देश की परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए केंद्र सरकार द्वारा एक उच्च स्तरीय कार्यबल का गठन किया गया है, जिसकी कमान इंफोसिस के सह-संस्थापक और आधार के मुख्य वास्तुकार नंदन नीलेकणि को सौंपी गई है। इस नियुक्ति के बाद सियासी गलियारों और विशेषज्ञों के बीच चर्चा तेज हो गई है कि यह समिति देश की पुरानी और जटिल हो चुकी परीक्षा प्रणाली में किस तरह के बदलाव लाती है।
संसदीय प्रतिनिधियों की राय को लेकर उठ रहे हैं सवाल
इस पूरी प्रक्रिया पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट के जरिए अपनी बात रखी। उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई कि इस अहम कार्यबल को संसद में जनता के प्रतिनिधियों यानी सांसदों से विचार-विमर्श करने के लिए विशेष निर्देश नहीं दिए गए हैं। उनका मानना है कि नीतिगत बदलावों में जनप्रतिनिधियों को शामिल करना व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बना सकता है।
नंदन नीलेकणि को लिखा गया खुला पत्र
नंदन नीलेकणि के साथ अपनी पुरानी मित्रता का हवाला देते हुए शशि थरूर ने उन्हें एक खुला पत्र भेजने का फैसला किया है। इस पत्र के माध्यम से वे उन तमाम जरूरी और महत्वपूर्ण कदमों को रेखांकित करना चाहते हैं जिन पर इस नई समिति को गंभीरता से विचार करना चाहिए। उनका यह कदम परीक्षा तंत्र में सुधार की मांग को एक नया वैचारिक आयाम देता है।
परीक्षा सुधार कार्यबल के सामने बड़ी चुनौतियां
भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं और शैक्षणिक मूल्यांकन प्रणालियों में पिछले कुछ समय से लगातार धांधली, पेपर लीक और प्रशासनिक लापरवाही जैसी समस्याएं सामने आती रही हैं। इन विकट चुनौतियों से निपटने के लिए ही सरकार ने नंदन नीलेकणि के नेतृत्व में इस टास्क फोर्स का गठन किया है, ताकि तकनीक और प्रबंधन के जरिए इस पूरी व्यवस्था को पूरी तरह दुरुस्त किया जा सके।


























