चीन सरकार ने अपनी सीमाओं पर चौकसी बढ़ाने और देश से बाहर होने वाले तकनीकी रिसाव को रोकने के लिए अप्रवासन और विदेश यात्रा नियमों में बड़े बदलावों की घोषणा की है। बीजिंग प्रशासन ने सीमा नियंत्रण और राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने के इरादे से एक विस्तृत नीतिगत ढांचा तैयार किया है। नया कानून 15 सितंबर 2026 से पूरे देश में प्रभावी हो जाएगा। पहली नजर में प्रशासनिक दिखने वाले इस निर्णय का मुख्य आधार वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा, रणनीतिक उद्योगों की सुरक्षा और बौद्धिक संपदा को बचाना है।
19 अनुच्छेदों का नया ढांचा और कड़े प्रतिबंध
चीन की स्टेट काउंसिल द्वारा जारी किए गए 19 अनुच्छेदों वाले इस नए नियम के तहत विदेश जाने वाले नागरिकों से गहन पूछताछ की जा सकेगी। सीमा सुरक्षा और वीजा अधिकारी अब यात्रा के सटीक कारणों की पड़ताल करेंगे, अतिरिक्त दस्तावेज मांग सकेंगे और किसी भी व्यक्ति के आवेदन की विस्तृत बैकग्राउंड जांच कर सकेंगे। यदि जांच के दौरान अधिकारियों को यह अंदेशा होता है कि कोई व्यक्ति संवेदनशील चीनी तकनीकों, औद्योगिक रहस्यों या निर्यात नियंत्रण नियमों का उल्लंघन कर सकता है, तो उसकी विदेश रवानगी को तुरंत रोका जा सकता है। इसके अतिरिक्त, विदेशों की यात्रा कराने वाली सभी निजी व व्यावसायिक ट्रैवल एजेंसियों के लिए सरकार के पास नया पंजीकरण कराना अनिवार्य कर दिया गया है।
टेक्नोलॉजी वॉर और रणनीतिक क्षेत्रों की सुरक्षा
अमेरिका और चीन के बीच जारी उच्च तकनीक युद्ध के कारण बीजिंग ने यह कदम उठाया है। वॉशिंगटन ने सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और अत्याधुनिक माइक्रोचिप्स के निर्यात पर चीन पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। इसके जवाब में चीन ने रेयर अर्थ खनिजों, उन्नत बैटरी तकनीकों और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपने निर्यात पर कड़े नियंत्रण लागू किए हैं। बीजिंग प्रशासन को आशंका है कि उसके कुशल वैज्ञानिक, शोधकर्ता और इंजीनियर विदेश जाकर संवेदनशील बौद्धिक संपदा साझा कर सकते हैं। चीनी कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी नुकसान के होने का इंतजार करने के बजाय संभावित खतरे को पहले ही रोकना सरकार की प्राथमिकता है, इसलिए केवल संदेह के आधार पर भी किसी नागरिक की विदेश यात्रा सीमित की जा सकती है।
जापान और पश्चिमी देशों पर संभावित असर
इन नियमों में सीधे तौर पर किसी देश का नाम दर्ज नहीं है, लेकिन चीनी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि नागरिकों को उच्च जोखिम वाले देशों की यात्रा के प्रति आगाह किया जाएगा। इस सूची में राजनीतिक और रणनीतिक वजहों से जापान शीर्ष पर है। ताइवान मुद्दे, पूर्वी चीन सागर में जारी विवाद और तकनीकी होड़ के कारण चीन और जापान के बीच कूटनीतिक तनाव पहले से बना हुआ है। नए प्रतिबंधों से जापान जाने वाले चीनी शोधकर्ताओं, पेशेवरों और पर्यटकों की आवाजाही प्रभावित होना तय माना जा रहा है। इसी प्रकार, अमेरिका और पश्चिमी देशों में काम करने वाले चीनी विशेषज्ञों पर भी कड़ी निगरानी रहेगी। इलेक्ट्रिक वाहन (EV), सौर ऊर्जा, बैटरी और रेयर अर्थ जैसे क्षेत्रों में चीन वैश्विक नेता है, ऐसे में तकनीकी जानकारियों के आदान-प्रदान पर पाबंदी से अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं और साझेदारियों की रफ्तार धीमी हो सकती है।



















