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शारीरिक बनावट या अंग्रेजी बोलने से जाति तय नहीं हो सकती, मद्रास हाईकोर्ट ने सतर्कता समिति का आदेश किया खारिजभारत
20 सित॰ 2026, 12:20 pm (31 मिनट पहले)· 0

शारीरिक बनावट या अंग्रेजी बोलने से जाति तय नहीं हो सकती, मद्रास हाईकोर्ट ने सतर्कता समिति का आदेश किया खारिज

मद्रास हाईकोर्ट ने साफ किया है कि किसी व्यक्ति का रंग, कद-काठी या अंग्रेजी बोलने का हुनर उसकी जाति तय नहीं कर सकता। अदालत ने कस्टम विभाग के एक रिटायर्ड असिस्टेंट कमिश्नर के अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र को रद्द करने वाले सतर्कता समिति के आदेश को खारिज कर दिया।

किसी इंसान की सामाजिक और जातिगत पहचान उसके बाहरी रंग-रूप, शारीरिक कद-काठी या भाषा की निपुणता पर निर्भर नहीं करती। मद्रास हाईकोर्ट ने इस सिद्धांत को मजबूती से रेखांकित करते हुए जिला स्तरीय सतर्कता समिति के उस फैसले को निरस्त कर दिया, जिसमें रूप-रंग और अंग्रेजी बोलने के आधार पर एक पूर्व सरकारी अधिकारी के अनुसूचित जाति वर्ग के प्रमाण पत्र को खारिज कर दिया गया था। अदालत ने इस तरह के तर्कों को पूरी तरह अतार्किक और आधारहीन करार दिया है।

सतर्कता समिति के तर्कों पर अदालत की सख्त टिप्पणी

यह पूरा मामला कस्टम विभाग के एक रिटायर्ड असिस्टेंट कमिश्नर एम. रविकुमार के जाति प्रमाण पत्र से जुड़ा हुआ है। जिला स्तरीय सतर्कता समिति ने उनके हिंदू आदि द्रविड़ जाति प्रमाण पत्र को अमान्य ठहराने के लिए बेहद अजीब दलीलें पेश की थीं। समिति का कहना था कि अधिकारी और उनके परिवार के सदस्य गोरे रंग के हैं, उनकी शारीरिक कद-काठी लंबी और सुगठित है, उनके बाल घुंघराले हैं तथा वे तमिल के अलावा बेहद फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं। समिति के अनुसार, इन बाहरी विशेषताओं के चलते वे अनुसूचित जाति समुदाय का हिस्सा नहीं लग सकते।

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मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती ने सतर्कता समिति के इस रुख पर कड़ा एतराज जताया। अदालत ने स्पष्ट किया कि बाहरी शारीरिक संरचना, रूप-रंग, शिक्षा या भाषाई दक्षता कभी भी किसी व्यक्ति की जातिगत पहचान का पैमाना नहीं बन सकती। न्यायाधीश ने कहा कि समिति द्वारा दिए गए ऐसे कारणों को किसी मानव-विज्ञानी यानी एंथ्रोपोलॉजिस्ट के गंभीर मूल्यांकन का आधार नहीं माना जा सकता।

धार्मिक मान्यताओं की पड़ताल पर जोर

सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि सतर्कता समिति ने अपने आदेश में यह बात दर्ज की थी कि याचिकाकर्ता के पिता ईसाई धर्म से जुड़े थे और उनके निधन के बाद उन्हें ईसाई कब्रिस्तान में दफनाया गया था। इस पहलू पर हाईकोर्ट ने अपनी राय रखते हुए स्थिति स्पष्ट की।

अदालत ने कहा कि यह जांचना जरूर प्रासंगिक हो सकता है कि याचिकाकर्ता स्वयं हिंदू देवी-देवताओं की उपासना करते हैं या फिर वे ईसाई धर्म का पालन करते हैं। लेकिन बाहरी रूप-रंग, त्वचा के रंग और अंग्रेजी में बातचीत करने जैसे आधार पूरी तरह महत्वहीन हैं। अदालत ने समिति के मनमाने आदेश को रद्द करते हुए मामले को दोबारा भेजा और निर्देश दिया कि जिला समिति आठ सप्ताह के भीतर सभी कानूनी पहलुओं की विधिवत जांच पूरी करके नया आदेश पारित करे।

सवाल-जवाब

मद्रास हाईकोर्ट ने किस मामले में यह फैसला सुनाया?
अदालत ने कस्टम विभाग के रिटायर्ड असिस्टेंट कमिश्नर एम. रविकुमार के हिंदू आदि द्रविड़ जाति प्रमाण पत्र को रद्द करने वाले आदेश पर यह फैसला सुनाया।
जिला सतर्कता समिति ने जाति प्रमाण पत्र रद्द करने के लिए क्या दलील दी थी?
समिति ने दलील दी थी कि अधिकारी और उनका परिवार गोरा है, उनकी कद-काठी लंबी है, बाल घुंघराले हैं और वे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं, इसलिए वे अनुसूचित जाति के नहीं हो सकते।
अदालत ने समिति के तर्कों को क्यों खारिज किया?
जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती ने स्पष्ट किया कि बाहरी रंग-रूप, शारीरिक कद-काठी या भाषाई दक्षता को किसी व्यक्ति की जातिगत पहचान का आधार नहीं बनाया जा सकता।
याचिकाकर्ता के पिता के संदर्भ में अदालत ने क्या टिप्पणी की?
हाईकोर्ट ने कहा कि यह जांचना अहम हो सकता है कि याचिकाकर्ता स्वयं हिंदू मान्यताओं को मानते हैं या ईसाई धर्म को, क्योंकि उनके पिता ईसाई कब्रिस्तान में दफनाए गए थे।
हाईकोर्ट ने सतर्कता समिति को क्या निर्देश जारी किया है?
अदालत ने समिति के पुराने आदेश को रद्द करते हुए आठ सप्ताह के भीतर नए सिरे से विधिवत जांच कर नया आदेश जारी करने का निर्देश दिया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·5 मिनट पहले

यह फैसला प्रशासनिक जांच प्रक्रियाओं में व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों की जगह संवैधानिक नियमों को प्राथमिकता देने का बड़ा संदेश देता है। सतर्कता समितियों द्वारा बाहरी रंग-रूप या भाषा जैसे भ्रामक आधारों पर जाति तय करना जांच प्रणाली की गंभीर खामी को उजागर करता है। धार्मिक आस्था की वास्तविक पड़ताल को कानूनी पैमाना मानना और मनमाने आदेशों को खारिज करना न्याय व्यवस्था की पारदर्शिता बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है। इससे भविष्य में जाति प्रमाण पत्रों के सत्यापन में मनमानी रोकने में मदद मिलेगी।

Arjun Mehta@arjun-mehta·4 मिनट पहले

यह फैसला शासन और लोक नीति के स्तर पर एक महत्वपूर्ण सबक है। नौकरशाही में संस्थागत सुधारों की तात्कालिक आवश्यकता रेखांकित होती है, क्योंकि प्रशासनिक समितियाँ अक्सर वस्तुनिष्ठ साक्ष्यों के बजाय सामाजिक पूर्वाग्रहों के आधार पर निर्णय लेती हैं। राज्य सरकारों को चाहिए कि वे जाति सत्यापन समितियों के लिए स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) और नीतिगत दिशानिर्देश जारी करें। यदि इस तरह के पूर्वाग्रहों को समाप्त नहीं किया गया, तो आरक्षण और सामाजिक कल्याण योजनाओं का लाभ पाने वाले पात्र नागरिकों को प्रशासनिक उत्पीड़न झेलना पड़ेगा।

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