भारतीय मुद्रा पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जो सफेद खादी धोती वाली पहचान अंकित है, उसका गहरा ऐतिहासिक तार उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर से जुड़ा हुआ है। देश के स्वाधीनता संग्राम में मथुरा का योगदान केवल 1947 की आजादी तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि 1919 और विशेषकर 1921 के आंदोलनों की स्मृतियां भी इस पावन नगरी से मजबूती से जुड़ी हुई हैं। इतिहासकारों के अनुसार, 1921 में जब बापू मथुरा पहुंचे थे, तभी से विदेशी कपड़ों के बहिष्कार और सादे खादी वस्त्रों को स्थायी रूप से धारण करने का एक निर्णायक मोड़ सामने आया था। वही खादी की सफेद धोती आगे चलकर उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बनी और आज भारतीय नोटों पर ऐतिहासिक प्रतीक के रूप में मौजूद है।
स्वाधीनता संग्राम के आंदोलनों और मथुरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इतिहासकार डॉक्टर सुरेश चंद्र शर्मा के अनुसार, मथुरा स्वतंत्रता आंदोलन के कई बड़े घटनाक्रमों का साक्षी रहा है। 1947 की आजादी की लड़ाई की अलख जगाने में यहां की जनचेतना ने अहम भूमिका निभाई थी। इससे पहले वर्ष 1919 के विरोध प्रदर्शनों और 1921 के जन आंदोलन के दौरान भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत के स्वर मथुरा की धरती से मुखर हुए थे। इन सभी घटनाक्रमों में वर्ष 1921 की यात्रा सबसे अधिक प्रभावशाली साबित हुई, जिसने महात्मा गांधी के पहनावे और उनके संदेश की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।
ट्रेन यात्रा में मजदूरों का जवाब और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार
वर्ष 1921 के उस अहम घटनाक्रम का विवरण देते हुए बताया गया है कि जब महात्मा गांधी मदुरै से रेल मार्ग द्वारा मथुरा की ओर यात्रा कर रहे थे, तब रास्ते में उन्होंने कई मजदूरों को विदेशी कपड़े पहने देखा। बापू ने जब उन श्रमिकों से सीधा सवाल किया कि वे विदेशी वस्त्र क्यों पहनते हैं जबकि इससे सीधा मुनाफा अंग्रेजी हुकूमत को पहुंचता है, तो मजदूरों ने अपनी आर्थिक लाचारी जाहिर की। श्रमिकों ने स्पष्ट कहा कि विदेशी वस्त्र खादी की तुलना में उन्हें काफी सस्ते पड़ते हैं, इसलिए वे इन्हें खरीदने को मजबूर हैं।
जब ट्रेन मथुरा रेलवे स्टेशन पर पहुंची और महात्मा गांधी वहां आयोजित एक जनसभा को संबोधित करने पहुंचे, तो वहां का दृश्य देखकर वे हैरान रह गए। सभा में मौजूद अधिकांश स्थानीय लोगों ने भी स्वदेशी खादी के बजाय विदेशी कपड़े ही पहन रखे थे। जब बापू ने उपस्थित जनसमूह से इस संबंध में कारण पूछा, तो उन्हें भी वही उत्तर मिला कि खादी के मुकाबले विदेशी मिलों का कपड़ा सस्ता और आसानी से उपलब्ध है।
वस्त्र त्याग और आजीवन खादी की सफेद धोती धारण करने का संकल्प
आम जनता और श्रमिकों की इस विवशता ने महात्मा गांधी के अंतर्मन को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया। उन्होंने महसूस किया कि जब तक वे स्वयं आम जनता जैसी सादगी और त्याग का उदाहरण प्रस्तुत नहीं करेंगे, तब तक स्वदेशी का आह्वान प्रभावी नहीं होगा। उसी क्षण उन्होंने अपने तत्कालीन वस्त्रों को त्याग दिया और विदेशी कपड़ों की होली जलाते हुए केवल सफेद खादी की धोती धारण करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। इसके बाद से देश भर में उनकी जितनी भी यात्राएं हुईं, वे उसी सादी धोती में संपन्न हुईं।
दांडी नमक यात्रा से लेकर अंतिम सांस तक रहा खादी का साथ
डॉक्टर सुरेश चंद्र शर्मा ने रेखांकित किया कि 1921 में मथुरा से अपनाया गया यह सादगी भरा पहनावा महात्मा गांधी के साथ उनके अंतिम क्षणों तक बना रहा। जब उन्होंने ब्रिटिश नमक कानून के खिलाफ अपनी प्रसिद्ध नमक यात्रा शुरू की थी, तब भी इसी वेशभूषा में उन्होंने पूरे देश से खादी अपनाने और आत्मनिर्भर बनने का पुरजोर आह्वान किया था। वर्तमान समय में भारतीय नोटों पर अंकित बापू की जो सौम्य तस्वीर पूरे सम्मान के साथ देखी जाती है, उसमें नजर आने वाले खादी के वस्त्र मथुरा के उसी ऐतिहासिक त्याग और संकल्प की अनवरत याद दिलाते हैं।





















