हवाई सफर के दौरान जब विमान उड़ान भरने की तैयारी में होता है, तो केबिन क्रू की ओर से सभी यात्रियों को अपने मोबाइल फोन एयरप्लेन मोड पर डालने का स्पष्ट निर्देश दिया जाता है। कई मुसाफिरों के मन में यह सवाल उठता है कि आधुनिक तकनीक के इस दौर में चंद मोबाइल सिग्नलों से इतने बड़े विमान पर क्या असर पड़ सकता है। दरअसल यह प्रक्रिया केवल एक नियम भर नहीं है, बल्कि आकाश में उड़ते विमान के अत्यंत संवेदनशील संचार और दिशा-सूचक तंत्र को बिना किसी बाधा के संचालित करने के लिए बेहद जरूरी तकनीकी एहतियात है।
मोबाइल नेटवर्क और सेल टावरों की लगातार खोज
जब कोई व्यक्ति जमीन पर होता है, तो उसका फोन आसपास के एक तय सेल टावर से जुड़ा रहता है और जरूरत पड़ने पर सिग्नल खुद-ब-खुद दूसरे टावर पर शिफ्ट हो जाते हैं। आसमान में हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थिति पूरी तरह बदल जाती है, क्योंकि विमान सैकड़ों किलोमीटर प्रति घंटे की तेज रफ्तार से आगे बढ़ता है। ऐसे में फोन का नेटवर्क रिसीवर लगातार मजबूत सिग्नल की तलाश में अपनी पूरी क्षमता से काम करने लगता है। वह जमीन पर मौजूद अनगिनत टावरों से एक साथ जुड़ने और बार-बार स्विच करने की होड़ में लग जाता है।
रेडियो तरंगों का टकराव और तकनीकी व्यवधान
यदि विमान में बैठे सैकड़ों यात्री एक ही समय में अपना सेल्युलर नेटवर्क सक्रिय रखते हैं, तो इतने सारे फोन एक साथ जमीन के टावरों से जुड़ने के लिए रेडियो फ्रीक्वेंसी प्रसारित करेंगे। रेडियो सिग्नलों की यह भारी भीड़ आपस में टकराकर इंटरफेरेंस यानी रेडियो रुकावट पैदा कर सकती है। कॉकपिट में मौजूद पायलटों को जमीनी एयर ट्रैफिक कंट्रोलर्स से निरंतर बातचीत करनी होती है। अत्यधिक रेडियो तरंगों का यह कोलाहल पायलटों के हेडसेट में कर्कश आवाज पैदा कर सकता है और ग्राउंड कंट्रोल से मिलने वाले अहम संदेशों को सुनने में दिक्कत खड़ी कर सकता है।
आधुनिक सुरक्षा उपाय और समझदारी भरा कदम
कई लोगों के बीच यह भ्रांति पाई जाती है कि किसी एक यात्री द्वारा फोन फ्लाइट मोड पर न करने से विमान में तुरंत कोई खराबी आ जाएगी या वह दुर्घटनाग्रस्त हो जाएगा। आज के समय में बने आधुनिक यात्री विमानों के डिजिटल उपकरण बहुत मजबूत और कई प्रकार की रेडियो रुकावटों को आसानी से सहने के लिए डिजाइन किए जाते हैं। इसके बावजूद विमानन सुरक्षा में शून्य जोखिम की नीति अपनाई जाती है। किसी भी अप्रत्याशित सिग्नल को उड़ान नियंत्रण, रडार या नेविगेशन उपकरणों के नजदीक भटकने न देना ही इस नियम का सबसे बड़ा आधार है।
इन-फ्लाइट वाई-फाई और ब्लूटूथ का इस्तेमाल
एयरप्लेन मोड चालू करने का सीधा अर्थ यह होता है कि फोन का मुख्य सेल्युलर ट्रांसमीटर बंद हो जाता है और वह मोबाइल टावर खोजने का काम रोक देता है। आधुनिक स्मार्टफोन्स में यह सुविधा होती है कि फ्लाइट मोड एक्टिव रहने पर भी उपयोगकर्ता अलग से वाई-फाई या ब्लूटूथ चालू कर सकते हैं। आज कई वैश्विक एयरलाइंस अपनी उड़ानों में विशेष इन-फ्लाइट वाई-फाई नेटवर्क उपलब्ध कराती हैं। इस प्रकार की तकनीक विमान के आंतरिक तंत्र के अनुसार सुरक्षित साबित की गई होती है, जिससे यात्री सुरक्षित दायरे में रहकर इंटरनेट सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं।
केबिन क्रू के दिशा-निर्देशों का महत्व
दुनियाभर के अलग-अलग देशों और विमानन प्राधिकरणों के सुरक्षा नियम थोड़े बहुत भिन्न हो सकते हैं। कुछ उड़ानों में टेकऑफ और लैंडिंग के समय सभी तरह के वायरलेस ट्रांसमिशन पर पूर्ण रोक होती है, जबकि स्थिर ऊंचाई पर पहुंचने के बाद ब्लूटूथ हेडफोन या वाई-फाई के प्रयोग की ढील दी जाती है। विमान के भीतर सुरक्षित माहौल बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि यात्री हमेशा क्रू सदस्यों की घोषणाओं को ध्यान से सुनें और उनका पूरी ईमानदारी से पालन करें।



















