अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर राय
TrendKia के साथ हुई एक विशेष बातचीत में Shashi Tharoor ने कहा कि किसी भी सफल शांति समझौते के लिए यह जरूरी है कि उसमें शामिल दोनों पक्षों को अपनी जीत का अहसास हो। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कोई एक पक्ष खुद को अपमानित महसूस करेगा, तो शांति लंबे समय तक नहीं टिकेगी। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के बाद की वर्साय की संधि का उदाहरण दिया, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध की नींव रखी थी।
Shashi Tharoor के अनुसार, अगर अमेरिका और ईरान इस समझौते पर कायम रहते हैं, तो यह भारत सहित दुनिया भर के देशों के लिए राहत की बात होगी। उन्होंने बताया कि ईरान को प्रतिबंधों से राहत और अपनी रुकी हुई संपत्ति वापस मिलने जैसे लाभ मिल रहे हैं, जबकि अमेरिका यूरेनियम संवर्धन (enrichment) पर रोक जैसी शर्तें हासिल कर रहा है। हालांकि, होर्मुज जलडमरूमध्य में बारूदी सुरंगों और नष्ट हुए तेल बुनियादी ढांचे के कारण सामान्य स्थिति बहाल होने में एक या डेढ़ साल तक का समय लग सकता है।
850 सांसदों वाली संसद की व्यवहारिकता
संसद में 'संविधान (131वां संशोधन) विधेयक- 2026' के माध्यम से सीटों की संख्या 850 तक बढ़ाने की चर्चा पर Shashi Tharoor ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने इस आंकड़े को मजाक करार देते हुए कहा कि इतनी बड़ी संसद का संचालन करना असंभव होगा। उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां की आबादी तीन गुना बढ़ने के बावजूद House of Representatives में सदस्यों की संख्या 435 ही है।
Shashi Tharoor ने तर्क दिया कि यदि भारत में 850 सांसद होते हैं, तो अधिकांश को कभी न तो जीरो आवर में बोलने का मौका मिलेगा और न ही वे बहस में योगदान दे पाएंगे। उन्होंने सुझाव दिया कि हमें अमेरिका के सीनेट मॉडल या यूरोपियन यूनियन की तर्ज पर राज्यों के प्रतिनिधित्व को संतुलित करने पर चर्चा करनी चाहिए, ताकि सिक्किम जैसे छोटे राज्यों की आवाज भी दब न जाए।
प्रधानमंत्री की कार्यशैली पर टिप्पणी
Shashi Tharoor ने स्वीकार किया कि Narendra Modi का अपनी भाषा पर मजबूत पकड़ है और वे हिंदी के बेहतरीन वक्ताओं में से एक हैं। उन्होंने कहा कि Narendra Modi का एक स्पष्ट विजन है और वे लोगों तक प्रभावी ढंग से अपनी बात पहुंचाते हैं। हालांकि, उन्होंने विपक्ष के नजरिए से देश में बढ़ते सांप्रदायिक बंटवारे और लोकतंत्र की स्वतंत्र संस्थाओं पर चिंता भी जताई। उन्होंने कहा कि पिछले 12 सालों में राजनीतिक बयानबाजी से देश का एक बड़ा वर्ग खुद को अलग-थलग महसूस कर रहा है।













