मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में सरकारी इमारतें अब सिर्फ फाइलों और दफ्तरी कामकाज का केंद्र नहीं रह गई हैं. ये परिसर अब महिला सशक्तिकरण की एक नई इबारत लिख रहे हैं. 'आजीविका स्वाद संगम' के नाम से शुरू हुआ 'दीदी कैफे' आज एक बड़ी सफलता बन चुका है. यह पहल साबित करती है कि अगर महिलाओं को सही अवसर दिया जाए, तो वे किसी भी व्यवसाय को शानदार तरीके से चला सकती हैं. यह छोटी सी शुरुआत आज एक मुनाफे वाले मॉडल में बदल गई है, जिसने करोड़ों रुपये का सालाना टर्नओवर हासिल करके सबको चौंका दिया है.
लाखों की मासिक कमाई और शानदार सफलता
इस समय राजधानी की चार प्रमुख सरकारी जगहों पर यह कैफे बहुत ही शानदार तरीके से काम कर रहा है. इनमें मुख्यमंत्री निवास, मंत्रालय वल्लभ भवन, विकास भवन और एमएलबी कॉलेज जैसी महत्वपूर्ण जगहें शामिल हैं. इन चार स्थानों पर कुल 52 महिलाएं पूरी जिम्मेदारी के साथ सारा कामकाज संभालती हैं. स्वादिष्ट और घर जैसा खाना मिलने की वजह से हर दिन 500 से अधिक ग्राहक यहां नाश्ता और भोजन करने आते हैं. अगर कमाई की बात करें, तो हर महीने लगभग 18.5 लाख रुपये का कारोबार हो रहा है. इस हिसाब से कैफे का सालाना टर्नओवर करीब 2.2 करोड़ रुपये के आंकड़े को छू रहा है, जो कि एक बहुत बड़ी उपलब्धि है.
सिर्फ रसोई नहीं, पूरा मैनेजमेंट सीख रहीं महिलाएं
इस व्यापार की कामयाबी के पीछे सिर्फ अच्छा खाना नहीं है, बल्कि महिलाओं को दी जाने वाली बेहतरीन ट्रेनिंग भी है. मेन्यू में पोहा, उपमा, इडली-सांभर और पराठे जैसे नाश्ते से लेकर दाल-चावल, रोटी-सब्जी वाली पूरी थाली तक शामिल है. इसके साथ ही चाय और कॉफी भी बिल्कुल सही कीमत पर मिलती है. जिला परियोजना प्रबंधक रेखा पांडे के मुताबिक, यहां काम करने वाली महिलाओं को केवल रसोई का काम नहीं सिखाया जाता. उन्हें साफ-सफाई रखने, ग्राहकों से सही तरीके से बातचीत करने, डिजिटल पेमेंट लेने, हिसाब-किताब रखने और मिल-जुलकर समूह चलाने की पूरी ट्रेनिंग दी जाती है. इसी वजह से वे पूरे आत्मविश्वास के साथ कैफे का प्रबंधन कर पा रही हैं.
हरिबाई और रुक्मिणी की बदल गई जिंदगी
इस पहल ने कई परिवारों के जीवन में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव ला दिया है. रायसेन रोड इलाके की हरिबाई की कहानी बहुत ही प्रेरणादायक है. वे पिछले 20 सालों तक लोगों के घरों में बर्तन साफ करने का काम करती थीं. उनके पति एक साधारण मजदूर हैं, जिसकी वजह से परिवार हमेशा पैसों की तंगी से जूझता रहता था. लेकिन दीदी कैफे से जुड़ने के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई. अब उन्हें हर महीने 12 हजार रुपये का पक्का वेतन मिलता है. साफ-सुथरी यूनिफॉर्म पहनकर सम्मान के साथ काम करने से उनका आत्मविश्वास काफी बढ़ा है. इसी तरह, पति के अचानक निधन के बाद रुक्मिणी के कंधों पर पूरे परिवार का बोझ आ गया था. आज वह पूरे गर्व के साथ कैफे का काउंटर संभालती हैं और अपने बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च खुद उठा रही हैं.
विस्तार की तैयारी और नए रोजगार
इस प्रोजेक्ट की शानदार कामयाबी को देखते हुए जिला पंचायत ने इसके विस्तार की एक बड़ी योजना तैयार कर ली है. आने वाले समय में भोपाल के 6 और बड़े सरकारी दफ्तरों में नए कैफे खोले जाएंगे. विस्तार के नए खाके में वन भवन के साथ-साथ पुलिस मुख्यालय, सतपुड़ा भवन, विंध्याचल भवन, निर्माण भवन और कोकता आरटीओ परिसर जैसी जगहों को शामिल किया गया है. इन नए सेंटर्स के शुरू होने से शहर की 60 से 80 और महिलाओं को पक्का रोजगार मिलेगा, जिससे उनके परिवार भी आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर बन सकेंगे.




















