बिहार के सीतामढ़ी जिले में एक परिवार ऐसा भी है, जहां डॉक्टर बनना जैसे खानदानी रिवाज बन गया है. तीन पीढ़ियों से इस परिवार के लोग लगातार चिकित्सा के पेशे में उतर रहे हैं और अब तक कुल 17 सदस्य डॉक्टर के तौर पर काम कर चुके हैं. इलाके में इस परिवार की चर्चा एक मिसाल की तरह होती है, क्योंकि शायद ही कोई और परिवार इतनी बड़ी संख्या में डॉक्टर देता है.
इस सिलसिले की शुरुआत डॉ. राजेश कुमार से हुई थी. वे सीतामढ़ी के रघुनाथपुर में बतौर जनरल फिजिशियन मरीजों का इलाज करते थे. डॉ. राजेश कुमार ने यह पेशा कमाई के लिए नहीं, बल्कि समाज की सेवा करने के इरादे से चुना था. परिवार वालों का कहना है कि उन्हीं की मेहनत और उन्हीं के दिखाए रास्ते ने बाद की पीढ़ियों को डॉक्टरी की तरफ मोड़ा. घर में जो माहौल बना, उसमें बच्चों ने पढ़ाई-लिखाई में मेहनत को ही सफलता की कुंजी मान लिया.
तीसरी पीढ़ी भी उसी राह पर
अब परिवार की तीसरी पीढ़ी भी उसी परंपरा को आगे बढ़ा रही है. आनंद डायग्नोस्टिक के निदेशक धर्मेंद्र कुमार ने बताया कि उनके परिवार में जो भी बच्चा मेहनत करता है, वह आगे चलकर डॉक्टर बनने में कामयाब होता है. धर्मेंद्र कुमार खुद एक जाना-माना डायग्नोस्टिक सेंटर चलाते हैं. उनके छोटे भाई डॉ. अमलेंदु कुमार ने रेडियोलॉजी में एमडी (MD) किया है और इसी क्षेत्र में सेवाएं दे रहे हैं. परिवार के बाकी सदस्य और बच्चे भी चिकित्सा की अलग-अलग शाखाओं में विशेषज्ञता हासिल कर चुके हैं और अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं.
पूरे इलाके के लिए प्रेरणा
इस परिवार की वजह से सिर्फ सीतामढ़ी ही नहीं, पूरे राज्य में चिकित्सा सेवा को लेकर एक अलग पहचान बनी है. तीन पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा यह दिखाती है कि अगर घर में सही मार्गदर्शन मिले, बच्चों में लगन हो और सेवा की भावना बनी रहे, तो एक ही परिवार से इतने बड़े पैमाने पर डॉक्टर निकल सकते हैं. स्थानीय लोग भी इस परिवार के योगदान और समर्पण की खुलकर तारीफ करते हैं और इसे बच्चों के लिए एक सीख के तौर पर देखते हैं.




















