अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में नए कारोबारी सप्ताह की शुरुआत होते ही अमेरिकी डॉलर के मुकाबले यूरोपीय साझा मुद्रा यूरो में तीव्र गिरावट दर्ज की गई। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा 15-16 सितंबर को होने वाली अपनी मौद्रिक नीति बैठक में उधारी लागत बढ़ाने के बढ़ते कयासों के कारण निवेशकों का रुझान ग्रीनबैक की ओर बना हुआ है। इस बिकवाली के दबाव में यूरो करीब 0.55 प्रतिशत टूटकर 1.1525 के आसपास आ गया, जो 13 अगस्त के बाद का इसका सबसे निचला स्तर है।
फेडरल रिजर्व की आगामी बैठक और ब्याज दरों की स्थिति
फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति निर्धारण समिति यानी फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (एफओएमसी) हर वर्ष कुल आठ आधिकारिक समीक्षा बैठकें आयोजित करती है। इस समिति में कुल बारह अधिकारी शामिल होकर देश की आर्थिक परिस्थितियों का आकलन करते हैं और वित्तीय नीतियों पर निर्णय लेते हैं। इन बारह सदस्यों में बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सात सदस्य, फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क के अध्यक्ष तथा शेष ग्यारह क्षेत्रीय रिजर्व बैंकों में से एक-एक वर्ष के क्रमिक कार्यकाल पर चुने जाने वाले चार क्षेत्रीय अध्यक्ष सम्मिलित होते हैं। अमेरिका में केंद्रीय बैंक का मुख्य संवैधानिक दायित्व कीमतों में स्थिरता सुनिश्चित करना और रोजगार को अधिकतम स्तर पर पहुंचाना है। इस दोहरे लक्ष्य को साधने के लिए फेडरल रिजर्व ब्याज दरों के स्तर में बदलाव को अपने मुख्य साधन के तौर पर इस्तेमाल करता है।
जब अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति केंद्रीय बैंक के दो प्रतिशत के वार्षिक लक्ष्य से अधिक गति पकड़ने लगती है, तब फेडरल रिजर्व ऋण दरों में बढ़ोतरी कर देता है ताकि बाजार में उधारी लागत बढ़ाकर मांग को नियंत्रित किया जा सके। ऊंची ब्याज दरों के कारण विदेशी निवेशकों को अपनी पूंजी अमेरिकी परिसंपत्तियों में लगाना ज्यादा आकर्षक लगता है, जिससे डॉलर की मांग में जोरदार मजबूती देखने को मिलती है। इसके विपरीत जब महंगाई दो प्रतिशत से नीचे फिसलती है अथवा बेरोजगारी दर चिंताजनक स्तर तक बढ़ती है, तब केंद्रीय बैंक ब्याज दरें घटाकर आर्थिक गतिविधियों को सहारा देता है, जिससे आमतौर पर ग्रीनबैक की कीमत में नरमी आती है।
मुद्रास्फीति रिपोर्ट और बाजार की संभावनाओं में बदलाव
अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उधारी लागत और सख्त किए जाने की आशंकाओं को हालिया महंगाई रिपोर्ट से काफी बल मिला है। शुक्रवार को जारी आंकड़ों के अनुसार हेडलाइन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) अगस्त के दौरान महीने-दर-महीने आधार पर 0.4 प्रतिशत बढ़ा, जो जुलाई माह के 0.1 प्रतिशत के मुकाबले काफी तेज है। इसी प्रकार कोर सीपीआई में 0.3 प्रतिशत का इजाफा दर्ज हुआ, जो पिछले महीने के 0.2 प्रतिशत से अधिक होने के साथ-साथ बीते चार महीनों में इसकी सबसे तेज मासिक वृद्धि है। इस बीच पीपीआई और सीपीआई के आंकड़ों के सामने आने के बाद दर वृद्धि को लेकर बाजार का रुख और अधिक आक्रामक हो गया है। सीएमई फेडवॉच टूल के आंकड़े दर्शाते हैं कि ब्याज दरों में चौथाई प्रतिशत यानी पच्चीस आधार अंकों की बढ़ोतरी की संभावना अब बढ़कर 86 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, जबकि ठीक एक सप्ताह पूर्व यह संभावना केवल 59.4 प्रतिशत के स्तर पर आंकी गई थी।
डॉलर इंडेक्स की तेजी और रणनीतिकारों का विश्लेषण
छह प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी मुद्रा की मजबूती को मापने वाला यूएस डॉलर इंडेक्स (डीएक्सवाई) सोमवार को लगभग 0.58 प्रतिशत की बढ़त हासिल कर 99.66 के करीब कारोबार करता दिखाई दिया, जो 3 सितंबर के बाद का इसका उच्चतम स्तर है। स्कॉटियाबैंक के रणनीतिकारों ने स्पष्ट किया है कि एफओएमसी की बैठक से पहले डॉलर का यह मजबूत रुख डेरिवेटिव बाजार के संकेतों से पूरी तरह मेल खाता है। उनके मुताबिक वित्तीय डेरिवेटिव्स और स्वैप बाजार में 70 प्रतिशत या उससे अधिक का जोखिम जब भी आंका गया है, वह केंद्रीय बैंक के वास्तविक नीतिगत कदम का बेहद सटीक सूचक साबित हुआ है, इसलिए स्वैप बाजार के रुझान पर डॉलर में यह बढ़त पूरी तरह स्वाभाविक है।
हालांकि बाजार विश्लेषकों ने इस बात के प्रति सचेत भी किया है कि आने वाले परिदृश्य को लेकर अनिश्चितताएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। विदेशी मुद्रा बाजार की वास्तविक प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर करेगी कि फेडरल रिजर्व अपने निर्णय को किस रूप में पेश करता है। जानकारों के आकलन के अनुसार यदि फेडरल रिजर्व अपनी दरों में कोई बदलाव नहीं करने का फैसला लेता है, तो यह वित्तीय बाजारों के लिए एक अप्रत्याशित झटका साबित होगा और डॉलर के लिए सीधा नकारात्मक असर डालेगा। दूसरी ओर यदि केंद्रीय बैंक एक नरम अंदाज में दर बढ़ाता है और भविष्य में आगे कदम उठाने की कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं दिखाता, तो ऐसी स्थिति में भी डॉलर पर दबाव बन सकता है। इसके अलावा नए डॉट प्लॉट के अनुमान भी डॉलर की दिशा तय करने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। डॉलर की यह बढ़त तभी आगे खिंच सकती है जब केंद्रीय बैंक बाजार के मौजूदा आक्रामक अनुमानों को संतुष्ट करे। साथ ही वारश की केंद्रीय बैंक से जुड़ी स्वायत्तता की भी इस माहौल में परीक्षा हो रही है, खासकर ट्रंप द्वारा ब्याज दरें कम रखने के डाले जा रहे दबाव के बीच।
कच्चे तेल की कीमतें और यूरो क्षेत्र की चुनौतियां
अटलांटिक के दोनों किनारों पर महंगाई के जोखिम को ईंधन देने में ऊर्जा बाजार की तेजी का बड़ा हाथ रहा है। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के अहम मनोवैज्ञानिक स्तर के बेहद करीब पहुंच गया है और चालू महीने के भीतर ही इसमें 15 प्रतिशत से अधिक की जबर्दस्त तेजी आ चुकी है। ऊर्जा की इन ऊंची कीमतों ने फेडरल रिजर्व पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव और बढ़ा दिया है, साथ ही इसने यूरो क्षेत्र के लिए भी महंगाई के परिदृश्य को अत्यधिक जटिल बना दिया है।
यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ईसीबी) ने पिछले सप्ताह ही अपनी उधारी लागत में इस वर्ष की दूसरी दर वृद्धि लागू करते हुए अपनी डिपॉजिट फैसिलिटी रेट को बढ़ाकर 2.50 प्रतिशत पर पहुंचा दिया था। ईसीबी की कार्यकारी बोर्ड सदस्य इसाबेल श्नाबेल ने सोमवार को चिंता जाहिर करते हुए कहा कि ऊर्जा की कीमतों में हालिया घटनाक्रम काफी चिंताजनक हैं। वहीं नीति निर्माता यानिस स्तूरनरास ने स्पष्ट किया कि समय रहते कदम उठाने से बाद में होने वाली अधिक दर्दनाक दर वृद्धि का खतरा कम हो जाता है।
क्वांटिटेटिव ईजिंग और टाइटनिंग की कार्यप्रणाली
अत्यंत असाधारण आर्थिक संकटों के समय फेडरल रिजर्व गैर-पारंपरिक नीतिगत उपायों का सहारा लेता है, जिसे क्वांटिटेटिव ईजिंग (क्यूई) कहा जाता है। इस नीति के तहत केंद्रीय बैंक आर्थिक तंत्र में नकदी और कर्ज का प्रवाह भारी मात्रा में बढ़ाने का काम करता है। यह एक विशेष मौद्रिक उपाय है जिसे गहरे मंदी के दौर अथवा जब महंगाई दर बेहद निचले स्तर पर चली जाए, तब लागू किया जाता है। वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान फेडरल रिजर्व ने इसी रणनीति को प्रमुखता से अपनाया था, जिसके अंतर्गत नए डॉलर जारी कर वित्तीय संस्थानों से उच्च गुणवत्ता वाले बांड खरीदे जाते हैं। बाजार में नकदी की भारी आपूर्ति होने के कारण क्यूई से आमतौर पर अमेरिकी डॉलर की कीमत कमजोर होती है।
इसके ठीक विपरीत प्रक्रिया को क्वांटिटेटिव टाइटनिंग (क्यूटी) कहा जाता है। क्यूटी के अंतर्गत फेडरल रिजर्व वाणिज्यिक वित्तीय संस्थानों से बांडों की सीधी खरीद पूरी तरह बंद कर देता है। इसके अतिरिक्त अपने पास मौजूद बांडों के परिपक्व होने पर मिलने वाले मूलधन से वह नए बांड खरीदने के बजाय उस नकदी को बाजार से हटा लेता है। सिस्टम से अतिरिक्त नकदी को कम करने की यह प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से अमेरिकी डॉलर के मूल्य को मजबूती प्रदान करती है।
अन्य वैश्विक मुद्राओं, सोने और डिजिटल संपत्तियों का हाल
अमेरिकी डॉलर और सरकारी ट्रेजरी प्रतिफल में आई व्यापक तेजी का प्रभाव अन्य मुद्राओं और परिसंपत्तियों पर भी साफ देखा गया। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर की जोड़ी (एयूडी/यूएसडी) सोमवार के एशियाई सत्र के दौरान 0.7140 के स्तर के पास जाकर करीब डेढ़ सप्ताह के निचले स्तर को छू गई, हालांकि इसमें आगे बड़ी बिकवाली जारी नहीं रही और स्पॉट कीमतें दिन के दौरान लगभग 0.25 प्रतिशत कमजोर होकर मध्य-0.7100 से कुछ ऊपर टिकी रहीं। वहीं अमेरिकी डॉलर और जापानी येन (यूएसडी/जेपीवाई) की जोड़ी में सप्ताह की शुरुआत पर नए खरीदारों का प्रवेश देखा गया, जिससे एशियाई सत्र में यह 154.00 के करीब पहुंची और शुक्रवार के नुकसान के एक हिस्से की भरपाई की। हालांकि यह जोड़ी पिछले लगभग एक सप्ताह के सीमित दायरे में ही बनी रही और पिछले मंगलवार को दर्ज किए गए लगभग सात महीने के निचले स्तर के आसपास ही झूलती दिखी।
डॉलर और बॉन्ड यील्ड में जोरदार वापसी से सोने की कीमतों में सोमवार को तेज गिरावट देखने को मिली। पीली धातु लुढ़क कर 4,250 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के पास पहुंच गई, जो कई हफ्तों का निचला स्तर है। फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाए जाने के कयासों और कच्चे तेल की रैली से महंगाई की चिंताएं दोबारा भड़कने के चलते सोने पर यह दबाव बना। दूसरी तरफ व्यापक क्रिप्टो बाजार में मजबूती के साथ सोमवार को बिटकॉइन मामूली बढ़त लेकर 77,884 डॉलर के आसपास कारोबार करता दिखा। इसी प्रकार एथेरियम 2,521 डॉलर और रिपल 1.38 डॉलर के अपने महत्वपूर्ण सपोर्ट स्तरों को सुरक्षित रखते हुए बिटकॉइन के तटस्थ से सकारात्मक रुख के साथ आगे बढ़ते नजर आए।


















