बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की गलियों से निकलकर मनोरंजन जगत में अपनी मजबूत पहचान बनाना आसान नहीं होता, लेकिन निलय मिताश ने अपनी अटूट लगन से यह कर दिखाया है। सिनेमाघरों के बाहर टिकट की कतारों में लगने वाला एक आम लड़का जब मुख्य भूमिका निभाने की ठान लेता है, तो रास्ते की कोई भी रुकावट उसका इरादा डिगा नहीं पाती। निलय ने अच्छी तनख्वाह वाली आईटी नौकरी, इंजीनियरिंग का सुरक्षित करियर और परिवार की सहज दिनचर्या को पीछे छोड़ दिया। पूरे चौदह साल के कड़े इम्तिहान और अनगिनत तानों को झेलने के बाद अब वह एक वेब सीरीज में केंद्रीय किरदार निभाते नजर आ रहे हैं।
सिनेमाघरों की टिकट कतारों से जगा था अभिनय का प्रेम
मुजफ्फरपुर शहर में अपने बीते दिनों को याद करते हुए निलय बताते हैं कि फिल्मों को लेकर उनका आकर्षण बचपन के दिनों से ही गहरा रहा है। उस समय शहर के शाम सिनेमा, जवाहर सिनेमा और पार्वती सिनेमाघरों का अपना अलग ही दौर था। नई फिल्मों के प्रदर्शन के वक्त दर्शकों का भारी हुजूम उमड़ता था और टिकट खिड़की पर लंबी लाइनें लगती थीं। कई मौकों पर तो ब्लैक में टिकट खरीदकर शो देखने की नौबत आ जाती थी। इन्हीं सिनेमा हॉलों के बाहर खड़े होकर बड़े पर्दे को निहारते हुए उनके मन में अदाकारी की चिंगारी सुलगने लगी थी, जो उम्र बढ़ने के साथ उनके जीवन का केंद्रीय लक्ष्य बन गई।
मुजफ्फरपुर से मणिपाल और फिर इंफोसिस तक का सफर
निलय की शुरुआती स्कूली शिक्षा मुजफ्फरपुर में ही पूरी हुई। इसके बाद उन्होंने अलग-अलग शहरों में रहकर अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ाया। उन्होंने पटना से दसवीं की बोर्ड परीक्षा पास की और फिर आगे की स्कूली पढ़ाई दिल्ली से पूरी की। तकनीकी शिक्षा के लिए उन्होंने मणिपाल का रुख किया, जहां से उन्होंने इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। पढ़ाई पूरी होते ही उन्हें देश की जानी-मानी आईटी कंपनी इंफोसिस में काम करने का अवसर मिला। वर्ष 2010 के आसपास जब उन्होंने वहां नौकरी शुरू की, तब उनका सालाना पैकेज करीब साढ़े चार लाख रुपये था। उस वक्त वह कॉरपोरेट करियर में आगे बढ़ने के लिए एमबीए की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी में भी जुटे हुए थे।
व्यक्तिगत आघात और जिंदगी का नया मोड़
साल 2012 में उनकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उनके पूरे सोचने के तरीके को बदल दिया। उनकी मां का असामयिक निधन हो गया। इस व्यक्तिगत आघात ने उन्हें भीतर से बुरी तरह झकझोर कर रख दिया। कई महीनों तक वह गहरे मानसिक तनाव में रहे और दफ्तर के कामकाज में उनका मन पूरी तरह उचट गया। इसी मुश्किल समय में उन्होंने बेंगलुरु में एक थिएटर समूह का रुख किया। वह दिन में अपनी नियमित नौकरी करते और शाम होते ही रिहर्सल हॉल में अभिनय की बारीकियां सीखने लगे। रंगमंच पर काम करते हुए उन्हें यह अहसास हुआ कि उनका असली सुकून और जीवन का ध्येय इसी कला में छिपा है।
सड़क हादसे ने सिखाया जीवन का मूल्य
नौकरी छोड़कर मुंबई जाने का विचार जब उन्होंने अपने परिजनों के सामने रखा, तो स्वाभाविक रूप से परिवार ने इसका कड़ा विरोध किया। परिवार का मानना था कि एक सुरक्षित करियर को दांव पर लगाना सही नहीं है। इसी बीच उनके साथ एक सड़क दुर्घटना घट गई। इस हादसे ने उन्हें यह गहराई से महसूस कराया कि जिंदगी बहुत अनिश्चित है और कल का कोई भरोसा नहीं होता। उन्होंने तय किया कि जिस काम में आत्मा को संतुष्टि मिले, उसे करने में देर नहीं करनी चाहिए। इस आत्मबोध के अगले ही दिन उन्होंने इंफोसिस की नौकरी से औपचारिक इस्तीफा दे दिया और अपने सपनों के शहर मुंबई की राह पकड़ ली।
चौदह साल की लंबी तपस्या और तानों का सामना
मुंबई में पैर जमाना और अवसरों को तलाशना बेहद कठिन साबित हुआ। करीब चौदह वर्षों तक उन्हें तरह-तरह के सामाजिक और पेशेवर संकटों से गुजरना पड़ा। ऑडिशन के दौर में कई बार लोगों ने उनका उपहास उड़ाया और तंज कसते हुए पूछा कि क्या वे खुद को शाहरुख खान समझते हैं। इन सब बातों के बावजूद निलय ने कभी छोटे-मोटे या सतही किरदारों से समझौता नहीं किया। उनकी शुरू से ही यह दृढ़ प्रतिज्ञा थी कि जब भी वह पर्दे पर उतरेंगे, मुख्य अभिनेता की भूमिका में ही अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे। इसी जिद ने उन्हें इतने वर्षों तक डटे रहने की मानसिक शक्ति दी।
वेब सीरीज में मुख्य भूमिका और बिहार में शूटिंग
लंबे इंतजार के बाद उनकी मेहनत रंग लाई और उनकी वेब सीरीज 'Hello हम बोल रहे हैं' दर्शकों के सामने आई। यह सीरीज प्रसार भारती के वेव्स ओटीटी प्लेटफॉर्म पर प्रसारित की गई है। इस पूरी परियोजना की सबसे खास बात यह है कि इसका लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा खुद बिहार की वास्तविक लोकेशंस पर फिल्माया गया है। मुजफ्फरपुर के प्रसिद्ध स्पीकर चौक से लेनिन चौक के रास्ते, एलएस कॉलेज परिसर, मोतीपुर के समीप स्थित साढ़ा दरबार गांव और हाजीपुर के विभिन्न इलाकों में कैमरे लगाए गए थे। इस सीरीज में निलय मुख्य किरदार पप्पू प्रसाद पांडे के रूप में दर्शकों का दिल जीत रहे हैं।
परिवार का संबल और नई पीढ़ी को संदेश
निलय अपने संघर्ष के दिनों में परिवार से मिले सहयोग को बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं। हालांकि शुरुआत में परिवार उनके इस फैसले से सहमत नहीं था, लेकिन बाद में उनके पिता ने मुंबई में रहने और भोजन के खर्च की जिम्मेदारी संभालकर उनका साथ दिया। इसके अलावा उनके भाइयों और बहनों ने भी हर मोड़ पर उनका हौसला बढ़ाया। नई पीढ़ी के युवाओं से संवाद करते हुए निलय का कहना है कि किसी भी कला या पेशे में टिकाऊ मुकाम पाने के लिए धीरज और सतत परिश्रम का कोई विकल्प नहीं है। सोशल मीडिया पर डेढ़ मिनट की रील से मिलने वाली वाहवाही कभी स्थायी पहचान नहीं दे सकती। वह मानते हैं कि अगर इंसान अपने जीवन के विकल्पों में से हार मानने का विचार पूरी तरह निकाल दे, तो एक दिन सफलता जरूर कदम चूमती है।



















