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दुनिया भर के नेत्र विशेषज्ञों को पछाड़ते हुए कोटा के डॉ. अर्नव सरोया ने जीता 'यंग ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट ऑफ द ईयर' सम्मानसक्सेस स्टोरी
11 घंटे पहले· 0

दुनिया भर के नेत्र विशेषज्ञों को पछाड़ते हुए कोटा के डॉ. अर्नव सरोया ने जीता 'यंग ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट ऑफ द ईयर' सम्मान

योसिकॉन-2026 में 40 से अधिक देशों के डॉक्टर्स को पीछे छोड़ते हुए राजस्थान के डॉ. अर्नव सरोया ने कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम किए हैं। अब वे उन्नत आई केयर तकनीकें बड़े शहरों से सीधे कोटा लेकर आ रहे हैं।

चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने एक बार फिर वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। हाल ही में संपन्न हुए प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय नेत्र विज्ञान सम्मेलन 'योसिकॉन-2026' में राजस्थान के एक होनहार डॉक्टर ने असाधारण सफलता हासिल की है। शिक्षा नगरी के नाम से मशहूर कोटा शहर के रहने वाले युवा नेत्र विशेषज्ञ डॉ. अर्नव सिंह सरोया ने इस वैश्विक आयोजन में अपनी काबलियत का ऐसा लोहा मनवाया कि दुनियाभर से आए विशेषज्ञ हैरान रह गए। इस भव्य मेडिकल इवेंट में 40 से अधिक देशों के शीर्ष चिकित्सा वैज्ञानिकों, वरिष्ठ सर्जनों और रिसर्चर्स ने हिस्सा लिया था। इतने कड़े कॉम्पिटिशन और दिग्गजों की मौजूदगी के बीच, इस भारतीय सर्जन ने एक के बाद एक कई बड़े सम्मान अपने नाम करके पूरे देश का सिर फख्र से ऊंचा कर दिया है। यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि इसने साबित कर दिया है कि भारत के टियर-2 शहरों का मेडिकल टैलेंट अब दुनिया के किसी भी विकसित देश को टक्कर देने में पूरी तरह से सक्षम है।

'यंग ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट ऑफ द ईयर' का सर्वोच्च सम्मान

इस पूरे सम्मेलन का सबसे बड़ा आकर्षण डॉ. सरोया को मिला वह खास खिताब रहा, जिसका सपना हर युवा नेत्र रोग विशेषज्ञ देखता है। उन्हें 34 वर्ष से कम आयु वर्ग के डॉक्टरों के बीच सबसे प्रतिष्ठित 'यंग ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट ऑफ द ईयर' के खिताब से नवाजा गया। इस अवार्ड की अहमियत इस बात से भी बढ़ जाती है कि इसे प्रदान करने वाली जूरी में देश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थानों के दिग्गज शामिल थे। नई दिल्ली स्थित एम्स की वरिष्ठ नेत्र सर्जन डॉ. नम्रता शर्मा, एम्स नई दिल्ली के ही पूर्व चीफ प्रो. जे. एस. तितियाल और एम्स हैदराबाद के विभागाध्यक्ष डॉ. अरविंद मौर्य जैसे विश्वविख्यात विशेषज्ञों ने अपने हाथों से उन्हें यह ट्रॉफी सौंपी। इन सीनियर्स के हाथों यह सम्मान पाना किसी भी युवा डॉक्टर के करियर के लिए एक बहुत बड़ा मील का पत्थर माना जाता है, जो उनके क्लीनिकल कौशल और सर्जिकल बारीकियों पर मुहर लगाता है।

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एक के बाद एक कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों पर कब्जा

सम्मेलन में डॉ. अर्नव का दबदबा सिर्फ एक ही अवार्ड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने हर प्रमुख श्रेणी में अपनी विशेषज्ञता साबित की। साइंटिफिक सेशन के दौरान, जहां दुनिया भर के रिसर्च पेपर्स पढ़े जा रहे थे, वहां उनकी रिसर्च को सबसे उत्कृष्ट मानते हुए 'बेस्ट कॉर्निया पेपर अवार्ड' दिया गया। इसके अलावा, सर्जिकल स्किल्स को प्रदर्शित करने वाले फिल्म फेस्टिवल सेगमेंट में भी उन्होंने बाजी मारी और उन्हें 'बेस्ट वीडियो अवार्ड' का विजेता घोषित किया गया। उनकी उपलब्धियों के ताज में एक और नगीना तब जुड़ा जब उन्हें 'वाईओएसआई स्टारलाइट अवार्ड' से भी सम्मानित किया गया। इतने सारे मंचों पर उनके शानदार प्रदर्शन और लीडरशिप क्वालिटी को देखते हुए, संस्था ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्हें तुरंत प्रभाव से यंग ऑप्थैल्मोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया की कोर कार्यकारिणी का सदस्य नियुक्त कर दिया गया है, जहां वे अब देश भर के युवा नेत्र सर्जनों का मार्गदर्शन करेंगे।

युवाओं और मेडिकल छात्रों के लिए सफलता का मूलमंत्र

इतनी कम उम्र में इस ऐतिहासिक और अभूतपूर्व सफलता को हासिल करने के बाद भी इस युवा सर्जन के पैर जमीन पर ही टिके हुए हैं। अपनी इस शानदार अचीवमेंट पर खुशी जाहिर करते हुए उन्होंने बताया कि अपने करियर में उन्हें पहले भी कई अहम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्कॉलरशिप्स, ग्रांट्स और अवार्ड्स मिल चुके हैं। हालांकि, ये सभी सम्मान उन्हें कभी भी आराम से बैठने नहीं देते, बल्कि उनके अंदर अपने मरीजों के प्रति और भी अधिक समर्पण भाव जगाते हैं। उनका मानना है कि मेडिकल फील्ड और खासकर ऑप्थल्मोलॉजी में अभी बहुत कुछ नया किया जाना बाकी है। देश के लाखों युवाओं और मेडिकल की पढ़ाई कर रहे छात्रों को सफलता का रास्ता दिखाते हुए डॉ. अर्नव ने कहा, "हमारे हाथ में सिर्फ मेहनत है, अगर हम लगातार हार्ड वर्क करते रहेंगे तो कोई भी चीज हमें लक्ष्य तक पहुंचने से नहीं रोक सकती।"

कोटा में छह दशकों से जारी है आंखों को रोशनी देने का सफर

इस युवा डॉक्टर की यह सफलता कोई रातों-रात हुआ चमत्कार नहीं है, बल्कि इसके पीछे उनके परिवार की एक लंबी और गौरवशाली विरासत है। डॉ. अर्नव एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखते हैं जो पिछले 60 सालों से भी ज्यादा समय से कोटा और पूरे हाड़ौती संभाग के लोगों की आंखों का इलाज कर रहा है। यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके दादाजी पूरे राजस्थान राज्य के सबसे पहले नेत्र विशेषज्ञ थे। उसी महान सेवा भाव को आगे बढ़ाते हुए, उनके पिता और उनकी पत्नी भी पेशे से डॉक्टर हैं और इसी क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। लगभग छह दशकों से यह परिवार बिना थके चिकित्सा जगत में अपना योगदान दे रहा है। एक तरह से कहा जाए तो आंखों का बेहतरीन इलाज करना और मरीजों को नई रोशनी देना इस परिवार के डीएनए का एक अटूट हिस्सा बन चुका है, जिसे अब तीसरी पीढ़ी पूरे विश्व स्तर पर आगे ले जा रही है।

महानगरों की अत्याधुनिक सुविधाएं अब सीधे हाड़ौती में

ज्यादातर युवा डॉक्टर्स बड़ी सफलता मिलने के बाद दिल्ली, मुंबई या विदेशों का रुख कर लेते हैं, लेकिन डॉ. अर्नव का विजन एकदम अलग है। उनका सबसे बड़ा लक्ष्य अपने होमटाउन कोटा और आसपास के हाड़ौती क्षेत्र के मरीजों को वो सारी वर्ल्ड-क्लास सुविधाएं देना है, जिनके लिए उन्हें पहले जयपुर या राष्ट्रीय राजधानी की खाक छाननी पड़ती थी। आज उनके सरोया आई हॉस्पिटल में वो तमाम एडवांस मशीनें और सर्जिकल सेटअप मौजूद हैं, जो किसी भी बड़े मेट्रो शहर के सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल में होते हैं। इसी उच्च स्तरीय इलाज का नतीजा है कि आज सिर्फ कोटा शहर ही नहीं, बल्कि 200 से 300 किलोमीटर दूर के ग्रामीण और कस्बाई इलाकों से भी गंभीर नेत्र रोगों से जूझ रहे मरीज उनके पास आ रहे हैं। इन मरीजों को अब अपने ही इलाके में किफायती और सबसे बेहतर इलाज मिल पा रहा है, जिससे उनके समय और पैसे दोनों की भारी बचत हो रही है।

जटिल से जटिल सर्जरी के लिए उपलब्ध हैं लेटेस्ट तकनीकें

मेडिकल साइंस लगातार तरक्की कर रहा है और डॉ. अर्नव ने यह सुनिश्चित किया है कि उनका अस्पताल किसी भी नई तकनीक से पीछे न रहे। अगर किसी मरीज की आंख की पुतली में कोई गंभीर खराबी आ जाती है, तो उसे ठीक करने के लिए अस्पताल में 'सिंगल पास फोर थ्रो प्यूपिलोप्लास्टी' जैसी बेहद जटिल और बारीक सर्जिकल तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। कई बार मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद कुछ मरीजों की आंख का लेंस अपनी जगह से खिसक जाता है। ऐसे क्रिटिकल मामलों को सुलझाने के लिए उनके पास 'ग्लूइड आईओएल' की सुविधा है, जिसके जरिए नया लेंस फिक्स किया जाता है और मरीज को जीवनभर के लिए सुरक्षित विजन मिल जाता है। इन खास प्रोसीजर्स के अलावा, अस्पताल में कॉर्नियल ट्रांसप्लांट्स से लेकर चश्मा हटाने की दुनिया की सबसे आधुनिक तकनीकें भी की जा रही हैं। इनमें लैसिक सर्जरीज, स्माइल सर्जरीज, सी-लैसिक और लेटेस्ट फेम्टो-लैसिक तकनीक शामिल हैं, जो मरीजों को बिना किसी दर्द के साफ नजर वापस दे रही हैं।

सच्चा आत्मसंतोष मरीजों की मुस्कान में छिपा है

ग्लोबल लेवल पर इतनी तारीफें बटोरने और अंतरराष्ट्रीय दिग्गजों से ट्रॉफी लेने के बावजूद, इस होनहार सर्जन का फोकस अपने काम के असली मकसद पर ही टिका है। उनका साफ मानना है कि मेडिसिन का पेशा सिर्फ अवार्ड्स या मंच की तालियों के लिए नहीं बना है, बल्कि इसका सीधा नाता इंसान की जिंदगी बेहतर बनाने से है। एक डॉक्टर के जीवन में अवार्ड्स की जगह को समझाते हुए उन्होंने एक बहुत ही गहरी बात कही। डॉ. अर्नव ने कहा, "अवॉर्ड्स हमें सफलता याद दिलाते हैं, लेकिन जब मरीज ठीक होकर मुस्कुराता हुआ घर जाता है, तो जीवन में उससे बड़ी कोई आत्मसंतुष्टि नहीं होती।" यह विचार साबित करता है कि उनकी यह ऐतिहासिक जीत सिर्फ उनके हुनर की नहीं, बल्कि उनके सेवाभाव की भी जीत है।

सवाल-जवाब

योसिकॉन-2026 में 'यंग ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट ऑफ द ईयर' का अवार्ड किसे मिला?
यह प्रतिष्ठित अवार्ड कोटा के युवा नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. अर्नव सिंह सरोया को 34 वर्ष से कम आयु वर्ग में दिया गया है।
डॉ. अर्नव सरोया ने इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में कुल कितने अवार्ड जीते?
उन्हें 'यंग ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट ऑफ द ईयर' के अलावा 'बेस्ट कॉर्निया पेपर अवार्ड', 'बेस्ट वीडियो अवार्ड' और 'वाईओएसआई स्टारलाइट अवार्ड' से भी सम्मानित किया गया।
सरोया परिवार कोटा में कितने सालों से आंखों का इलाज कर रहा है?
सरोया परिवार पिछले 60 वर्षों से भी ज्यादा समय से कोटा और हाड़ौती संभाग में नेत्र चिकित्सा की सेवाएं दे रहा है।
कोटा के सरोया आई हॉस्पिटल में मोतियाबिंद ऑपरेशन के बाद लेंस खिसकने पर कौन सी तकनीक इस्तेमाल होती है?
लेंस खिसकने की समस्या को सुलझाने के लिए वहां 'ग्लूइड आईओएल' तकनीक मौजूद है, जिससे नया लेंस सुरक्षित रूप से फिक्स किया जाता है।
डॉ. अर्नव सरोया के दादाजी की क्या ऐतिहासिक उपलब्धि थी?
डॉ. अर्नव के दादाजी पूरे राजस्थान राज्य के सबसे पहले नेत्र विशेषज्ञ (आई स्पेशलिस्ट) थे।
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