सुबह की शुरुआत भारतीय परिवारों में अक्सर पोहा, पराठा, इडली या ढोकला जैसे जाने-पहचाने पकवानों से होती है, लेकिन देश की रसोई केवल इन्हीं लोकप्रिय विकल्पों तक सीमित नहीं है। भारत के अलग-अलग राज्यों में ऐसी क्षेत्रीय खान-पान की परंपराएं मौजूद हैं, जहां आम सामग्रियों से बेहद अनोखे और पौष्टिक नाश्ते तैयार किए जाते हैं। कई ऐसे प्रांतीय व्यंजन हैं जो अपनी स्थानीय पहचान, खास पाक शैली और अनूठे स्वाद के बावजूद बड़े शहरों या आम घरों की चर्चाओं में कम ही जगह बना पाते हैं। हिमाचल प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ के पारंपरिक पकवान इस समृद्ध देसी विविधता का बेहतरीन उदाहरण पेश करते हैं।
हिमाचल प्रदेश का भाप में पकने वाला सिड्डू
पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में सिड्डू को एक खास स्थान हासिल है, जिसे आमतौर पर सर्दी के दिनों में बेहद चाव से पकाया जाता है। इसका बाहरी रूप गोल रोटी जैसा नजर आता है, मगर इसके भीतर भरा जाने वाला लजीज मिश्रण इसे साधारण रोटी से बिल्कुल अलग बनाता है। सिड्डू को तेल में तलने के बजाय सीधे भाप में पकाया जाता है, जिससे यह हल्का और सुपाच्य भी रहता है।
इसे बनाने की प्रक्रिया गेहूं के आटे से शुरू होती है। आटे में खमीर यानी यीस्ट, थोड़ा नमक और हल्का गुनगुना पानी मिलाकर नरम आटा गूंथ लिया जाता है। इसके बाद आटे को कुछ देर के लिए ढककर छोड़ दिया जाता है, ताकि खमीर उठने से आटा पूरी तरह फूल जाए। सिड्डू की भरावन तैयार करने के लिए अखरोट, मूंगफली या दाल का प्रयोग किया जाता है। इस मिश्रण में कटी हुई हरी मिर्च, ताजा हरा धनिया और अन्य मसाले मिलाकर भरावन तैयार की जाती है।
जब आटा सही तरीके से उठ जाता है, तब उसकी लोई बनाकर हाथ या बेलन से थोड़ा फैलाया जाता है। उसके बीच में तैयार भरावन रखी जाती है और फिर किनारों को समेटकर चारों तरफ से बंद करते हुए गोल आकार दे दिया जाता है। इस तैयार सिड्डू को भाप में करीब 15 से 20 मिनट तक पकाया जाता है। पकने के बाद इसे गर्मागर्म परोसा जाता है, जिसके ऊपर देसी घी डाला जाता है या फिर इसे दाल और चटनी के साथ खाया जाता है।
झारखंड की पहचान चना दाल और चावल से बना धुस्का
पूर्वी भारत के राज्य झारखंड में धुस्का सुबह के नाश्ते का बेहद लोकप्रिय हिस्सा है। चावल और चना दाल के मेल से बनने वाला यह व्यंजन बाहर से हल्का कुरकुरापन लिए होता है, जबकि अंदर से इसका टेक्सचर काफी नरम और जालीदार रहता है। राज्य के खान-पान में इसे मसालेदार घुघनी या तरह-तरह की चटनी के साथ परोसने का चलन है।
धुस्का तैयार करने के लिए सबसे पहले चावल और चना दाल को कुछ घंटों के लिए पानी में भिगोकर रखा जाता है। भीगने के बाद दोनों को एक साथ पीसकर गाढ़ा बैटर यानी घोल तैयार किया जाता है। इस घोल के अंदर स्वादानुसार नमक, कटी हरी मिर्च और जरूरी मसाले अच्छी तरह मिलाए जाते हैं। कढ़ाई में तेल गर्म करके इस गाढ़े घोल को छोटी-छोटी गोल टिक्की के आकार में डाला जाता है।
धीमी और मध्यम आंच पर तलते हुए जब धुस्का दोनों तरफ से सुनहरा और फूला हुआ हो जाता है, तब इसे तेल से बाहर निकाला जाता है। जब इसे गर्म और चटपटी घुघनी के साथ थाली में सजाया जाता है, तो इसका देसी स्वाद कई गुना बढ़ जाता है।
छत्तीसगढ़ का हल्का और सादा चावल का चिलड़ा
मध्य भारत के छत्तीसगढ़ राज्य में चिलड़ा एक पारंपरिक और नियमित बनाया जाने वाला देसी नाश्ता है। चावल से बनने वाला यह पकवान बनावट और फैलाव में कुछ हद तक पतले डोसे की तरह दिखाई देता है। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों और आम घरों में इसे केवल सुबह के नाश्ते के रूप में ही नहीं, बल्कि दिन के किसी भी पहर हल्के भोजन के तौर पर भी आसानी से बनाकर खाया जाता है।
चिलड़ा बनाने के लिए कच्चे चावल को कुछ घंटों तक पानी में भिगोया जाता है और फिर बारीक पीस लिया जाता है। इस पिसे हुए चावल में पानी और नमक मिलाकर एक पतला घोल तैयार किया जाता है। इसके बाद गर्म तवे पर हल्का सा तेल लगाया जाता है और कलछी की मदद से घोल को तवे पर गोल आकार में फैला दिया जाता है।
तवे पर दोनों तरफ से हल्का सुनहरा होने तक इसे सेंका जाता है। चिलड़ा का सबसे बड़ा आकर्षण इसका सादा, सुपाच्य और सौम्य स्वाद है। इसे ताजा बनी चटनी, रसेदार सब्जी या फिर सादे दही के साथ बड़े आराम से खाया जा सकता है।
रसोई की साधारण सामग्रियों से बना समृद्ध स्वाद
सिड्डू, धुस्का और चिलड़ा जैसे व्यंजन यह साबित करते हैं कि भारतीय भोजन में केवल मसाले ही नहीं, बल्कि पकाने के देसी तरीके भी स्वाद तय करते हैं। दाल, चावल, गेहूं का आटा, अखरोट और मूंगफली जैसी आम घरेलू चीजों से भी कितनी विविधतापूर्ण थाली सजाई जा सकती है, ये पकवान उसी की मिसाल हैं। अगर आप रोज सुबह एक ही तरह का नाश्ता करके ऊब चुके हैं, तो इन पारंपरिक प्रांतीय व्यंजनों को अपनी रसोई में आजमाकर नया स्वाद चख सकते हैं।



















