घर की छत या बालकनी में हरी सब्जियां उगाना न केवल एक बेहतरीन शौक है बल्कि रसोई को ताजी उपज भी प्रदान करता है। नूडल्स, पिज्जा और सैंडविच से लेकर रोजमर्रा की सब्जियों का स्वाद बढ़ाने वाली शिमला मिर्च की मांग हर घर में साल भर बनी रहती है। इसे उगाने के लिए किसी बड़े खेत या बगीचे की जरूरत नहीं होती, बल्कि छोटे बर्तनों, कंटेनरों या ग्रो बैग की मदद से कोई भी व्यक्ति घर पर ही इसकी बंपर पैदावार हासिल कर सकता है। सही समय का चयन, पोषक तत्वों से भरपूर मिट्टी का निर्माण, संतुलित धूप और नियमित जैविक खाद की व्यवस्था करके पौधे को लंबे समय तक हरा-भरा और फलदार बनाए रखा जा सकता है।
बुआई का सही समय और उपयुक्त किस्में
भारत में शिमला मिर्च लगाने के लिए साल के तीन अलग-अलग मौसम सबसे अनुकूल माने जाते हैं। पहला दौर नवंबर से दिसंबर का होता है, दूसरा समय फरवरी से मार्च के बीच आता है, जबकि तीसरा चरण जून से जुलाई या अगस्त से सितंबर के महीनों में चुना जा सकता है। इस फसल के लिए मौसम का संतुलित होना बेहद आवश्यक है, क्योंकि अत्यधिक गर्मी या बहुत तेज सर्दी पौधे के विकास को प्रभावित कर सकती है। किस्मों के चुनाव की बात करें तो इंद्र, आशा और हंटिंगटन बेहतरीन गुणवत्ता वाली किस्में मानी जाती हैं। इन किस्मों के बीज नजदीकी स्थानीय बाजार से खरीदे जा सकते हैं या फिर ऑनलाइन मंगवाए जा सकते हैं।
बीज से पौध तैयार करने की पूरी विधि
शिमला मिर्च की स्वस्थ पौध तैयार करने के लिए 3 से 4 इंच गहरे कंटेनर का इस्तेमाल किया जाता है। बीज अंकुरण के लिए सीडलिंग मिक्स बेहद हल्का और भुरभुरा होना चाहिए। इसके लिए 50 प्रतिशत वर्मी कंपोस्ट और 50 प्रतिशत कोकोपीट को आपस में अच्छी तरह मिलाकर कंटेनर में भरा जाता है। इस मिश्रण में उंगली की सहायता से लगभग 1 इंच गहरे गड्ढे बनाएं और उनमें बीजों को रख दें। इसके बाद बीजों को उसी सीडलिंग मिक्स की हल्की परत से ढककर पानी का छिड़काव कर दें। इन बीजों को अंकुरित होकर बाहर आने में 7 से 14 दिन का समय लगता है। अगर कोई चाहे तो बीजों को सीधे बड़े गमलों में भी बो सकता है।
बड़े गमले या ग्रो बैग में रोपाई और मिट्टी का अनुपात
बीज बोने के लगभग 20 से 25 दिन बाद जब पौधे पर्याप्त बड़े और मजबूत हो जाएं, तब उन्हें बड़े गमलों या ग्रो बैग में रोपना चाहिए। रोपाई के लिए 12 से 15 इंच आकार का गमला या ग्रो बैग सबसे मुफीद रहता है। गमले के तल में जल निकासी के लिए छेद होना अनिवार्य है ताकि अतिरिक्त पानी जमा न हो। इसके लिए एक आदर्श वेल ड्रेन मिट्टी का मिश्रण तैयार करना होता है, जिसमें पानी बिल्कुल न रुके। इस मिट्टी मिश्रण में 30 प्रतिशत बगीचे की मिट्टी, 30 प्रतिशत वर्मी कंपोस्ट और 30 प्रतिशत कोकोपीट या रेत मिलाई जाती है। पोषक तत्वों की पूर्ति के लिए इसमें 200 ग्राम नीम खली, 200 ग्राम सरसों की खली और ऑर्गेनिक रॉक फॉस्फेट (कैल्शियम पाउडर) मिलाया जाता है। इस पूरे मिश्रण को ग्रो बैग में भरकर पौधे की रोपाई करें और तुरंत भरपूर पानी दें।
पौधे की देखभाल, पिंचिंग और धूप की जरूरत
पौधे को नए गमले में लगाने के बाद हर 10 से 15 दिन में मिट्टी की हल्की निराई गुड़ाई करना जरूरी होता है। पौधे को झाड़ीदार और घना बनाने के लिए ऊपरी सिरे की पिंचिंग की जाती है, जिससे मुख्य तने से नई-नई शाखाएं फूटती हैं और पौधा मजबूत बनता है। पौधे के तेजी से विकास के लिए गुड़ाई के बाद उसमें चॉक (चूना) डाला जा सकता है, क्योंकि चॉक में कैल्शियम की प्रचुर मात्रा होती है। इसके अतिरिक्त प्याज के छिलकों का पाउडर भी मिट्टी में मिलाया जा सकता है, जो पोटाश का बेहतरीन प्राकृतिक स्रोत है। जब पौधा छोटा हो, तो उसके निचले हिस्से से निकलने वाली अतिरिक्त पत्तियों और सकर्स को हटा देना चाहिए। इससे पौधे की ऊर्जा व्यर्थ नहीं जाती, तना मजबूत होता है और समय पर कलियां आने लगती हैं। पौधे को प्रतिदिन 6 से 8 घंटे की सीधी धूप की आवश्यकता होती है, इसलिए गमले को हमेशा खुली धूप वाली जगह पर ही रखें।
फूल आने का समय और कीट नियंत्रण के उपाय
रोपाई के लगभग 40 से 45 दिन बाद पौधे पर फूल खिलने शुरू हो जाते हैं। इस नाजुक दौर में सिंचाई का खास ख्याल रखना चाहिए। जब मिट्टी की ऊपरी सतह पूरी तरह सूख जाए, केवल तभी पानी देना चाहिए, क्योंकि जरूरत से ज्यादा नमी के कारण फूल झड़ने का खतरा बढ़ जाता है। फूल खिलने के समय मिट्टी में अलग-अलग तरह की खाद दी जाती है। यही फूल अगले 10 से 15 दिनों के भीतर छोटे-छोटे फलों में तब्दील होने लगते हैं। इसी अवस्था में मौसम में होने वाले बदलावों के कारण पौधे पर मरोड़िया रोग यानी लीफ कर्ल का प्रकोप हो सकता है। इस बीमारी में पत्तियां मुड़ने और सिकुड़ने लगती हैं, जिससे फल और फूल का विकास पूरी तरह थम जाता है। इस कीट प्रकोप से बचाव के लिए नीम ऑयल में लिक्विड डिटर्जेंट मिलाकर स्प्रे करना चाहिए। रोगग्रस्त पत्तियों और सूखे फूलों को तुरंत काटकर हटा दें और हफ्ते में एक बार नियमित रूप से नीम ऑयल का छिड़काव करते रहें।
हार्वेस्टिंग और लगातार फल लेने के लिए पोषण चक्र
जब शिमला मिर्च का पौधा ढाई महीने का हो जाता है, तो उस पर लगे फल पूरी तरह परिपक्व हो जाते हैं। इस समय पहली बार फसल की तुड़ाई की जा सकती है। जब मिर्च का आकार 4 से 5 इंच तक पहुंच जाए और वह पूरी तरह मैच्योर दिखे, तभी उसे तोड़ना चाहिए। समय पर खाद और पानी का चक्र बनाए रखने से एक ही पौधे से अगले 6 महीने तक लगातार पैदावार मिलती रहती है। अधिक संख्या में फल प्राप्त करने के लिए सीवीड ग्रेन्यूल्स नामक जैविक खाद का प्रयोग किया जा सकता है। इसके अलावा सरसों की खली भी गमले की मिट्टी में डाली जा सकती है। हर 20 दिन के अंतराल पर बदल-बदल कर जैविक खाद देने से पौधा स्वस्थ बना रहता है और घर की बगिया में शिमला मिर्च की भरपूर पैदावार मिलती है।



















