वित्तीय बाजार में जब भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है, तो सीधे शेयरों में दांव लगाने वाले निवेशकों को अक्सर घाटे का सामना करना पड़ता है। इसके विपरीत, डायवर्सिफाइड पोर्टफोलियो के चलते म्यूचुअल फंड कई बार कठिन दौर में भी संतुलित रिटर्न देने में सफल रहते हैं। ऐसे में जो लोग दोनों ही माध्यमों में पैसा लगाते हैं, उनके मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या शेयरों में हुए नुकसान को म्यूचुअल फंड से मिले मुनाफे के साथ सेट ऑफ करके टैक्स बचाया जा सकता है। आयकर के मौजूदा प्रावधान इस तरह के समायोजन की पूरी छूट देते हैं, बशर्ते आप इसके तकनीकी नियमों को ठीक से समझते हों।
शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म कैपिटल लॉस के बुनियादी नियम
पूंजीगत लाभ यानी कैपिटल गेन पर लागू टैक्स कानून काफी स्पष्ट हैं। नियमों के मुताबिक, अगर किसी निवेशक को शॉर्ट टर्म कैपिटल लॉस हुआ है, तो उस नुकसान की भरपाई शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन दोनों से ही की जा सकती है। हालांकि, लॉन्ग टर्म कैपिटल लॉस के मामले में यह छूट थोड़ी सीमित हो जाती है। अगर आपको लंबे समय के निवेश पर घाटा हुआ है, तो उसकी भरपाई सिर्फ और सिर्फ लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन के सामने ही संभव है। इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि शेयरों और म्यूचुअल फंड के बीच लाभ-हानि का समायोजन किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए अवधि और एसेट क्लास से जुड़ी बुनियादी शर्तों का पालन करना अनिवार्य है।
इक्विटी म्यूचुअल फंड की शर्त और पोर्टफोलियो का ढांचा
शेयरों पर हुए नुकसान को म्यूचुअल फंड के मुनाफे से समायोजित करते समय यह देखना जरूरी है कि वह फंड किस श्रेणी का है। टैक्स नियमों के अनुसार, लिस्टेड कंपनियों के शेयरों से हुए नुकसान की भरपाई केवल इक्विटी आधारित म्यूचुअल फंड के लाभ से ही की जा सकती है। आयकर कानून के तहत इक्विटी म्यूचुअल फंड वही स्कीम मानी जाती है, जो अपनी कुल संपत्तियों का कम से कम 60 फीसदी हिस्सा घरेलू कंपनियों के शेयरों में लगाती है। फंड का शेष 40 फीसदी हिस्सा डेट इंस्ट्रूमेंट्स या अन्य सिक्योरिटीज में लगाया जा सकता है। इसलिए जब निवेशक अपने घाटे वाले शेयर बेचते हैं, तो वे इस तरह के इक्विटी फंड के मुनाफे से उस घाटे को घटाकर अपनी शुद्ध देनदारी तय कर सकते हैं।
उदाहरण से समझें टैक्स देनदारी घटने का गणित
इस व्यवस्था को एक सीधे उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी निवेशक ने इक्विटी म्यूचुअल फंड की यूनिट्स बेचकर 1 लाख रुपये का शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन कमाया। सामान्य स्थिति में इस पर 20 फीसदी की दर से 20 हजार रुपये का टैक्स बनता, जिसके ऊपर सरचार्ज और सेस भी चुकाना पड़ता। लेकिन अगर उसी वित्त वर्ष में उस निवेशक ने शेयरों की शॉर्ट टर्म ट्रेडिंग में 80 हजार रुपये का नुकसान उठाया है, तो वह इस 80 हजार के घाटे को अपने 1 लाख रुपये के फंड मुनाफे से घटा सकता है। ऐसा करने के बाद टैक्सेबल मुनाफा घटकर सिर्फ 20 हजार रुपये रह जाएगा, जिससे पहले लगने वाली भारी टैक्स देनदारी घटकर बेहद कम या शून्य के स्तर पर आ जाएगी।
आठ वर्षों तक घाटा आगे ले जाने की कानूनी सुविधा
आयकर कानून निवेशकों को यह भी सहूलियत देता है कि वे अपने अनएडजस्टेड नुकसान को अगले 8 सालों तक कैरी फॉरवर्ड कर सकें। यदि किसी निवेशक को साल 2026 में शेयर बाजार में घाटा उठाना पड़ा है, तो वह इस नुकसान को आने वाले 8 वर्षों यानी साल 2034 तक भविष्य में होने वाले मुनाफे के सामने समायोजित कर सकता है। हालांकि इसमें एक स्पष्ट शर्त यह भी है कि समायोजन का लाभ केवल तब तक ही मिलेगा जब तक नुकसान की पूरी रकम चुकता नहीं हो जाती। उदाहरण के लिए, यदि 50 हजार रुपये का घाटा हुआ और अगले ही साल 50 हजार रुपये का मुनाफा हो गया, तो वह पूरा घाटा उसी साल खत्म मान लिया जाएगा और फिर अगले 7 सालों तक उसका कोई समायोजन नहीं किया जा सकेगा।



















