भारत में लगातार गहराते मुद्रास्फीति के दबाव के बीच मौद्रिक नीति में कड़े फैसलों की संभावना बढ़ गई है। वित्तीय सेवा संस्थान सोसिएते जेनेराल के अर्थशास्त्री कुणाल कुंडू का आकलन है कि भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई कीमतों में आई व्यापक तेजी को थामने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी का एक संक्षिप्त सिलसिला शुरू कर सकता है। इस अनुमान के मुताबिक केंद्रीय बैंक अपनी आगामी अक्टूबर नीतिगत बैठक में रेपो दर में 25 आधार अंकों का इजाफा कर सकता है। इसके बाद दिसंबर और फरवरी की बैठकों में भी पच्चीस-पच्चीस आधार अंकों की दो और वृद्धियां देखने को मिल सकती हैं। हालांकि यह मुख्य परिदृश्य नहीं है, फिर भी स्थिति बिगड़ने पर एक ही बार में 50 आधार अंकों की बड़ी बढ़ोतरी की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता।
सेवा क्षेत्र और खाद्य महंगाई के कारण मौद्रिक नीति पर बढ़ा दबाव
अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र की मुद्रास्फीति में आई तेजी ने नीति निर्धारकों के सामने जटिल चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। कुंडू का कहना है कि मौद्रिक नीति के नजरिए से सेवाओं की महंगाई में उछाल बेहद अहम पहलू बन चुका है। अब तक केंद्रीय बैंक खाद्य कीमतों में आने वाले अस्थायी उछाल को अनदेखा करने की रणनीति अपनाता रहा है, लेकिन अब यह गुंजाइश तेजी से घट रही है। हेडलाइन मुद्रास्फीति लगातार तीसरे महीने मध्यम लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है, जबकि मूल यानी अंतर्निहित महंगाई दर भी मजबूत हो रही है। जब खाद्य पदार्थों के साथ-साथ सेवाओं और मुख्य घटकों के दाम भी लगातार बढ़ते हैं, तो दरों में बदलाव के बिना कीमतों पर अंकुश लगाना मुश्किल हो जाता है।
दर वृद्धि की समयसीमा और संभावित बड़े कदम का जोखिम
सोसिएते जेनेराल के विश्लेषण के अनुसार केंद्रीय बैंक चरणबद्ध तरीके से ब्याज दरों को ऊपर ले जाने की तैयारी कर सकता है। कुणाल कुंडू ने कहा कि सेवा क्षेत्र की बढ़ती महंगाई मौद्रिक नीति के लिहाज से खास तौर पर संवेदनशील है, और उनका मानना है कि रिजर्व बैंक अक्टूबर में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी कर सकता है, जिसके बाद दिसंबर और फरवरी में भी इसी आकार के दो और कदम उठाए जा सकते हैं। इस सिलसिलेवार वृद्धि से कुल मिलाकर 75 आधार अंकों की दर वृद्धि दर्ज होगी। हालांकि विश्लेषक यह भी जोड़ते हैं कि यदि आर्थिक आंकड़े उम्मीद से ज्यादा आक्रामक रहे, तो केंद्रीय बैंक सीधे 50 आधार अंकों के भारी झटके का विकल्प भी चुन सकता है, जिसकी आशंका नगण्य नहीं है।
वैश्विक मुद्रा बाजारों में अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड प्रतिफल की स्थिति
भारतीय रिजर्व बैंक की नीतिगत चर्चाओं के साथ-साथ दुनिया भर के मुद्रा बाजारों में भी तीखी हलचल देखी जा रही है। फेडरल ओपन मार्केट कमेटी यानी एफओएमसी की बैठक से पहले अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल बहु-वर्षीय उच्च स्तरों के करीब बने हुए हैं। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से उपजे मुद्रास्फीति के जोखिम ने अमेरिकी डॉलर को व्यापक मजबूती प्रदान की है। इस माहौल में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर कमजोर पड़कर एशियाई कारोबारी सत्र में 0.7150 से नीचे बना हुआ है, जो पिछले कारोबारी दिन दर्ज किए गए तीन सप्ताह से अधिक के निचले स्तर के करीब है। चीन के अगस्त महीने के मिले-जुले आर्थिक आंकड़ों से भी ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा को कोई सहारा नहीं मिल सका।
जापानी येन और सोने की कीमतों पर वैश्विक बैठकों का असर
उधर डॉलर के मुकाबले जापानी मुद्रा में लगातार कमजोरी देखी जा रही है और अमेरिकी डॉलर 155.00 के स्तर की तरफ बढ़ रहा है। निवेशक जहां एक तरफ अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियों पर नजर बनाए हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ बैंक ऑफ जापान यानी बीओजे की बैठक भी इसी हफ्ते तय है। अमेरिकी दर वृद्धि के दांव डॉलर को सहारा दे रहे हैं, लेकिन बैंक ऑफ जापान द्वारा नीतिगत सामान्यीकरण के आक्रामक संकेतों की संभावना येन को समर्थन दे सकती है, जिससे इस जोड़ी की तेजी सीमित रहने की संभावना है। दूसरी ओर बहुमूल्य धातु सोना एशियाई सत्र में मामूली बढ़त के बावजूद एक महीने के निचले स्तर के करीब संघर्ष कर रहा है और 4,300 डॉलर प्रति औंस के ठीक नीचे कारोबार कर रहा है, क्योंकि व्यापारी एफओएमसी की दो दिवसीय नीतिगत बैठक से पहले किसी भी बड़े दांव से बच रहे हैं।



















