मॉस्को और वॉशिंगटन के बीच ईंधन आपूर्ति को लेकर बनी नई सहमति के बाद पूर्वी यूरोप का रणक्षेत्र अचानक और अधिक हिंसक हो गया है। रूसी सेना ने यूक्रेनी इलाकों पर मिसाइलों और मानवरहित विमानों से जबरदस्त हमले किए हैं, जिससे बड़े पैमाने पर जानमाल का नुकसान हुआ है। यूक्रेन के स्थानीय प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, जापोरिजिया प्रांत में हुए इन तीखे हमलों की चपेट में आने से कम से कम 20 नागरिकों की जान चली गई, जबकि 18 अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। रिहायशी इमारतों और नागरिक ठिकानों पर गिरे इन प्रोजेक्टाइल्स ने जंग के इस नए मोड़ पर तबाही का मंजर खींच दिया है।
ईंधन आपूर्ति समझौते से उपजा विवाद और यूक्रेनी जवाबी कार्रवाई
इस ताजा सैन्य टकराव की पृष्ठभूमि में दोनों महाशक्तियों के बीच हुआ वह व्यापारिक समझौता है, जिसके तहत 30 लाख टन डीजल अमेरिका भेजा जाना तय हुआ है। योजना के अनुसार, शुरुआती खेप के तौर पर 3 लाख टन ईंधन महज एक से दो दिनों के भीतर अमेरिकी बंदरगाहों पर पहुंचने वाला है। इस पूरे घटनाक्रम ने कीव के नेतृत्व को बेहद असहज कर दिया है। जेलेंस्की ने इस समझौते पर कड़ा रोष जताते हुए ट्रंप पर विश्वासघात का आरोप लगाया है। उनका मानना है कि जब यूक्रेन युद्ध के मैदान में डटा हुआ है, तब इस तरह की खरीद रूसी खजाने को सीधी वित्तीय मदद पहुंचा रही है।
समझौते की जानकारी सामने आते ही यूक्रेन की सेना ने जवाबी कदम उठाते हुए रूस के ऊर्जा ढांचों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। लंबी दूरी तक मार करने वाले ड्रोन्स की मदद से रूस की तीन प्रमुख तेल रिफाइनरियों पर सुनियोजित हमले बोले गए। इसके अलावा उन समुद्री टर्मिनलों पर भी बमबारी की गई, जहां से अमेरिकी जहाजों में तेल लादा जा रहा था। यूक्रेन के इन्हीं हमलों के फौरन बाद रूसी सेना ने पलटवार करते हुए कई यूक्रेनी प्रांतों पर मिसाइलों की बारिश कर दी।
प्रतिबंधों के कानून से यूटर्न और समझौते की समयसीमा
यह नीतिगत बदलाव बेहद तेजी से हुआ है। 16 सितंबर को लिंडसे ग्राहम सैंक्शनिंग एक्ट 2026 पारित किया गया था, जिसका मकसद रूस पर आर्थिक नकेल कसना था। लेकिन महज 24 दिनों के भीतर उस नीति को पलटते हुए रूसी ईंधन की सीधी खरीद का रास्ता साफ कर दिया गया। दोनों देशों के बीच हुआ यह द्विपक्षीय समझौता कुल सात महीनों की अवधि के लिए तय किया गया है, जिसके तहत 7 अप्रैल 2027 तक रूसी डीजल की खरीद पर लगी रोक को हटा दिया गया है।
तय कार्यक्रम के मुताबिक, अक्टूबर के महीने में 3 लाख टन डीजल की खरीद की जाएगी। इसके बाद नवंबर में यह मात्रा बढ़ाकर 5 लाख टन कर दी जाएगी। दिसंबर तक खरीद का आंकड़ा 10 लाख टन तक पहुंचने की संभावना है, और आगामी वर्ष के अप्रैल महीने तक कुल खरीद लगभग 30 लाख टन तक ले जाई जा सकती है।
यूरोपीय सहयोगियों में असहजता और घरेलू राजनीतिक दबाव
इस फैसले ने पूरे यूरोपीय महाद्वीप और नाटो के सहयोगी देशों को सकते में डाल दिया है। पश्चिमी खेमे के भीतर गहरी दरार पड़ने की आशंकाएं तेज हो गई हैं। जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, डेनमार्क, फिनलैंड और पोलैंड जैसे राष्ट्र लंबे समय से रूसी सस्ते तेल और गैस का बहिष्कार करने का दबाव झेल रहे थे और अपने रणनीतिक भंडारों से अतिरिक्त ईंधन निकालने को मजबूर थे। इन देशों को भारी मुद्रास्फीति से जूझने के लिए छोड़ दिया गया, जबकि दूसरी तरफ वॉशिंगटन ने मॉस्को के साथ सीधी बातचीत कर ली। दूसरी ओर, रूस ने यूरोपीय संघ पर भी तंज कसते हुए सामने रखा है कि तमाम प्रतिबंधों के बावजूद यूरोपीय देशों ने 2025 की तुलना में 2026 में अधिक मात्रा में एलएनजी खरीदी है।
अमेरिकी प्रशासन के इस त्वरित फैसले के पीछे वहां की घरेलू अर्थव्यवस्था और ईंधन की बेलगाम कीमतें मुख्य वजह मानी जा रही हैं। ईरान से जुड़े टकराव के पहले अमेरिका में प्रति गैलन डीजल की कीमत 3.70 डॉलर थी, जो उछलकर 6.28 डॉलर प्रति गैलन पर पहुंच गई। अमेरिका के किसान, मालवाहक ट्रक चालक, व्यावसायिक वाहन मालिक और औद्योगिक इकाइयां इस ईंधन पर निर्भर हैं। आगामी मिड टर्म चुनावों से पहले इस मूल्यवृद्धि को थामने और संभावित राजनीतिक नुकसान से बचने के लिए यह कदम उठाया गया है।


















