उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में कैलाश मार्ग से होकर गुजरने वाले घने जंगलों के बीच एक पुरानी और रहस्यमयी इमारत स्थित है, जिसे स्थानीय लोग श्याम कुटी के नाम से जानते हैं। ब्रिटिश हुकूमत के समय तैयार की गई यह ऐतिहासिक इमारत पिछले लगभग 50 सालों से पूरी तरह वीरान पड़ी हुई है। चारों तरफ फैले घने पेड़-पौधे और सुनसान वातावरण इस जगह को और अधिक रहस्यमयी बना देते हैं। स्थानीय निवासियों के बीच इस भवन को लेकर तरह-तरह की अजीबोगरीब धारणाएं और डरावनी कहानियां प्रचलित हैं, जिसके कारण शाम ढलते ही आसपास के लोग इस दिशा में कदम रखने से भी बचते हैं।
ब्रिटिश हुकूमत के दौर और धौलपुर रियासत से जुड़ा इतिहास
इस इमारत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को लेकर परिसर में रह रहे देवकी बाबा ने अहम जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि इस भवन की नींव अंग्रेजों के शासनकाल में रखी गई थी। धौलपुर रियासत के राजा के दरबार में तैनात मंत्री श्याम ने इस आलीशान भवन का निर्माण कराया था। मंत्री श्याम की अपनी कोई संतान नहीं थी। उनके बाद इस संपत्ति की देखरेख करने वाला कोई प्रत्यक्ष वारिस नहीं बचा, जिसकी वजह से धीरे-धीरे यह पूरी इमारत खाली हो गई और लंबे समय तक ताले में बंद रही।
इमारत के सुनसान होने के कई सालों बाद करीब 15 वर्ष की उम्र में एक महात्मा यहां पहुंचे और उन्होंने इसी स्थान को अपना डेरा बना लिया। उस साधु ने अपना पूरा जीवन इसी कुटी में बिताया और लगभग 70 वर्ष की आयु में इसी परिसर के भीतर उनका निधन हो गया। देवकी बाबा के अनुसार, वे महात्मा भी अपने जीवनकाल में अक्सर परिसर के भीतर अजीबोगरीब ध्वनियों और परछाइयों का जिक्र किया करते थे। महात्मा के निधन के बाद यह जगह दोबारा एकांत और वीराने में तब्दील हो गई।
सफेद लिबास की आकृतियां और 50 साल पुरानी कहानियां
श्याम कुटी को लेकर क्षेत्र में डर का माहौल अचानक पैदा नहीं हुआ, बल्कि इसकी जड़ें आधी सदी पुरानी हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, करीब 50 साल पहले यहां से गुजरने वाले ग्रामीणों ने रात के सन्नाटे में अजीब आवाजें सुनने और सफेद कपड़ों में किसी रहस्यमयी आकृति को घूमते हुए देखने का दावा किया था। समय के साथ यह बात गांव-गांव फैल गई और लोगों ने इसे भूतिया हवेली मानना शुरू कर दिया।
परिसर में रह रहे देवकी बाबा बताते हैं कि जब वे खुद शुरुआती दिनों में इस जगह पर रहने आए थे, तब उन्हें भी आसपास कुछ असाधारण ध्वनियां सुनाई देती थीं और इंसानी आकृतियों के मौजूद होने का आभास होता था। लगातार देखरेख के अभाव में अब इमारत के कई हिस्से जर्जर हो चुके हैं, जिससे इसका ढांचा और अधिक भयावह दिखाई देता है। यद्यपि इन तमाम बातों का कोई वैज्ञानिक आधार या प्रमाण मौजूद नहीं है, फिर भी स्थानीय किस्सों ने इस कुटी के प्रति कौतूहल और भय दोनों को बनाए रखा है।
बुरी शक्तियों के निवारण के लिए दीवारों पर बहुभाषी मंत्र
इस ऐतिहासिक भवन की सबसे अनोखी विशेषता इसकी दीवारों पर की गई लिखावट है। परिसर में कथित अप्राकृतिक गतिविधियों और भय के वातावरण को समाप्त करने के लिए पुराने समय में यहां बड़े पैमाने पर पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठान करवाए गए थे। इसी क्रम में इमारत के बिल्कुल मध्य भाग में विभिन्न भाषाओं और धर्मों से जुड़े पवित्र मंत्र और आयतें अंकित करवाई गईं।
देवकी बाबा के विवरण के अनुसार, कुटी की दीवारों पर हिंदू धर्म से जुड़े कल्याणकारी मंत्र हिंदी में लिखे गए हैं, ईसाई धर्म की पवित्र प्रार्थनाएं अंग्रेजी भाषा में उकेरी गई हैं, जबकि इस्लाम धर्म की पवित्र कुरान की आयतें उर्दू लिपि में दर्ज हैं। इन बहुधार्मिक पंक्तियों को लिखवाने के पीछे का मुख्य उद्देश्य नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करना और किसी भी भटकती हुई आत्मा को शांति प्रदान करना था। आज भी यह विचित्र संगम इतिहास और लोककथाओं के बीच कौतूहल का केंद्र बना हुआ है।



















