अक्सर देखा जाता है कि रिहायशी इमारत पुरानी पड़ने पर लोग केवल ऊपर से चूना या पेंट करवाकर तसल्ली कर लेते हैं। वास्तविकता यह है कि चमकदार रंग से इमारत के बुनियादी ढांचे की असल सेहत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। किसी भी पुराने निर्माण में प्रयुक्त गारे, कंक्रीट और ईंटों का अंदरूनी हाल समझना बेहद जरूरी होता है। अगर घर के किसी हिस्से में दरारें उभर रही हों, सीपेज का असर दिख रहा हो, लोहे की छड़ों पर जंग चढ़ चुकी हो अथवा कोई दीवार एक तरफ झुकने लगी हो, तो इन संकेतों को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है।
प्रयोगशाला परीक्षण से समझें निर्माण सामग्री का दम
आगरा के सिविल इंजीनियर अजय भदौरिया बताते हैं कि किसी पुराने ढांचे की मौजूदा स्थिति समझने के लिए उसमें लगी सामग्री की वैज्ञानिक जांच कराई जा सकती है। इस प्रक्रिया में किसी तकनीकी जानकार की देखरेख में प्लास्टर, मसाले, प्रयुक्त ईंट और चूने के छोटे-छोटे टुकड़े एकत्र किए जाते हैं। इन सैंपलों को आधुनिक टेस्टिंग लैब भेजा जाता है, जहां इनके भौतिक और रासायनिक गुणों का विश्लेषण कर यह परखा जाता है कि सामग्री का बॉन्डिंग सामर्थ्य कितना शेष रह गया है।
किफायती बजट में उपलब्ध है टेस्टिंग की सुविधा
अजय भदौरिया के अनुसार आगरा के स्थानीय क्षेत्रों में इस तरह की टेस्टिंग सुविधा काफी किफायती दरों पर सुलभ है। लगभग 5 से 6 हजार रुपये के खर्च में मकान मालिक अपनी दीवारों के कंक्रीट, ईंट और मसाले की वास्तविक शक्ति का ब्योरा प्राप्त कर सकते हैं। ताजनगरी में इसके लिए भगवान टॉकीज के निकट, संजय प्लेस, रोहता तथा शास्त्रीपुरम जैसे इलाकों में स्थित टेस्टिंग लैब्स की सेवाएं ली जा सकती हैं। इन जांचों से मकान के घटकों की सेहत स्पष्ट हो जाती है।
हालांकि, यह ध्यान रखना चाहिए कि केवल लैब रिपोर्ट यह प्रमाणित नहीं कर सकती कि इमारत अगले कितने वर्षों तक खड़ी रहेगी। इसके लिए किसी योग्य स्ट्रक्चरल इंजीनियर द्वारा पूरी बिल्डिंग का प्रत्यक्ष भौतिक निरीक्षण जरूरी होता है। अनुभवी पेशेवर ही यह तय कर सकता है कि बीम, कॉलम या लोड-बेयरिंग दीवारों को अतिरिक्त जैकेटिंग अथवा रेट्रोफिटिंग की दरकार है या नहीं।
सीलन और दरारों को नजरअंदाज न करें
मकान की छतों से टपकता पानी, प्लास्टर का उखड़ना, छज्जों में लोहे की सरिया का फूलना या दीवारों का संतुलन बिगड़ना खतरे के लक्षण हो सकते हैं। इन विकृतियों को मौसमी खराबी समझकर अनदेखा करने के बजाय तुरंत तकनीकी परामर्श लेना चाहिए। आरंभिक स्तर पर ही फॉल्ट पकड़ में आ जाने से मामूली मरम्मत कराकर बड़ी अनहोनी और बड़े आर्थिक नुकसान दोनों से बचा जा सकता है।
शुरुआती गुणवत्ता और नियमित देखरेख ही आधार
निर्माण उद्योग में 16 वर्षों का कार्य अनुभव रखने वाले सिविल इंजीनियर अजय भदौरिया का मानना है कि किसी भी भवन का जीवनकाल शुरुआत में इस्तेमाल किए गए मैटेरियल और कारीगरी के स्तर पर निर्भर करता है। नीव भरते समय उम्दा दर्जे की रेत, पुख्ता सरिया, शुद्ध पानी और प्रमाणित सीमेंट का संयोजन अपनाना चाहिए। सही निर्माण तकनीकों का पालन करने पर इमारत साधारणतया 60 वर्ष तक सुगमता से टिकी रह सकती है।
हालांकि, यह कोई पत्थर की लकीर नहीं है। भूगर्भीय स्थिति, वास्तुशिल्प का डिजाइन, स्थानीय मौसम और पानी की निकासी जैसी बातें भी आयु निर्धारण में बड़ी भूमिका निभाती हैं। इसके अलावा हर एक या दो वर्ष के अंतराल पर भवन का पेशेवर मुआयना कराते रहना चाहिए। समय-समय पर छोटे-मोटे रिपेयर या रिनोवेशन कराने से प्लास्टर की दरारें और छत की सीलन बड़े खतरे में नहीं बदलतीं और घर दशकों तक सुरक्षित बना रहता है।

















