विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के समूह जी20 के व्यापार मंत्रियों के बीच गुरुवार को संपन्न हुई अहम बातचीत में औद्योगिक क्षेत्रों में जरूरत से ज्यादा उत्पादन और बाजारों में कौड़ियों के भाव माल उतारने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाने के लिए कोई आम सहमति नहीं बन पाई। अमेरिकी पक्ष का स्पष्ट तर्क रहा कि विदेशी प्रतिस्पर्धियों द्वारा घरेलू जरूरतों से कहीं अधिक सामान तैयार करने और फिर उसे वैश्विक बाजारों में झोंकने से अमेरिकी कारखानों और कामगारों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। बैठक की समाप्ति के बाद अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने औपचारिक चर्चा को रचनात्मक बताया, हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि आपूर्ति से जुड़े इस जटिल विषय पर सभी सदस्य देशों का एकमत होना संभव नहीं हो सका।
मांग से अधिक उत्पादन और अनुचित व्यापार व्यवस्था पर अमेरिका का कड़ा रुख
अमेरिकी वार्ताकारों ने जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय साझेदार अपनी वास्तविक मांग की तुलना में कई गुना अधिक विनिर्माण क्षमताएं खड़ी कर रहे हैं। इस नीति का सीधा असर यह होता है कि वैश्विक बाजारों में वस्तुओं की कीमतें तेजी से गिरती हैं और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का संतुलन पूरी तरह गड़बड़ा जाता है। जैमीसन ग्रीर के अनुसार, बैठक में लगभग सभी भागीदार देशों ने यह माना कि यह एक ऐसी चुनौती है जिस पर त्वरित और निर्णायक कार्रवाई जरूरी है। इसके साथ ही उन्होंने यह रेखांकित भी किया कि इस संकट से निपटने के लिए दुनिया की वर्तमान व्यापारिक व्यवस्था, सुधारात्मक उपाय और जवाब देने के मौजूदा तंत्र पूरी तरह नाकाफी साबित हो रहे हैं।
चीन समेत कई देशों की व्यापार नीतियों पर सवाल
अमेरिकी प्रशासन विनिर्माण में जरूरत से ज्यादा उत्पादन के संकट के लिए मुख्य रूप से चीन को जिम्मेदार ठहराता है, लेकिन उसकी जांच का दायरा केवल एक देश तक सीमित नहीं है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने नॉर्वे से लेकर बांग्लादेश तक के विभिन्न देशों के विनिर्माण तौर-तरीकों की पड़ताल शुरू की है। वाशिंगटन का मानना है कि चीनी स्टील के भारी दबाव के अतिरिक्त ऑटोमोबाइल, आधुनिक बैटरी तकनीक, पेपर और सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक उद्योगों में भी मांग से अधिक उत्पादन का गहरा संकट बना हुआ है, जिसके चलते अमेरिकी विनिर्माता वैश्विक पटल पर प्रतिस्पर्धियों के सामने पिछड़ रहे हैं।
मिल्वॉकी वार्ता में अमेरिका और कनाडा के बीच गतिरोध बरकरार
मिल्वॉकी में आयोजित इस मंत्रिस्तरीय बैठक में अमेरिका और उसके पड़ोसी देश कनाडा के बीच चल रहे गंभीर व्यापारिक टकराव को सुलझाने में कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिल सकी। दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में गर्मियों के बाद से ही तल्खी लगातार बढ़ती चली गई है। विवाद की शुरुआत तब और गहरी हुई जब डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा से आने वाले करीब 20 अरब अमेरिकी डॉलर के आयात पर 50 प्रतिशत का भारी टैरिफ लगा दिया। इसके तुरंत बाद कनाडा ने भी जवाबी कदम उठाते हुए अमेरिकी सामानों पर अपने स्तर से टैरिफ लागू कर दिए।
द्विपक्षीय संबंधों में तनाव इस हफ्ते तब और बढ़ गया जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा के करीब एक अरब अमेरिकी डॉलर के आयात पर सीधा प्रतिबंध घोषित कर दिया, जिसमें शराब, डेयरी उत्पाद और मोटरसाइकिल जैसी श्रेणियां शामिल हैं। वार्ता की स्थिति स्पष्ट करते हुए जैमीसन ग्रीर ने कहा, "हकीकत यह है कि कुछ ऐसे मुद्दे अब भी पेंडिंग हैं, जिनका समाधान करना काफी मुश्किल है।" दूसरी ओर, कनाडा के व्यापार मंत्री मनिंदर सिद्धू ने मतभेद भुलाकर साथ काम करने पर बल दिया और कहा, "आपके सामने भी उन्हीं में से कुछ चुनौतियां हैं, जिनका हम सामना कर रहे हैं। आइए, एक-दूसरे की मदद करें और मिलकर इसका समाधान निकालें।"
बंधुआ मजदूरी से तैयार सामान के आयात पर रोक की मांग
इस बहुपक्षीय व्यापार बैठक में बंधुआ मजदूरी के जरिए तैयार होने वाले सामान के आयात पर प्रतिबंध लगाने के संवेदनशील मामले पर भी कोई सर्वसम्मत सहमति नहीं बन पाई। जैमीसन ग्रीर ने वार्ता के इस पहलू पर निराशा व्यक्त की। ग्रीर ने कहा, "यकीन करना मुश्किल है, लेकिन G20 में ऐसे देश हैं जो बंधुआ मजदूरी से बने सामान के आयात पर रोक लगाने के लिए प्रतिबद्ध नहीं होना चाहते।" उन्होंने आगे दो टूक लहजे में स्पष्ट किया कि दुनिया अच्छी तरह जानती है कि बंधुआ मजदूरी पूरी तरह गलत है, यह निष्पक्ष घरेलू बाजारों की स्थिति को बिगाड़ती है और वे अपने बाजारों में इसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं करेंगे।















