अलग विकल्प देती है। इस नियम के तहत किसी भी योग्य नागरिक को सीधे निकाय प्रमुख यानी मेयर, सभापति या अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने की अनुमति होती है, भले ही वह वार्ड का पार्षद न हो।
वर्ष 2019 में लागू किए गए इस प्रावधान के अनुसार वार्ड पार्षदों का चुनाव और निकाय प्रमुख का चुनाव दो अलग-अलग स्तरों पर संचालित होता है। हालांकि, गैर-पार्षद रहते हुए अध्यक्ष या सभापति बनने वाले व्यक्ति के लिए एक अनिवार्य शर्त भी जुड़ी हुई है। यदि कोई व्यक्ति बिना पार्षद बने निकाय प्रमुख निर्वाचित होता है, तो उसे पद ग्रहण करने के बाद एक निश्चित समय सीमा के अंदर पार्षद की पात्रता पूरी करनी होती है।
छह महीने के भीतर जीतना होगा पार्षद का चुनाव
गिरीश गर्ग के मामले में भी यह अनिवार्य कानूनी प्रावधान पूरी तरह लागू होगा। बिना पार्षद का चुनाव लड़े सभापति बनने के बाद अब उन्हें अपने पद पर बने रहने के लिए आगामी छह महीने के भीतर किसी न किसी वार्ड से पार्षद का चुनाव जीतकर आना होगा। यदि वे इस छह महीने की तय मियाद में पार्षद बनने की प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाते हैं, तो उनके पद पर संकट खड़ा हो सकता है। यानी उनका सभापति बनना भले ही वार्ड चुनाव से अलग रहा हो, लेकिन पद की निरंतरता आगे चलकर पार्षद बनने की शर्त पर ही टिकी रहेगी।
जीत के बाद पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से मुलाकात
धौलपुर नगर परिषद के सभापति पद पर निर्विरोध चुने जाने के तुरंत बाद गिरीश गर्ग ने पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे से मुलाकात की। इस मुलाकात को लेकर वसुंधरा राजे ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए जानकारी साझा की। उन्होंने लिखा कि धौलपुर नगर परिषद के निर्विरोध नवनिर्वाचित सभापति गिरीश गर्ग ने उनसे भेंट की और आभार प्रकट किया। इसके साथ ही उन्होंने धौलपुर के समग्र विकास के लिए संकल्प लिया। इस अवसर पर पूर्व मुख्यमंत्री ने नवनिर्वाचित सभापति को बधाई और शुभकामनाएं भी दीं।
कांग्रेस के 27 पार्षद होने के बावजूद क्यों फिसली कुर्सी?
धौलपुर के चुनावी गणित पर नजर डालें तो कांग्रेस के पास 27 पार्षद थे, जो बहुमत के 31 के आंकड़े से सिर्फ 4 कम थे। दूसरी ओर, गिरीश गर्ग को बीजेपी के 11 पार्षदों, बसपा के 3 पार्षदों और कुल 19 निर्दलीयों में से 17 पार्षदों का मजबूत समर्थन हासिल हुआ। इस तरह गर्ग के पक्ष में समर्थन का आंकड़ा 31 तक पहुंच गया। नामांकन वापसी के अंतिम दौर में अन्य छह उम्मीदवारों के हट जाने से वोटिंग की जरूरत ही खत्म हो गई। धौलपुर का यह परिणाम राजस्थान के हाइब्रिड सिस्टम की कार्यप्रणाली का एक बड़ा उदाहरण बन गया है, जहां निकाय प्रमुख का चयन वार्डों की दलीय स्थिति से बिल्कुल अलग मोड़ ले सकता है।




















