मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले से करीब 10 किलोमीटर दूर बसे बिरोदा गांव में एक किसान परिवार में जन्मे दिनेश महाजन ने वह कर दिखाया है जो गांव के लिए मिसाल बन गया है। खेती करने वाले पिता और घर संभालने वाली मां की कोई औपचारिक पढ़ाई नहीं हुई, फिर भी उन्होंने अपने बेटे को पढ़ाने के लिए खेतों में जमकर मेहनत की। आज 29 साल की उम्र में दिनेश ने एमपीपीएससी यानी मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर परिवार का नाम रोशन किया है।
अनपढ़ माता-पिता ने बेटे की शिक्षा के लिए झोंकी मेहनत
दिनेश के पिता गोपाल महाजन पेशे से किसान हैं और मां लक्ष्मीबाई गृहिणी हैं। दोनों ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा, लेकिन बेटे की पढ़ाई में कोई कमी न रह जाए, इसके लिए उन्होंने खेतों में दिन-रात मेहनत की। बचपन से ही दिनेश को पढ़ाई-लिखाई से गहरा लगाव था और यही लगाव आगे चलकर उनकी कामयाबी की बुनियाद बना।
सात सरकारी नौकरियां क्रैक कीं, फिर भी नहीं मिला मन का मुकाम
दिनेश ने अब तक सात सरकारी नौकरियां क्रैक की हैं, लेकिन हर बार मनचाही नौकरी नहीं मिलने पर उन्होंने ज्वाइनिंग नहीं की और तैयारी जारी रखी। उन्होंने सबसे पहले पीएचडी पूरी की, जिससे उन्हें डॉक्टर की उपाधि मिली। इसके बाद उन्होंने एमपी पुलिस एसएससी, पोस्ट ऑफिस, शिक्षक भर्ती और एमपीपीएससी समेत कई वैकेंसी में आवेदन किया और परीक्षाएं भी पास कीं, लेकिन इनमें से किसी भी नौकरी को ज्वाइन नहीं किया। इसकी वजह साफ थी, उनका सपना हमेशा से शिक्षा क्षेत्र में जाने का था।
एमपीपीएससी में चयन, सहायक अध्यापक के पद पर मिली पोस्टिंग
दिनेश का कहना है कि उनका सपना एजुकेशन में जाने का था और उनकी लिखने की भी अच्छी क्षमता थी, इसलिए वह चाहते थे कि उन्हें शिक्षा क्षेत्र में ही अच्छा पद मिले। हाल ही में एमपीपीएससी में उनका चयन सहायक अध्यापक के पद पर हुआ है। इसके अलावा उन्हें प्रधानाध्यापक के पद पर भी पदस्थ किया गया है और वह यह नौकरी ज्वाइन करेंगे। दिनेश का लक्ष्य मध्य प्रदेश के शिक्षा क्षेत्र में अच्छा काम करना है, क्योंकि उन्होंने खुद बेहद मुश्किल हालात में पढ़ाई पूरी की है।
22 साल की उम्र में लिख दी थी पहली किताब
दिनेश ने बताया कि उन्होंने महज 22 साल की उम्र में अपनी पहली किताब लिख दी थी, जो महिलाओं और महिला सशक्तीकरण के विषय पर केंद्रित थी। इसके बाद जब उन्हें दूसरी किताब लिखने का मौका मिला, तो देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी ने इस किताब को प्रकाशित किया। हाल ही में उन्होंने अपनी तीसरी किताब भी लिख ली है। यानी महज सात साल के भीतर दिनेश तीन किताबें लिख चुके हैं, जिन्हें मध्य प्रदेश सरकार ने भी जारी किया है।
तीनों भाई-बहन आज सरकारी नौकरी में
दिनेश के माता-पिता भले ही शिक्षित नहीं हैं, लेकिन उन्होंने अपने तीनों बच्चों को पढ़ाया-लिखाया। नतीजा यह है कि आज तीनों भाई-बहन सरकारी नौकरियों में कार्यरत हैं। दिनेश की यह कहानी बिरोदा गांव ही नहीं, बल्कि पूरे बुरहानपुर जिले के लिए एक प्रेरणा बन गई है।


















