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राजस्थान के देसूरी की नाल मार्ग पर 19 सालों में गईं 150 से अधिक जानें, 2 हजार करोड़ का एलिवेटेड प्रोजेक्ट अब भी अटकाराजस्थान
17 सित॰ 2026, 12:32 pm (6 घंटे पहले)· 0

राजस्थान के देसूरी की नाल मार्ग पर 19 सालों में गईं 150 से अधिक जानें, 2 हजार करोड़ का एलिवेटेड प्रोजेक्ट अब भी अटका

राजस्थान में मारवाड़ और मेवाड़ को जोड़ने वाली संकरी देसूरी की नाल पर बीते 19 वर्षों में 150 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। ₹2,000 करोड़ की अनुमानित लागत से बनने वाले 9 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड स्काई-वे का प्रस्ताव तकनीकी खामियों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के चलते फाइलों में अटका पड़ा है।

राजस्थान के मारवाड़ और मेवाड़ अंचल को आपस में जोड़ने वाला देसूरी की नाल मार्ग आज भी राहगीरों और वाहन चालकों के लिए एक बड़ा खतरा बना हुआ है। अरावली की दुर्गम पहाड़ियों के बीच फैली यह संकरी सड़क वर्षों बीत जाने के बाद भी सुरक्षित नहीं हो सकी है। हर गुजरते दिन के साथ इस तीखे मोड़ वाले रास्ते पर जानलेवा हादसों की आशंका बनी रहती है, जबकि कागजों पर तैयार की गई 2 हजार करोड़ रुपए की एलिवेटेड रोड परियोजना प्रशासनिक प्रक्रियाओं और तकनीकी आपत्तियों के फेर में फंसी हुई है। स्थानीय निवासी और इस मार्ग से गुजरने वाले दैनिक यात्री लंबे समय से इस मार्ग के नवीनीकरण और स्काई-वे निर्माण की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

19 साल पहले का वो खौफनाक हादसा और 150 से अधिक जानें

इस मार्ग की भयावहता का इतिहास 7 सितंबर 2007 के उस काले दिन से जुड़ा है, जिसे राजस्थान आज तक नहीं भूल पाया है। उस शाम देसूरी की नाल से गुजर रहा एक अनियंत्रित ट्रक गहरी खाई में जा गिरा था। इस वाहन में रामदेवरा दर्शन के लिए जा रहे जातरू सवार थे। इस भीषण दुर्घटना में 86 से अधिक श्रद्धालुओं की मौके पर या उपचार के दौरान मृत्यु हो गई थी। इस हादसे की विभीषिका इतनी तीव्र थी कि शेमल गांव में एक ही श्मशान घाट पर 30 से अधिक मासूमों और ग्रामीणों का एक साथ अंतिम संस्कार करना पड़ा था। उस घटना से शेमल, मादड़ी देवस्थान और भावा गांव के कई परिवार पूरी तरह तबाह हो गए थे।

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उस समय दुर्घटनास्थल पर मौजूद प्रत्यक्षदर्शी दिनेश के अनुसार, हादसे का दृश्य इतना विचलित करने वाला था कि राजसमंद के सरकारी अस्पताल में शवों को रखने के लिए जगह कम पड़ गई थी। दुर्घटनाग्रस्त ट्रक के मलबे के नीचे दबे एक 6 से 7 साल के मासूम बच्चे को बाहर निकालते समय उसका शरीर दो हिस्सों में विभाजित हो चुका था। बीते 19 सालों के दौरान जो बच्चे इस हादसे में अनाथ हुए थे, वे अब वयस्क हो चुके हैं, लेकिन देसूरी की नाल में हादसों का सिलसिला नहीं थमा है। इस समयावधि में इस खूनी मोड़ पर 150 से अधिक लोग अपनी जानें गंवा चुके हैं।

अरावली की जटिल भौगोलिक संरचना और सड़क की तकनीकी कमियां

पाली और राजसमंद जिलों की सीमा पर स्थित यह मार्ग अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण निर्माण और यातायात प्रबंधन के लिहाज से बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है। रास्ते में अत्यधिक ढलान के साथ-साथ अत्यंत तीखे मोड़ मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त, पर्याप्त दृश्य दूरी न होने के कारण मोड़ पर सामने से आते वाहनों का अंदाजा लगाना चालकों के लिए असंभव सा हो जाता है। मार्ग के एक तरफ गहरी खाई और नदी बहती है, जबकि दूसरी ओर अरावली की ऊंची और सीधी चट्टानी पहाड़ियां खड़ी हैं। इस भौगोलिक बनावट के कारण सड़क का चौड़ीकरण करना या पारंपरिक तरीके से नया निर्माण करना लगभग असंभव है।

भौगोलिक चुनौतियों के साथ-साथ इस मार्ग की वर्तमान अवसंरचना भी पूरी तरह जर्जर हो चुकी है। सड़क का ड्रेनेज सिस्टम बदहाल स्थिति में है, जिससे वर्षा ऋतु के दौरान पानी की निकासी सही ढंग से नहीं हो पाती और पानी सड़क पर जमा होकर डामर की सतह को नुकसान पहुंचाता है। पेवमेंट कई स्थानों से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है, जिससे वाहनों के फिसलने और अनियंत्रित होने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। इन सभी कारणों से पुलिस और परिवहन विभाग ने इस पूरे खिंचाव को डेंजर जोन घोषित कर रखा है।

2 हजार करोड़ रुपए के एलिवेटेड स्काई-वे का प्रस्ताव और वर्तमान स्थिति

इस जानलेवा रास्ते का स्थायी समाधान निकालने के लिए 9 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड स्काई-वे का निर्माण प्रस्तावित किया गया है। लगभग 2 हजार करोड़ रुपए की अनुमानित लागत वाली इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना के अंतर्गत नदी की दिशा में सिंगल पोल यानी एकल खंभों पर टिका हुआ एलिवेटेड रोड बनाने की योजना तैयार की गई है। इस विशिष्ट डिजाइन का मुख्य उद्देश्य वनों की कटाई को न्यूनतम रखना और अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता को समाप्त करना है। यह प्रस्तावित निर्माण पुराने स्टेट हाईवे-16 (SH-16) के किलोमीटर 281/500 से किलोमीटर 290/00 के मध्य किया जाना तय हुआ है।

पाली से चारभुजा तक के कुल 83 किलोमीटर लंबे संपूर्ण मार्ग के कायाकल्प के लिए केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय से सिफारिश की गई है, जिसकी कुल अनुमानित लागत 1,800 से 2,000 करोड़ रुपए के बीच है। पाली के सांसद पीपी चौधरी ने स्पष्ट किया है कि इस परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार कर ली गई है और इसमें देसूरी नाल का एलिवेटेड रोड प्रमुख घटक के रूप में शामिल है। उन्होंने केंद्र सरकार से जल्द से जल्द वित्तीय व प्रशासनिक स्वीकृति मिलने की उम्मीद जताई है।

दूसरी ओर, राजस्थान राज्य सड़क विकास और निर्माण निगम (आरएसआरडीसी) की अधीक्षण अभियंता अंजू चौधरी के अनुसार, देसूरी-चारभुजा एलिवेटेड रोड की तैयार की गई डीपीआर पर कुछ तकनीकी आपत्तियां दर्ज की गई थीं। वर्तमान में संबंधित तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा उन आपत्तियों का निवारण करने और रिपोर्ट में आवश्यक सुधार व संशोधन करने की प्रक्रिया गति पर है, जिसके पूरा होने के बाद ही परियोजना को अंतिम मंजूरी के लिए आगे बढ़ाया जा सकेगा।

सवाल-जवाब

देसूरी की नाल में 7 सितंबर 2007 को क्या हुआ था?
7 सितंबर 2007 को रामदेवरा जा रहे श्रद्धालुओं से भरा एक ट्रक अनियंत्रित होकर खाई में गिर गया था, जिसमें 86 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी।
देसूरी की नाल मार्ग पर पिछले 19 वर्षों में कितने हादसे और मौतें हुई हैं?
बीते 19 वर्षों में इस खतरनाक मोड़ और संकरी सड़क पर हादसों के कारण 150 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
देसूरी की नाल के लिए प्रस्तावित एलिवेटेड रोड परियोजना की लागत कितनी है?
प्रस्तावित 9 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड स्काई-वे की अनुमानित लागत लगभग 2,000 करोड़ रुपए है।
एलिवेटेड रोड का निर्माण किस मार्ग पर प्रस्तावित है?
यह निर्माण पुराने स्टेट हाईवे-16 (SH-16) के किलोमीटर 281/500 से 290/00 के बीच नदी की तरफ सिंगल पोल संरचना पर किया जाना प्रस्तावित है।
एलिवेटेड रोड परियोजना की फाइल फिलहाल क्यों अटकी हुई है?
आरएसआरडीसी द्वारा तैयार डीपीआर (DPR) पर कुछ तकनीकी आपत्तियां दर्ज की गई थीं, जिनमें सुधार और संशोधन का कार्य वर्तमान में चल रहा है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 3

Rohan Verma@rohan-verma·5 घंटे पहले

यह रिपोर्ट बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में प्रशासनिक ढिलाई और लालफीताशाही के गंभीर नतीजों को उजागर करती है। मारवाड़ और मेवाड़ को जोड़ने वाले इस जोखिम भरे पर्वतीय मार्ग पर दो दशकों में 150 से अधिक मौतें यह दिखाती हैं कि डीपीआर और तकनीकी आपत्तियों में फँसी फाइलें किस तरह सीधे जनसुरक्षा को प्रभावित करती हैं। अरावली की जटिल भौगोलिक स्थिति को देखते हुए शासन की प्राथमिकता अंतर-विभागीय समन्वय के ज़रिए तकनीकी पेचों को जल्द सुलझाने की होनी चाहिए, ताकि सुरक्षा से जुड़ी यह परियोजना केवल कागज़ों में न अटकी रहे।

Arjun Mehta@arjun-mehta·5 घंटे पहले

रोहन का विश्लेषण शासन और लोक नीति की एक बड़ी विफलता की ओर ध्यान खींचता है। मारवाड़ और मेवाड़ को जोड़ने वाली इस महत्वपूर्ण परियोजना का लगभग दो दशकों तक तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अटका रहना यह दर्शाता है कि बुनियादी ढाँचे के विकास में जनसुरक्षा को प्राथमिकता नहीं मिल पा रही है। 2,000 करोड़ रुपये का स्काई-वे प्रस्ताव काग़ज़ों में उलझा रहना प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी का प्रमाण है। जब तक सरकार अंतर-विभागीय समन्वय के लिए समयबद्ध जवाबदेही तय नहीं करेगी, तब तक अरावली के इस जोखिम भरे मार्ग पर नीतिगत ढिलाई की भारी कीमत जनहानि के रूप में चुकानी पड़ेगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·5 घंटे पहले

यह केवल ढांचागत विफलता का मामला नहीं है, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा के प्रति प्रशासनिक जवाबदेही की घोर उपेक्षा का प्रमाण है। 19 वर्षों में 150 से अधिक मौतों के बावजूद ₹2,000 करोड़ की परियोजना का फाइलों और DPR संशोधनों में अटके रहना यह दर्शाता है कि लालफीताशाही किस कदर मानव जीवन पर भारी पड़ रही है। इस जानलेवा मार्ग पर केवल कागजी प्रक्रियाओं का इंतजार करने के बजाय जिम्मेदार विभागों पर विधिक व प्रशासनिक जवाबदेही तय होनी चाहिए। जब तक एलिवेटेड रोड का निर्माण पूरा नहीं होता, तब तक दुर्घटनाओं को रोकने के लिए तत्काल कड़े यातायात नियम, क्रैश बैरियर और सुरक्षा मानक लागू किए जाने चाहिए।

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