बिहार के लोक जीवन में महिलाओं द्वारा रखे जाने वाले अनुष्ठानों में जितिया को सबसे कठिन साधना माना जाता है। मधुबनी सहित पूरे मिथिलांचल में इस पर्व का विशेष धार्मिक और सामाजिक महत्व है। यह दो दिवसीय कठिन व्रत मुख्य रूप से संतान की सुरक्षा, उसके सुखमय जीवन और पति की लंबी उम्र की कामना के साथ किया जाता है। परंपरा के अनुसार, पुत्र प्राप्ति के बाद महिलाएं इस उपवास की शुरुआत करती हैं। वर्ष 2026 में खजितिया का संयोग बन रहा है, जिसका अर्थ है कि जब यह व्रत शनिवार या मंगलवार के दिन पड़ता है, तब कोई भी महिला पहली बार इस व्रत का संकल्प लेकर इसे शुरू कर सकती है।
परंपरागत खानपान और व्रत की अनूठी शुरुआत
मिथिलांचल के धार्मिक अनुष्ठानों में आमतौर पर अत्यंत सात्विक और पारंपरिक शुद्धता का कड़ा नियम रहता है, लेकिन जितिया व्रत की शुरुआत बाकी पूजा-पाठ से एकदम भिन्न मानी जाती है। उपवास शुरू होने से पहले मारुआ के आटे की रोटी खाई जाती है, जिसे सामान्य दिनों के पूजा-पाठ में अशुद्ध माना जाता है। इसके साथ ही नूनी का विशेष साग और मछली का सेवन करने का रिवाज है। इन पारंपरिक व्यंजनों को ग्रहण करने के बाद ही महिलाएं व्रत का आरंभ करती हैं। जो परिवार अथवा महिलाएं मांसाहार का सेवन नहीं करते, वे मछली की जगह केवल मारुआ की रोटी, नूनी का साग और दही-चूड़ा खाकर इस अनुष्ठान की विधि पूरी करते हैं।
साधवा महिलाओं को निमंत्रण और पितरों का स्मरण
इस अनुष्ठान के सामाजिक विधान को लेकर स्थानीय निवासी सुधा देवी बताती हैं कि आमतौर पर धार्मिक आयोजनों में पुरुषों को भोज का न्योता दिया जाता है, मगर जितिया से ठीक एक दिन पहले साधवा महिलाओं को ससम्मान घर बुलाया जाता है। आमंत्रित महिलाओं को भोजन में मछली, भात, मौसमी सब्जी और दही प्रेमपूर्वक परोसी जाती है। यह आयोजन परिवार के उन पूर्वजों के सम्मान में किया जाता है, जिनमें दिवंगत मातृशक्ति या महिलाओं की आत्मा की शांति का भाव जुड़ा होता है। उनके नाम पर अगले दिन विधिवत पूजा और व्रत संपन्न किया जाता है। पूजा विधान में तेल, खर और सुपारी अर्पित की जाती है और बाद में यह प्रसाद स्वरूप संतानों को लगाया जाता है।
निर्जला उपवास और ओठगन का कड़ा नियम
जितिया का मुख्य उपवास पूरी तरह निर्जला रखा जाता है, जिसमें महिलाएं पूरे समय पानी की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करतीं। इस कठोर साधना से ठीक एक दिन पहले तड़के सुबह उठकर ओठगन की रस्म निभाई जाती है। ओठगन के दौरान घर के बच्चों को दही और चूड़ा खिलाने की परंपरा है। इसके बाद महिलाएं अपने लंबे निर्जला व्रत में प्रवेश करती हैं, जो दो दिनों तक विधि-विधान के साथ जारी रहता है।



















