मिथिलांचल की पहचान मखाने से जुड़ी है, जिसे भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग का दर्जा भी हासिल है। यहां के तालाबों में पैदा होने वाला मखाना अपनी गुणवत्ता के लिए जाना जाता है। इस इलाके में मखाना, पान और मछली काफी मशहूर माने जाते हैं। जब भी कोई धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-पाठ या घर में मेहमानों का आगमन होता है, तो मखाने से बनने वाली पारंपरिक खीर को एक खास व्यंजन के रूप में परोसा जाता है। यह स्वादिष्ट मिठाई सिर्फ 10 मिनट के भीतर बनकर तैयार हो जाती है।
पारंपरिक विधि और मूसल का अनोखा इस्तेमाल
कृति के अनुसार, मखाना खीर बनाने के कई तरीके प्रचलित हैं, लेकिन पारंपरिक विधि का स्वाद सबसे लाजवाब रहता है। इस प्रामाणिक स्वाद को पाने के लिए थोड़ी सी शारीरिक मेहनत करनी पड़ती है। सबसे पहले मखाने को शुद्ध घी में अच्छी तरह भूना जाता है। भूनने के बाद जब मखाना सामान्य तापमान पर ठंडा हो जाए, तब उसे ओखली और मूसल की मदद से दरदरा कूट लिया जाता है। हाथों से कूटने के कारण मखाना हल्का दरदरा रहता है, जिससे खीर का स्वाद और बनावट बेहतरीन बनती है। यदि कोई मेहनत से बचना चाहे तो मिक्सर का प्रयोग कर सकता है, लेकिन मिक्सी में मखाना पूरी तरह पाउडर बन जाता है जिससे वह असली स्वाद नहीं मिल पाता।
दूध, खोवा और मेवे के साथ पकाने की प्रक्रिया
ओखली में मखाने को दरदरा तैयार करने के बाद चूल्हे पर दूध को गर्म किया जाता है। जब दूध अच्छी तरह गर्म हो जाए, तब उसमें कुटे हुए मखाने मिला दिए जाते हैं। इसके बाद मिश्रण में मिठास के लिए चीनी, गाढ़ेपन के लिए खोवा और स्वाद बढ़ाने के लिए थोड़े से ड्राई फ्रूट्स डाले जाते हैं। इन सभी सामग्रियों को एक साथ मिलाकर पकाने पर पूरी खीर लगभग 10 मिनट में पूरी तरह तैयार हो जाती है। इसे ठंडा करके परोसने पर यह इतनी स्वादिष्ट लगती है कि मेहमान इसे दोबारा मांगकर खाते हैं।



















