देश की राजधानी में प्रामाणिक दक्षिण भारतीय भोजन की तलाश करने वालों को अक्सर वही पारंपरिक स्वाद नहीं मिल पाता, जिसका अनुभव दक्षिण भारत के राज्यों में मिलता है। इडली और सांभर जैसे लोकप्रिय व्यंजनों में जब तक असली मसालों और पारंपरिक विधि का मेल न हो, तब तक खाने का वास्तविक आनंद अधूरा रहता है। राजधानी दिल्ली में खानपान के शौकीनों के लिए नैवेद्यम एक ऐसा लोकप्रिय ठिकाना बनकर उभरा है, जहां पर असली दक्षिण भारतीय पाक कला का अनुभव मिलता है। यही कारण है कि यहां आने वाले ग्राहकों को प्रामाणिक स्वाद का बेजोड़ संगम मिलता है और भोजन प्रेमियों का तांता लगा रहता है।
लंच और डिनर में सीट के लिए करनी पड़ती है प्रतीक्षा
इस रेस्तरां की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली में इसकी छह शाखाएं संचालित हो रही हैं, और हर जगह ग्राहकों की लंबी कतारें देखने को मिलती हैं। दोपहर के भोजन यानी लंच और रात के खाने यानी डिनर के समय यहां इतनी भीड़ जुटती है कि खाली मेज मिलना काफी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। लोग इडली, डोसा, सांभर के अलावा विशेष रूप से तैयार उपमा का स्वाद लेने के लिए धैर्यपूर्वक अपनी बारी का इंतजार करते हैं। माहौल और स्वाद का ऐसा तालमेल अन्य जगहों पर कम ही देखने को मिलता है।
मेनू में पारंपरिक व्यंजनों और मिठाइयों की विस्तृत श्रृंखला
खानपान की विविधता की बात करें तो नैवेद्यम की थाली में दक्षिण भारत का समृद्ध जायका सजा मिलता है। यहां सामान्य मसाला डोसा के अलावा मैसूर मसाला डोसा और पेपर मसाला डोसा परोसा जाता है। इसके साथ ही कुरकुरा मेदु वड़ा, मुलायम इडली, उत्तपम, गरमा-गरम सांभर और ताजे नारियल की चटनी ग्राहकों को बेहद पसंद आती है। जो लोग संपूर्ण भोजन की तलाश में होते हैं, उनके लिए विशेष दक्षिण भारतीय थाली, रसम, बिसी बेले भात, लेमन राइस और कर्ड राइस का शानदार विकल्प मौजूद रहता है। भोजन के अंत में परोसी जाने वाली पारंपरिक फिल्टर कॉफी, मैसूर पाक और विभिन्न मिठाइयां भोजन के अनुभव को संपूर्ण बनाती हैं। इसके अलावा भोजन के बाद पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने के लिए खास दक्षिण भारतीय पान दिया जाता है, जबकि काउंटर से लोग पारंपरिक लड्डू व मिठाइयां घर ले जाने के लिए भी खरीदते हैं।
पारंपरिक परिवेश और किफायती दामों का बेहतरीन संतुलन
इस रेस्तरां की एक बड़ी खासियत इसकी बेहद किफायती दरें हैं, जिससे सामान्य बजट में भी स्वादिष्ट भोजन का लुत्फ उठाया जा सकता है। सौ रुपये के भीतर कई तरह के व्यंजन उपलब्ध हो जाते हैं, और यदि किसी व्यक्ति की जेब में केवल दो सौ रुपये हों तो वह भरपेट प्रामाणिक भोजन का आनंद ले सकता है। इसके साथ ही रेस्तरां का परिवेश पूरी तरह दक्षिण भारतीय संस्कृति में ढला हुआ है, जहां पारंपरिक तौर-तरीकों के अनुसार स्टील के बर्तनों में भोजन परोसा जाता है। दिल्ली में इसकी पहली शाखा हौज खास में खुली थी, जिसके बाद इसका विस्तार ईस्ट पटेल नगर, आईआईटी दिल्ली परिसर, सुभाष नगर, कनॉट प्लेस और कालकाजी जैसे प्रमुख इलाकों में हुआ।



















