राजस्थान के भरतपुर शहर में नगर निगम के स्वच्छता अभियान और सफाई के बड़े-बड़े दावे जमीनी स्तर पर पूरी तरह खोखले साबित हो रहे हैं। शहरी क्षेत्र को स्वच्छ और सुंदर बनाने के नाम पर नगर निगम की तरफ से हर साल करोड़ों रुपये का भारी-भरकम बजट खर्च किया जा रहा है, लेकिन इसके विपरीत शहर की गलियों और मुख्य सड़कों पर कचरे के बड़े-बड़े ढेर लगे हुए हैं। शहर का शायद ही कोई ऐसा कोना या आवासीय इलाका बचा हो, जहाँ के बाशिंदे कचरा प्रबंधन की लचर व्यवस्था और गंदगी से परेशान न हों। रिहायशी बस्तियों से लेकर प्रमुख चौराहों तक फैली यह अव्यवस्था सीधे तौर पर स्थानीय निगम प्रशासन के कामकाज और उसकी कार्यकुशलता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
वीवीआईपी रास्तों पर भी पसरा कचरा
नगर निगम की अनदेखी का असर सिर्फ आम कॉलोनियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि शहर के प्रशासनिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण और वीवीआईपी माने जाने वाले क्षेत्रों में भी यही आलम है। भरतपुर शहर में मुख्यमंत्री आवास की ओर जाने वाली मुख्य सड़क पर भी जगह-जगह कचरे के भारी ढेर आसानी से देखे जा सकते हैं। इस वीवीआईपी मार्ग से प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का निरंतर आवागमन रहता है, इसके बावजूद सड़क किनारे जमा गंदगी को हटाने की कोई सुध नहीं ली जा रही है। जब शहर के सबसे महत्वपूर्ण मार्ग की सफाई व्यवस्था इतनी बदहाल है, तो अंदरूनी बस्तियों और आम रिहायशी मोहल्लों में रहने वाले लोगों की समस्याओं का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
घर-घर कचरा उठाने वाली गाड़ियों की अनियमिता
शहरवासियों का कहना है कि घर-घर जाकर कचरा इकट्ठा करने वाली गाड़ियों का संचालन बिल्कुल भी नियमित नहीं है। कई इलाकों में स्थिति यह हो चुकी है कि कई-कई दिनों तक निगम का कोई वाहन या कर्मचारी कचरा उठाने नहीं पहुँचता है। ऐसे में घरों से निकलने वाला सूखा और गीला कचरा लोगों को मजबूरी में खाली पड़े भूखंडों या सड़कों के किनारे फेंकना पड़ता है। खुले में पड़े इस कचरे के लगातार सड़ने से चारों तरफ भीषण दुर्गंध फैल रही है और मच्छरों का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। बदबू और गंदगी के कारण आसपास रहने वाले नागरिकों का जीना दूभर हो गया है, जबकि नगर निगम केवल कागजी उपलब्धियों में व्यस्त दिखाई दे रहा है।
कागजी दावों और प्रशासनिक निगरानी पर सवाल
नगर निगम द्वारा सफाई कर्मचारियों की भारी तैनाती और घर-घर कचरा संग्रह के लिए वाहनों के संचालन पर जनता के खून-पसीने की कमाई का करोड़ों रुपया बहाया जा रहा है। इसके बावजूद जमीन पर स्थिति सुधरने के बजाय लगातार बिगड़ती जा रही है, जिससे योजनाओं के क्रियान्वयन और उसकी सख्त निगरानी पर उंगलियां उठ रही हैं। कागजों पर बनाई गई योजनाएं धरातल पर दम तोड़ रही हैं क्योंकि संबंधित अधिकारियों द्वारा जमीनी निरीक्षण की घोर कमी है। शहर की इस दुर्दशा के सामने आने के बाद अब स्थानीय नागरिकों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि निगम प्रशासन इन समस्याओं को लेकर क्या कड़े कदम उठाता है और लोगों को गंदगी के इस जाल से कब तक वास्तविक मुक्ति मिल पाती है।


















