कर्नाटक के दावणगेरे में हाईवे पर एक कार की चपेट में आने से घायल हुए तेंदुए को बचाने के दौरान वन विभाग के एक अधिकारी पर उसने हमला कर दिया। हालांकि अधिकारियों ने तेंदुए को ट्रैंक्विलाइज करने की कोशिश की थी, लेकिन पूरी तरह बेहोश होने से पहले ही उसने अधिकारी को घायल कर दिया। इस तरह की घटनाओं के बाद यह सवाल आम हो जाता है कि यदि कोई तेंदुआ किसी इंसान को काट ले या खरोंच मार दे, तो क्या ऐसी स्थिति में रेबीज का इंजेक्शन लगवाना अनिवार्य होता है।
तेंदुए के काटने और रेबीज का जोखिम
यह आम धारणा गलत है कि रेबीज की बीमारी केवल आवारा या पालतू कुत्तों के काटने से ही फैलती है। यह घातक वायरस किसी भी संक्रमित स्तनधारी जानवर की लार के माध्यम से इंसानों तक पहुंच सकता है। यही कारण है कि किसी भी जंगली जानवर के काटने या ऐसी खरोंच जिसमें त्वचा छिल जाए या कट जाए, उसे संभावित रेबीज एक्सपोजर की श्रेणी में रखा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO के दिशा-निर्देशों के अनुसार ऐसे किसी भी मामले में तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए और जरूरत के मुताबिक पोस्ट-एक्सपोजर ट्रीटमेंट यानी पीईपी की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए।
हालांकि इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि तेंदुए के संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को एक जैसा ही मेडिकल उपचार मिलेगा। चिकित्सक हमेशा जानवर के संपर्क में आने के तरीके, घाव की गहराई और रेबीज फैलने के खतरे का बारीकी से आकलन करते हैं। इसके बाद ही यह तय किया जाता है कि व्यक्ति को एंटी-रेबीज वैक्सीन दी जानी चाहिए या नहीं। यदि त्वचा पर मामूली सी खरोंच भी आई है या खून नहीं भी निकला है, तब भी उस चोट को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
घटना के तुरंत बाद क्या कदम उठाएं
जंगली जानवर के काटने या खरोंचने के फौरन बाद सबसे महत्वपूर्ण काम प्रभावित हिस्से को अच्छी तरह साफ करना होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक घाव को साबुन और साफ बहते पानी के नीचे कम से कम 15 मिनट तक लगातार धोना चाहिए। ऐसा करने से घाव के आसपास मौजूद वायरस के असर को काफी हद तक कम करने में मदद मिलती है। इसके बाद बिना किसी देरी के नजदीकी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र पहुंचकर किसी योग्य चिकित्सक से तुरंत जांच करवानी बेहद जरूरी है।
घाव पर किसी भी प्रकार के घरेलू नुस्खे जैसे लाल मिर्च, खाने का तेल, मिट्टी, पेड़-पौधों का रस या कोई अन्य तेज रसायन लगाने से पूरी तरह बचना चाहिए। इस तरह के पारंपरिक उपाय संक्रमण को और बढ़ा सकते हैं तथा त्वचा को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसके अलावा इन घरेलू उपचारों के चक्कर में सही और समय पर मिलने वाले मेडिकल इलाज में खतरनाक देरी भी हो सकती है।
वैक्सीन और इम्युनोग्लोबुलिन की जरूरत
विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों के अनुसार यदि किसी संभावित रेबीज ग्रसित जंगली जानवर से ऐसा संपर्क हुआ है जिसमें केवल हल्की खरोंच या मामूली घाव बना है, तब भी रेबीज वैक्सीन की आवश्यकता पड़ सकती है। वहीं यदि जानवर ने त्वचा को गहराई से काटा है या गहरी खरोंच मारी है, अथवा उसकी लार किसी खुले हुए जख्म, आंख या मुंह के संपर्क में आ गई है, तो इसे गंभीर श्रेणी का एक्सपोजर माना जाता है। इस प्रकार की गंभीर स्थिति में केवल वैक्सीन से काम नहीं चलता, बल्कि इसके साथ रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन की खुराक देना भी जरूरी हो जाता है।
भारत के नेशनल रेबीज कंट्रोल प्रोग्राम के नियमों के अनुसार श्रेणी तीन यानी गंभीर बाइट वूंड के मामलों में रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन दिए जाने की स्पष्ट सलाह दी जाती है। इसलिए किसी भी जंगली जानवर के हमले के बाद खुद से यह फैसला कभी न करें कि इंजेक्शन की जरूरत होगी या नहीं। हमेशा डॉक्टर की सलाह पर ही तुरंत इलाज शुरू करवाना चाहिए।
लक्षण प्रकट होने का कभी इंतजार न करें
रेबीज एक बेहद जानलेवा और गंभीर बीमारी है। एक बार इस संक्रमण के क्लिनिकल लक्षण शरीर में दिखाई देने शुरू हो जाएं, तो इस बीमारी से बचना लगभग असंभव हो जाता है और यह जानलेवा साबित होती है। हालांकि यदि समय रहते यानी एक्सपोजर के तुरंत बाद घाव की सही सफाई कर ली जाए, समय पर रेबीज का टीका लगवा लिया जाए और जरूरत पड़ने पर इम्युनोग्लोबुलिन ले लिया जाए, तो इस संक्रमण को पूरी तरह रोका जा सकता है। इसलिए तेंदुए या किसी अन्य जंगली जानवर के काटने या खरोंचने पर इलाज शुरू करवाने में कभी भी लापरवाही या कोताही नहीं बरतनी चाहिए।



















