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रतलाम की बालम ककड़ी और मालवी गराडू को मिला GI टैग, किसानों को मिलेगी अंतरराष्ट्रीय पहचानमध्य प्रदेश
21 जून 2026, 10:40 pm (46 दिन पहले)· 5

रतलाम की बालम ककड़ी और मालवी गराडू को मिला GI टैग, किसानों को मिलेगी अंतरराष्ट्रीय पहचान

रतलाम जिले की दो प्रमुख कृषि उपजों, बालम ककड़ी और रतलामी गराडू, को भौगोलिक संकेत (GI) टैग मिल गया है। अब रतलामी गराडू को 'मालवी गराडू' के नाम से जाना जाएगा और इन उत्पादों के लिए राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर दाम मिलने का रास्ता खुल गया है।

रतलाम जिले के किसानों के लिए यह किसी उत्सव से कम नहीं। जिले की दो बेहद खास कृषि उपजों, बालम ककड़ी और रतलामी गराडू, को भौगोलिक संकेत यानी GI टैग मिल गया है। इसके साथ ही रतलामी गराडू का नाम अब बदलकर 'मालवी गराडू' किया जाएगा। उद्यानिकी विभाग की लगातार कोशिशों और मेहनत का यह सुखद नतीजा है। यह वही जिला है जिसकी मशहूर 'रियावन लहसुन' को पहले ही GI टैग मिल चुका है। अब इन दो नए उत्पादों के जुड़ने के बाद रतलाम की कृषि विरासत वैश्विक मंच पर और मजबूती से खड़ी हो गई है।

खेती का दायरा और किसानों को होने वाला सीधा फायदा

रतलाम में इन दोनों फसलों की खेती बड़े पैमाने पर होती है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, जिले में बालम ककड़ी करीब 100 हेक्टेयर जमीन पर उगाई जा रही है, जबकि गराडू की खेती लगभग 120 हेक्टेयर क्षेत्र में हो रही है। GI टैग मिलने के बाद इन फसलों से जुड़े बड़ी संख्या में किसानों को सीधा फायदा पहुंचेगा। उनके उत्पाद को अब देश के बड़े बाजारों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बेहतर कीमत और पहचान मिल सकेगी।

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सैलाना की केसरिया बालम ककड़ी: रंग भी अनोखा, स्वाद भी निराला

रतलाम के सैलाना इलाके में उगाई जाने वाली बालम ककड़ी की चर्चा पूरे देश में है। यह ककड़ी सिर्फ अपने रसीले और ताज़गी भरे स्वाद के लिए नहीं, बल्कि अपने बेहद आकर्षक रंग के लिए भी जानी जाती है। यह पीले, हरे और केसरिया रंग में आती है और यही अनोखी पहचान इसे बाकी ककड़ियों से एकदम अलग करती है। इसी विशेषता की वजह से इसे 'केसरिया बालम ककड़ी' कहा जाता है।

मालवी गराडू: बाहर से कुरकुरा, अंदर से मुलायम और सेहत का खजाना

मालवी गराडू मालवा के खाने की पहचान का एक अहम हिस्सा है। इसे तलने के बाद जो बनावट बनती है, वह इसकी सबसे बड़ी खासियत है, बाहर से एकदम कुरकुरा और अंदर से पूरी तरह मुलायम। लेकिन यह सिर्फ स्वाद का मामला नहीं है, सेहत के लिहाज से भी यह जड़ वाली सब्जी बेहद फायदेमंद मानी जाती है।

  • यह विटामिन, खनिज और फाइबर का भरपूर स्रोत है।
  • इसमें पाए जाने वाले खास तत्व दिमाग की कार्यक्षमता को सुधारने और विकसित करने में मदद करते हैं।
  • इसके एंटीऑक्सीडेंट गुण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।
  • शुगर यानी मधुमेह को काबू में रखने में भी इसे फायदेमंद माना जाता है।

GI टैग से मिलेगी शुद्धता की गारंटी और वैश्विक नक्शे पर उभरेगा रतलाम

GI टैग मिलना महज एक कागजी मान्यता नहीं है। इससे इन उत्पादों की शुद्धता और उनकी खास भौगोलिक विशेषता की आधिकारिक गारंटी मिल जाती है। देश हो या विदेश, कोई भी खरीदार अब यह भरोसे के साथ जान सकेगा कि वह असली रतलाम की उपज खरीद रहा है। इससे रतलाम का नाम भारत और दुनिया के कृषि मानचित्र पर और पुख्ता तरीके से दर्ज हो जाएगा।

सवाल-जवाब

बालम ककड़ी और गराडू को GI टैग किसके प्रयासों से मिला?
उद्यानिकी विभाग की लगातार कोशिशों और पहल की वजह से इन दोनों उत्पादों को GI टैग मिला है।
रतलामी गराडू का नया आधिकारिक नाम क्या होगा?
GI टैग मिलने के बाद रतलामी गराडू को अब 'मालवी गराडू' के नाम से जाना जाएगा।
रतलाम में बालम ककड़ी और गराडू की खेती कितने हेक्टेयर में होती है?
बालम ककड़ी लगभग 100 हेक्टेयर में और गराडू करीब 120 हेक्टेयर क्षेत्र में उगाई जाती है।
बालम ककड़ी को 'केसरिया बालम ककड़ी' क्यों कहते हैं?
इस ककड़ी का रंग पीला, हरा और केसरिया होता है, इसी विशेष रंग की वजह से इसे यह नाम दिया गया है।
मालवी गराडू सेहत के लिए कैसे फायदेमंद है?
यह विटामिन, खनिज और फाइबर से भरपूर है, इसके एंटीऑक्सीडेंट गुण रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं और यह मधुमेह को नियंत्रित रखने में भी सहायक माना जाता है।
इससे पहले रतलाम के किस उत्पाद को GI टैग मिल चुका है?
रतलाम की प्रसिद्ध 'रियावन लहसुन' को पहले ही GI टैग मिल चुका है।
GI टैग मिलने से किसानों को क्या फायदा होगा?
उनकी उपज को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेहतर दाम और पहचान मिलेगी।
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