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संतान की लंबी आयु का कठिन पर्व जितिया, मारुआ रोटी और नूनी साग से शुरू होता है यह दो दिवसीय निर्जला अनुष्ठानधर्म
1 अक्तू॰ 2026, 10:30 pm (23 मिनट पहले)· 0

संतान की लंबी आयु का कठिन पर्व जितिया, मारुआ रोटी और नूनी साग से शुरू होता है यह दो दिवसीय निर्जला अनुष्ठान

मिथिलांचल और बिहार में जितिया का दो दिवसीय निर्जला उपवास संतान व पति की दीर्घायु के लिए रखा जाता है। इस पारंपरिक पर्व में मारुआ की रोटी, नूनी का साग और ओठगन के खास नियम शामिल हैं।

बिहार के लोक जीवन में महिलाओं द्वारा रखे जाने वाले अनुष्ठानों में जितिया को सबसे कठिन साधना माना जाता है। मधुबनी सहित पूरे मिथिलांचल में इस पर्व का विशेष धार्मिक और सामाजिक महत्व है। यह दो दिवसीय कठिन व्रत मुख्य रूप से संतान की सुरक्षा, उसके सुखमय जीवन और पति की लंबी उम्र की कामना के साथ किया जाता है। परंपरा के अनुसार, पुत्र प्राप्ति के बाद महिलाएं इस उपवास की शुरुआत करती हैं। वर्ष 2026 में खजितिया का संयोग बन रहा है, जिसका अर्थ है कि जब यह व्रत शनिवार या मंगलवार के दिन पड़ता है, तब कोई भी महिला पहली बार इस व्रत का संकल्प लेकर इसे शुरू कर सकती है।

परंपरागत खानपान और व्रत की अनूठी शुरुआत

मिथिलांचल के धार्मिक अनुष्ठानों में आमतौर पर अत्यंत सात्विक और पारंपरिक शुद्धता का कड़ा नियम रहता है, लेकिन जितिया व्रत की शुरुआत बाकी पूजा-पाठ से एकदम भिन्न मानी जाती है। उपवास शुरू होने से पहले मारुआ के आटे की रोटी खाई जाती है, जिसे सामान्य दिनों के पूजा-पाठ में अशुद्ध माना जाता है। इसके साथ ही नूनी का विशेष साग और मछली का सेवन करने का रिवाज है। इन पारंपरिक व्यंजनों को ग्रहण करने के बाद ही महिलाएं व्रत का आरंभ करती हैं। जो परिवार अथवा महिलाएं मांसाहार का सेवन नहीं करते, वे मछली की जगह केवल मारुआ की रोटी, नूनी का साग और दही-चूड़ा खाकर इस अनुष्ठान की विधि पूरी करते हैं।

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साधवा महिलाओं को निमंत्रण और पितरों का स्मरण

इस अनुष्ठान के सामाजिक विधान को लेकर स्थानीय निवासी सुधा देवी बताती हैं कि आमतौर पर धार्मिक आयोजनों में पुरुषों को भोज का न्योता दिया जाता है, मगर जितिया से ठीक एक दिन पहले साधवा महिलाओं को ससम्मान घर बुलाया जाता है। आमंत्रित महिलाओं को भोजन में मछली, भात, मौसमी सब्जी और दही प्रेमपूर्वक परोसी जाती है। यह आयोजन परिवार के उन पूर्वजों के सम्मान में किया जाता है, जिनमें दिवंगत मातृशक्ति या महिलाओं की आत्मा की शांति का भाव जुड़ा होता है। उनके नाम पर अगले दिन विधिवत पूजा और व्रत संपन्न किया जाता है। पूजा विधान में तेल, खर और सुपारी अर्पित की जाती है और बाद में यह प्रसाद स्वरूप संतानों को लगाया जाता है।

निर्जला उपवास और ओठगन का कड़ा नियम

जितिया का मुख्य उपवास पूरी तरह निर्जला रखा जाता है, जिसमें महिलाएं पूरे समय पानी की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करतीं। इस कठोर साधना से ठीक एक दिन पहले तड़के सुबह उठकर ओठगन की रस्म निभाई जाती है। ओठगन के दौरान घर के बच्चों को दही और चूड़ा खिलाने की परंपरा है। इसके बाद महिलाएं अपने लंबे निर्जला व्रत में प्रवेश करती हैं, जो दो दिनों तक विधि-विधान के साथ जारी रहता है।

सवाल-जवाब

जितिया का व्रत मुख्य रूप से क्यों किया जाता है?
यह कठिन व्रत संतान के सुख, उसकी दीर्घायु और पति की लंबी उम्र की कामना के लिए रखा जाता है।
जितिया व्रत शुरू करने से पहले क्या खाने की परंपरा है?
उपवास से पहले मारुआ की रोटी, नूनी का साग और मछली खाई जाती है, जबकि शाकाहारी लोग मछली की जगह दही-चूड़ा लेते हैं।
वर्ष 2026 में खजितिया का क्या महत्व है?
खजितिया तब होता है जब व्रत शनिवार या मंगलवार को पड़े, और इसी अवसर पर महिलाएं पहली बार यह व्रत शुरू कर सकती हैं।
ओठगन की रस्म में क्या किया जाता है?
व्रत से एक दिन पहले तड़के सुबह ओठगन किया जाता है, जिसमें घर के बच्चों को दही और चूड़ा खिलाया जाता है।
जितिया से एक दिन पहले महिलाओं को भोजन क्यों कराया जाता है?
साधवा महिलाओं को भोजन कराने की परंपरा परिवार की दिवंगत महिला पूर्वजों की शांति और स्मरण के लिए की जाती है।
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