आंध्र प्रदेश के आगामी स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। अदालती मंच पर आरक्षण संबंधी नीतिगत फैसलों को कानूनी मंजूरी न मिलने के बाद अब सत्तारूढ़ तेलुगु देशम पार्टी ने संगठनात्मक स्तर पर बड़ा सियासी कदम उठाया है। मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी स्थानीय निकाय चुनावों में पिछड़े वर्गों के प्रत्याशियों को 34 प्रतिशत से अधिक टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारेगी। यह कदम प्रशासनिक आरक्षण लागू न हो पाने की स्थिति में पिछड़े वर्गों को राजनीतिक हिस्सेदारी देने की दिशा में एक वैकल्पिक रणनीति के रूप में सामने आया है।
कोंडेपी में जनसभा के दौरान मुख्यमंत्री का ऐलान
मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने प्रकाशम जिले के कोंडेपी में आयोजित ‘मी भूमि – मी हक्कू’ ग्राम स्तरीय बैठक में इस नीति का खुलासा किया। जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि स्थानीय निकाय चुनावों में टीडीपी 34 फीसदी से अधिक सीटों पर पिछड़े वर्ग के उम्मीदवारों को मैदान में उतारेगी। नायडू ने इस बात पर बल दिया कि पिछड़े समुदायों के हितों की रक्षा करना और उन्हें आगे बढ़ाना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है।
अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने टीडीपी और पिछड़े वर्गों के ऐतिहासिक जुड़ाव को रेखांकित किया। उन्होंने उल्लेख किया कि पार्टी पिछले 45 वर्षों से इन समुदायों के अटूट समर्थन के दम पर आगे बढ़ी है। नायडू के अनुसार, पिछड़े वर्गों के सामाजिक तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व को मजबूत करने के लिए पार्टी ने निरंतर कार्य किया है। इसी मंच से उन्होंने पूर्ववर्ती वाईएसआरसीपी सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि विपक्षी दल ने पिछड़े वर्गों के राजनीतिक सशक्तिकरण की राह में रुकावटें पैदा की थीं।
आरक्षण का इतिहास और राजनीतिक टकराव
आंध्र प्रदेश की राजनीति में स्थानीय निकायों के भीतर पिछड़े वर्गों के आरक्षण का विषय दशकों से तीव्र विमर्श का केंद्र रहा है। मुख्यमंत्री ने अपनी बात रखते हुए पूर्व मुख्यमंत्री एनटी रामाराव के योगदान का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि एनटी रामाराव ने ही स्थानीय शासन में पिछड़े वर्गों के लिए सबसे पहले 24 प्रतिशत आरक्षण की नींव रखी थी। नायडू ने दावा किया कि उनके पिछले कार्यकाल में इस कोटे को बढ़ाकर 34 प्रतिशत तक पहुंचाया गया था।
नायडू ने पिछली वाईएसआरसीपी सरकार पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि उनके शासनकाल में आरक्षण का दायरा घटाकर दोबारा 24 प्रतिशत कर दिया गया था। मुख्यमंत्री का दावा है कि इस कटौती के कारण लगभग 16,800 लोगों के स्थानीय स्तर पर नेतृत्व संभालने के अवसर प्रभावित हुए। हालांकि यह आंकड़ा मुख्यमंत्री का निजी दावा है और इसे किसी स्वतंत्र या प्रमाणित स्त्रोत के रूप में नहीं देखा जा सकता। अगस्त 2026 में मौजूदा सरकार ने ग्रामीण और शहरी दोनों तरह के निकायों में पिछड़े वर्गों के लिए 34 प्रतिशत आरक्षण को बहाल करने के उद्देश्य से नए सरकारी आदेश जारी किए थे, ताकि स्थानीय प्रशासन में उनकी हिस्सेदारी बढ़ाई जा सके।
हाई कोर्ट में कानूनी अड़चन और 50 फीसदी की सीमा
राज्य सरकार द्वारा अगस्त 2026 में जारी आदेशों को अदालत में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सरकार पर्याप्त सामाजिक और अनुभवजन्य आंकड़ों के अभाव में कोटे का दायरा नहीं बढ़ा सकती। इसके अतिरिक्त अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के कुल आरक्षण के 50 प्रतिशत की संवैधानिक सीमा को पार करने का विषय भी कानूनी जांच के दायरे में आ गया।
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने 1 अक्टूबर 2026 को सरकार के उन आदेशों को निरस्त कर दिया, जिनके तहत आरक्षण सीमा 34 प्रतिशत तय की गई थी। उच्च न्यायालय ने पाया कि इस बढ़ोतरी को न्यायसंगत ठहराने के लिए अनिवार्य अनुभवजन्य आंकड़े पर्याप्त रूप से पेश नहीं किए गए थे। अदालत ने रेखांकित किया कि किसी समुदाय की आबादी का केवल संदर्भ देना कानूनी दृष्टि से पर्याप्त नहीं होता, बल्कि 50 प्रतिशत की ऊपरी सीमा से आगे जाने के लिए ठोस और प्रासंगिक आंकड़े अनिवार्य होते हैं। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग और सरकार को निर्देश दिया कि वे छह सप्ताह के भीतर स्थानीय निकाय चुनाव कराने की प्रक्रिया शुरू करने का प्रयास करें।
सुप्रीम कोर्ट से अपील खारिज
हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ आंध्र प्रदेश सरकार ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया। 9 अक्टूबर 2026 को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान सरकारी वकीलों ने तर्क दिया कि 34 प्रतिशत कोटे के पक्ष में पर्याप्त जनसांख्यिकीय और अनुभवजन्य सामग्री मौजूद है।
पीठ ने सरकार की दलीलों से असहमति जताते हुए हाई कोर्ट के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी। शीर्ष अदालत का मानना था कि उपलब्ध दस्तावेज आरक्षण को 50 प्रतिशत की सीमा से परे ले जाने का मजबूत आधार नहीं बनाते। इस अदालती रुख के बाद अगस्त 2026 में जारी सरकारी आदेश निष्प्रभावी हो गए हैं, जिसका सीधा अर्थ है कि आगामी चुनाव अब मौजूदा कानूनी प्रावधानों और तय सीमाओं के भीतर ही संपन्न होंगे।
मतदाता सूची पुनरीक्षण और चुनाव की समयसीमा
आरक्षण के कानूनी विवाद के साथ ही राज्य में स्थानीय निकाय चुनावों के समय को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल खड़े हो रहे हैं। राज्य में मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) चल रहा है। इस प्रशासनिक कवायद के चलते यह चर्चा शुरू हो गई थी कि क्या अंतिम संशोधित सूची तैयार होने तक चुनाव टाले जाने चाहिए। 9 अक्टूबर 2026 को शीर्ष अदालत की कार्यवाही के दौरान चुनावी प्रक्रिया को समय पर आगे बढ़ाने और अदालती निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने पर भी विचार हुआ, जिससे स्पष्ट है कि राज्य में चुनावी प्रक्रिया जल्द ही औपचारिक रूप से गति पकड़ेगी।























