सनातन परंपरा में पूर्वजों की तृप्ति के लिए किए जाने वाले पितृ तर्पण और देव आराधना के अनुष्ठानों में पुरोहित का वरण अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण दायित्व माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विधि-विधान से किए गए कर्मकांड तभी फलीभूत होते हैं, जब अनुष्ठान संपन्न कराने वाला व्यक्ति आचरण और विद्या के मानकों पर खरा उतरता हो। इसी संदर्भ में गरुड़ पुराण में इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है कि किस प्रकार के ब्राह्मण को पूजा, महादान और श्राद्ध कर्म में आमंत्रित करना चाहिए और किन प्रवृत्तियों अथवा लक्षणों वाले व्यक्तियों से दूरी बनाए रखनी चाहिए।
सद्गुणी और वेदवेत्ता पुरोहित के अनिवार्य लक्षण
प्राचीन शास्त्र के निर्देशों के अनुसार श्राद्ध और यज्ञ जैसे पवित्र अनुष्ठानों के लिए केवल उसी व्यक्ति का वरण श्रेष्ठ बताया गया है, जो सदाचार के पथ पर चलता हो और सदैव सत्य का आचरण करता हो। इसके साथ ही उसका वेदों का अध्ययनशील होना और कर्मकांड की बारीकियों से भलीभांति परिचित होना अनिवार्य माना गया है। धर्मशास्त्रों के मर्म को समझने वाला, पुण्य और पाप के सूक्ष्म अंतर को जानने वाला तथा परोपकार की भावना से ओतप्रोत साधक ही इन कार्यों के योग्य होता है। नियमित रूप से गायत्री मंत्र का जप करने वाले और तपस्या में निष्ठा रखने वाले विद्वान के हाथों संपन्न कराया गया अनुष्ठान ही पूर्वजों तक तृप्ति पहुंचाता है।
इन प्रवृत्तियों और व्यवसायों से जुड़े लोगों का वरण है वर्जित
संहिता में इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि अनुष्ठान कराने वाले का आजीविका साधन और उसकी प्रवृत्तियां भी धार्मिक नियमों के अनुकूल होनी चाहिए। ग्रंथ में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि ज्योतिषी का कार्य करने वाले, अभिचार कर्म यानी तंत्र-मंत्र के नकारात्मक प्रयोगों में लिप्त रहने वाले लोगों को श्राद्ध, महादान और यज्ञ कार्यों में आमंत्रित नहीं करना चाहिए। शास्त्रों की मान्यता है कि यदि ऐसे व्यक्तियों के माध्यम से संकल्प या तर्पण कराया जाए, तो उस संपूर्ण अनुष्ठान का फल निष्फल हो जाता है और किए गए प्रयासों का कोई आध्यात्मिक लाभ प्राप्त नहीं होता।
विद्वत्ता के बावजूद चार श्रेणियों का चयन निषेध
गरुड़ पुराण में चार विशेष श्रेणियों के व्यक्तियों को यज्ञ और श्राद्ध कर्म के लिए अयोग्य बताया गया है, भले ही वे कितने भी विद्वान क्यों न हों। इन श्रेणियों में भेड़-बकरी पालने वाले, चित्रकार का कार्य करने वाले, वैद्य यानी चिकित्सा कार्य से जुड़े लोग और ज्योतिष विद्या का अभ्यास करने वाले शामिल हैं। इसके अलावा भौगोलिक पृष्ठभूमि और व्यक्तिगत स्वभाव को लेकर भी ग्रंथ में निर्देश दिए गए हैं। कपटी स्वभाव वाले व्यक्ति, मथुरा के निवासी, गयाप्रदेश यानी बिहार क्षेत्र तथा आनंद देश में जन्म लेने वाले ब्राह्मणों का वरण भी श्राद्ध और यज्ञ के अनुष्ठानों में वर्जित माना गया है।
किन व्यक्तियों को माना गया है त्याज्य
श्राद्ध, जप और यज्ञ जैसे गंभीर धार्मिक अनुष्ठानों में कई अन्य स्थितियों और लक्षणों को भी त्याज्य श्रेणी में रखा गया है। पाठ के अनुसार काना, कोढ़ी, मूर्ख, क्रोधी, वर्णशंकर, काले दांतों वाला, निंदित, पतित, नपुंसक, अंगहीन तथा वेदों का अध्ययन न करने वाला यानी अवेद व्यक्ति इन कार्यों के योग्य नहीं माना गया है। साथ ही कुदेश का निवासी, देखने में अत्यंत भयानक लगने वाला, मगध देश का निवासी और अत्यधिक काले रंग वाला व्यक्ति भी उन श्रेणियों में शामिल है, जिन्हें पूजन और पितृ कार्यों में वर्जित बताया गया है।
तिलक लगाने के नियम और दैनिक आचरण का महत्व
धार्मिक परंपरा में बाह्य आचरण और दैनिक नियमों के पालन को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना गया है। ग्रंथ में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि कोई ब्राह्मण स्नान करने के पश्चात अपने ललाट पर तिलक धारण नहीं करता है, तो उसे प्रणाम तक नहीं करना चाहिए। इस प्रकार प्राचीन ग्रंथ के ये निर्देश स्पष्ट करते हैं कि धार्मिक कार्यों की सफलता केवल विधि-विधान पर नहीं, बल्कि कर्म कराने वाले व्यक्ति के संपूर्ण जीवन, विद्या और आचरण की शुद्धता पर टिकी होती है।



















