कनाडा की अर्थव्यवस्था में मूल्य वृद्धि का दबाव फिलहाल एक दायरे में सीमित नजर आ रहा है, जिससे केंद्रीय बैंक के लिए तत्काल दरें बढ़ाने की मजबूरी टलती दिख रही है। अगस्त के दौरान वार्षिक उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति 3 प्रतिशत पर टिकी रही, जो ठीक पिछले महीने यानी जुलाई के स्तर के बराबर है। हालांकि भोजन और ईंधन की लागत अभी भी ऊंचे स्तरों पर बनी हुई है, लेकिन हाल के हफ्तों में इनमें कुछ नरमी दर्ज की गई है। इसके साथ ही खाद्य और ऊर्जा घटकों को अलग रखकर देखे जाने वाले मुख्य मुद्रास्फीति संकेतक, जिनमें बैंक ऑफ कनाडा के पसंदीदा पैमाने सीपीआई ट्रिम और सीपीआई मीडियन शामिल हैं, लगभग 2 प्रतिशत के आधिकारिक लक्ष्य के आसपास स्थिर बने हुए हैं।
नीतिगत दरों में स्थिरता की संभावना और कच्चे तेल का दबाव
रॉयल बैंक ऑफ कनाडा की अर्थशास्त्री एब्बी जू के अनुसार, मुद्रास्फीति के यह ताजा आंकड़े इस संभावना को मजबूती देते हैं कि बैंक ऑफ कनाडा वर्ष 2026 के पूरे दौर में अपनी नीतिगत ब्याज दरों को बिना किसी बदलाव के स्थिर रखेगा। इसके बाद ही वर्ष 2027 में दरों में चरणबद्ध तरीके से बढ़ोतरी शुरू की जा सकती है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बनी रहने वाली मजबूती इस योजना को प्रभावित कर सकती है। यदि तेल के दाम लंबे समय तक चढ़े रहते हैं, तो केंद्रीय बैंक को अनुमान से पहले ही मौद्रिक सख्ती की तरफ कदम बढ़ाने पड़ सकते हैं।
अर्थशास्त्री एब्बी जू ने स्थिति का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया कि बुनियादी महंगाई के दबाव तुलनात्मक रूप से नियंत्रित रहे हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि इस बात के बेहद सीमित प्रमाण मिले हैं कि ऊर्जा की बढ़ी हुई लागत अर्थव्यवस्था में व्यापक स्तर पर दूसरे दौर की महंगाई को जन्म दे रही है। इसके बावजूद उनका कहना है कि कच्चे तेल के दाम जितने अधिक समय तक ऊंचे बने रहेंगे, लागत का बोझ अन्य उपभोक्ता वस्तुओं पर डाले जाने का जोखिम उतना ही ज्यादा बढ़ता जाएगा। ऐसी परिस्थिति में हेडलाइन मुद्रास्फीति में हर महीने होने वाले मामूली उतार-चढ़ाव की तुलना में यह देखना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि अंतर्निहित मूल्य दबाव कितने व्यापक और स्थायी हैं।
विदेशी मुद्रा बाजारों में सुस्ती और डॉलर का दबदबा
वैश्विक वित्तीय बाजारों में सोमवार को मिला-जुला रुख देखने को मिला। एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर की जोड़ी यानी AUD/USD दबाव में आ गई। यह जोड़ी फिसलकर लगभग 0.7140 के क्षेत्र में पहुंची, जो डेढ़ सप्ताह का निचला स्तर है। हालांकि इस गिरावट में आगे कोई बहुत तेज बिकवाली नहीं जुड़ी, और स्पॉट कीमतें 0.7100 के मध्य स्तर से थोड़ा ऊपर बनी रहीं, जो दिन के कारोबार में करीब 0.25 प्रतिशत की कमजोरी दर्शाती हैं।
दूसरी ओर अमेरिकी डॉलर और जापानी येन की जोड़ी অর্থাৎ USD/JPY में सप्ताह की शुरुआत में कुछ खरीदारी देखने को मिली। एशियाई सत्र के दौरान यह जोड़ी 154.00 के आंकड़े के करीब पहुंच गई और इसने शुक्रवार को हुए नुकसान के एक हिस्से की भरपाई कर ली। इसके बावजूद कीमतें पिछले एक सप्ताह से बने एक सीमित दायरे में ही फंसी नजर आईं। यह दायरा पिछले मंगलवार को छुए गए लगभग सात महीने के निचले स्तर के बेहद करीब है, क्योंकि मुद्रा कारोबारी आने वाले दिनों में निर्धारित प्रमुख केंद्रीय बैंकों के फैसलों और बैठकों का इंतजार कर रहे हैं।
सोने में भारी गिरावट और क्रिप्टोकरेंसी में बढ़त
कमोडिटी बाजार में सोने की कीमतों पर बिकवाली का गहरा दबाव दिखाई दिया। अमेरिकी डॉलर में आई जोरदार तेजी और अमेरिकी ट्रेजरी प्रतिफल में आई व्यापक उछाल के चलते पीली धातु कई हफ्तों के निचले स्तर पर खिसक गई। सोमवार को सोना टूटकर 4,250 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के स्तर के करीब पहुंच गया। कीमती धातुओं में यह गिरावट मुख्य रूप से अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की लगातार लगाई जा रही अटकलों और कच्चे तेल में आई तेजी के कारण दोबारा उभरी महंगाई की चिंताओं के कारण आई है।
पारंपरिक संपत्तियों में उठापटक के उलट डिजिटल परिसंपत्तियों के बाजार में सकारात्मक माहौल दिखा। बिटकॉइन में मजबूती दर्ज की गई और सोमवार को यह 77,884 डॉलर के आसपास कारोबार करता दिखा। पूरे क्रिप्टो बाजार में दिखे इस सुधार का फायदा अन्य टोकनों को भी मिला। एथेरियम और रिपल ने भी बिटकॉइन के तटस्थ से सकारात्मक रुख का अनुसरण किया और क्रमशः 2,521 डॉलर तथा 1.38 डॉलर के अपने महत्वपूर्ण तकनीकी समर्थन स्तरों को सफलतापूर्वक बचाए रखा।
फेडरल रिजर्व की नीति और राजनीतिक दबाव
अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उत्पादक मूल्य सूचकांक यानी PPI और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी CPI से जुड़े नए आंकड़ों के जारी होने के बाद अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा नीतिगत दरें बढ़ाने के दांव तेज हो गए हैं। वित्तीय बाजार अब केंद्रीय बैंक के आगामी डॉट प्लॉट पर बारीक नजर रखे हुए हैं, जो अमेरिकी डॉलर की दिशा तय करने में बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा।
इसके अलावा ब्याज दरों में कटौती के पक्षधर डोनाल्ड ट्रंप के दबाव के बीच वॉर्श की संस्थागत स्वतंत्रता भी एक कड़ी परीक्षा के दौर से गुजर रही है। डॉलर की मौजूदा मजबूती को आगे बढ़ाने के लिए फेडरल रिजर्व को बाजार में लगाई जा रही इन आक्रामक और सख्त नीतिगत उम्मीदों पर खरा उतरना होगा।



















