राजस्थान का औद्योगिक शहर पाली एक बार फिर भीषण जल संकट के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है। इस वर्ष मानसून के दौरान हुई बेहद कम बारिश ने स्थानीय निवासियों और जिला प्रशासन दोनों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। जैसे-जैसे मुख्य जल स्रोतों और बांधों में पानी का स्तर गिरता है, स्थानीय प्रशासन का ध्यान तुरंत जोधपुर से पानी लाने के तात्कालिक उपायों की ओर चला जाता है। हर आपात स्थिति की तरह इस बार भी रेलगाड़ियों के माध्यम से जल परिवहन की तैयारी की जा रही है। हालांकि, आपातकालीन व्यवस्था पर पानी की तरह पैसा बहाने के बावजूद जनता को पर्याप्त पीने का पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। इस पूरी कवायद के बीच यह बुनियादी सवाल बार-बार सतह पर आता है कि जब हर कुछ वर्षों में यह आपदा तय है, तो सरकार और संबंधित विभाग स्थायी जल ढांचा तैयार करने में पूरी तरह नाकाम क्यों रहे हैं?
दो दशकों से जारी है रेल के जरिए पानी ढोने का सिलसिला
राजस्थान का पाली संभवतः राज्य का एकमात्र ऐसा प्रमुख शहरी केंद्र बन चुका है, जिसकी पीने के पानी की बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए भारतीय रेलवे की पटरियों का सहारा लेना पड़ता है। ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें तो पाली के लिए पहली बार वॉटर स्पेशल ट्रेन का संचालन वर्ष 2002 में शुरू किया गया था। उस समय अकाल की स्थिति से निपटने के लिए रेलवे वैगनों का प्रयोग किया गया था। इसके बाद जब भी क्षेत्र में मानसून की बारिश सामान्य से कम दर्ज की गई, प्रशासन ने इसी अस्थायी रास्ते को अपनाया। वर्ष 2009, वर्ष 2016, वर्ष 2019, वर्ष 2021 और वर्ष 2022 में जोधपुर के भगत की कोठी तथा कांकाणी रेलवे स्टेशनों से पानी भर-भरकर पाली पहुंचाया गया। दो दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इस व्यवस्था पर निर्भरता समाप्त नहीं हो सकी है।
प्रतिदिन 20 लाख रुपये का खर्च लेकिन आपूर्ति फिर भी अधूरी
रेलवे के माध्यम से पानी मंगवाने का यह तरीका न केवल एक अस्थायी उपाय है, बल्कि सरकारी खजाने पर भी एक भारी आर्थिक बोझ डालता है। उत्तर पश्चिम रेलवे को वॉटर ट्रेन के नियमित संचालन के लिए प्रतिदिन लगभग 20 लाख रुपये का भारी-भरकम भुगतान करना पड़ता है। जब मानसून की विफलता के कारण दो से चार महीनों तक इस स्पेशल ट्रेन को चलाया जाता है, तो केवल किराए के रूप में करोड़ों रुपये रेलवे को चुका दिए जाते हैं। वित्तीय मोर्चे पर इतना भारी खर्च करने के बावजूद शहर की प्यास पूरी तरह नहीं बुझ पाती। एक वॉटर ट्रेन के जरिए पूरे दिन में केवल 20 लाख से 25 लाख लीटर पानी ही पाली तक लाया जा सकता है। इसके विपरीत, पाली शहर की दैनिक जल आवश्यकता 5 करोड़ लीटर से भी अधिक है। नतीजतन, करोड़ों रुपये व्यय करने के बाद भी पेयजल की आपूर्ति सामान्य स्थिति में नहीं लौट पाती।
30 किलोमीटर की पाइपलाइन का काम प्रशासनिक लालफीताशाही में अटका
प्रशासनिक स्तर पर दूरदर्शिता की कमी और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव को लेकर स्थानीय निवासियों में गहरा आक्रोश पनप रहा है। क्षेत्रीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि क्षेत्र में लंबे समय से जनप्रतिनिधि मौजूद रहे हैं, लेकिन इस गंभीर समस्या का कोई टिकाऊ समाधान निकालने के लिए ठोस पहल नहीं की गई। स्थानीय नागरिक श्याम मेवाड़ा का कहना है कि पिछले 20 वर्षों से क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी के विधायक रहे हैं, फिर भी पाली की इस प्राथमिक समस्या को सुलझाने के लिए स्थायी योजना धरातल पर नहीं उतारी गई। जोधपुर से रोहट क्षेत्र तक मुख्य पेयजल पाइपलाइन पहले ही बिछाई जा चुकी है। रोहट से पाली शहर की कुल दूरी महज 30 किलोमीटर है। इस 30 किलोमीटर के छूटे हुए हिस्से में पाइपलाइन विस्तार के लिए आवश्यक प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृतियां समय पर जारी नहीं हो पाती हैं। कई बार निविदाएं जारी होने की बातें सामने आती हैं, लेकिन धरातल पर काम आगे न बढ़ने का स्पष्ट उत्तर किसी विभाग के पास नहीं है।
नल से तीन दिन में एक बार पानी, 2250 करोड़ की योजना ठंडे बस्ते में
स्थानीय निवासी रतन सिंह और प्रमोद प्रजापत बताते हैं कि पाली के लोग खुद को इस मामले में बेबस महसूस करते हैं क्योंकि उन्हें अपनी बुनियादी दैनिक आवश्यकता के लिए रेलगाड़ी के आगमन पर आश्रित रहना पड़ता है। उनका कहना है कि अतीत में पाली में नलों से रोजाना पानी की आपूर्ति होती थी, लेकिन अब स्थिति यह है कि लोगों को दो से तीन दिनों में केवल एक बार पानी मिल पा रहा है। इस स्थिति से निपटने के लिए पूर्व में जवाई पुनर्भरण परियोजना की रूपरेखा तैयार की गई थी। इस महत्वाकांक्षी योजना का कुल बजट लगभग 2,250 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया था। इसके तहत उदयपुर जिले के सेई और वाकल बेसिन, जो साबरमती बेसिन का हिस्सा हैं, से अतिरिक्त पानी को मोड़कर जवाई बांध में लाने का प्रस्ताव था। यदि यह 2,250 करोड़ रुपये की परियोजना निर्धारित समयसीमा के भीतर पूरी हो जाती, तो पाली जिले को कभी भी टैंकरों या रेलगाड़ियों का इंतजार नहीं करना पड़ता।
आपातकालीन फंड के स्थान पर स्थायी निर्माण की सख्त जरूरत
जल संकट के चरम पर पहुंचते ही प्रशासनिक स्तर पर आपातकालीन बजट स्वीकृत कर दिया जाता है। टैंकरों और वॉटर ट्रेन के लिए तत्काल धनराशि जारी हो जाती है, लेकिन जैसे ही अगली अच्छी बारिश होती है या संकट तात्कालिक रूप से टलता है, स्थायी पाइपलाइन और जवाई पुनर्भरण से जुड़ी फाइलें फिर से बंद हो जाती हैं। हर साल ट्रेन के भाड़े के रूप में प्रतिदिन लाखों रुपये खर्च करने के बजाय यदि सरकार इसी बजट को रोहट से पाली तक की 30 किलोमीटर पाइपलाइन को पूरा करने तथा जवाई पुनर्भरण परियोजना को पूरा करने में लगाए, तो पाली को इस दीर्घकालिक जल संकट से हमेशा के लिए मुक्ति मिल सकती है।



















