श्रावण महीने में हर साल लाखों शिवभक्त हरिद्वार से गंगाजल लेकर अपने शहरों के शिवालयों तक कांवड़ यात्रा करते हैं, लेकिन फरीदाबाद के रास्ते से गुजरा एक कांवड़ दल हर किसी को भावुक कर गया. 15 साल की साधना अपने पिता, छोटी बहन और छोटे भाई के साथ कंधे पर कांवड़ लिए उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले स्थित अपने गांव कोसीकलां की ओर बढ़ रही है. परिवार की आर्थिक हालत बेहद कमजोर है, फिर भी साधना ने हार मानने के बजाय हरिद्वार से यह पैदल यात्रा शुरू करने का फैसला किया, सिर्फ इस उम्मीद में कि उसकी पढ़ाई किसी हाल में न रुके.
27 जुलाई को हरिद्वार से निकला परिवार
साधना 11वीं कक्षा में पढ़ती है और वह 27 जुलाई को हरिद्वार से कांवड़ लेकर निकली थी. उसके साथ उसकी छोटी बहन और छोटा भाई भी कांवड़ उठाए हुए हैं, जबकि पिता भी पहली बार अपनी बेटियों और बेटे के साथ इस यात्रा में शामिल हुए हैं. रोज कमाकर घर चलाने वाले इस परिवार के लिए ऐसी लंबी यात्रा पर निकलना अपने आप में एक बड़ा फैसला है, क्योंकि इतने दिन घर और काम से दूर रहना आसान नहीं होता.
साधना बताती है, "मेरे पापा बहुत गरीब हैं, मैं चाहती हूं भोले बाबा हमारी सारी परेशानियां दूर करें ताकि मैं अपनी पढ़ाई जारी रख सकूं." हरिद्वार से फरीदाबाद तक के पूरे रास्ते में परिवार को किसी तरह की दिक्कत नहीं हुई, क्योंकि जगह-जगह श्रद्धालुओं ने उनकी सेवा की और आगे बढ़ने का हौसला दिया. साधना के लिए यह जिंदगी की पहली कांवड़ यात्रा है, और उसके पिता के लिए भी यह पहला मौका है जब वह कांवड़ लेकर निकले हैं.
दिव्यांग मां-बाप, सिलाई से चलता घर
साधना मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के कोसीकलां गांव की रहने वाली है. उसके मम्मी और पापा दोनों दिव्यांग हैं. पिता सिलाई का काम करके परिवार चलाते हैं जबकि मां घर संभालती है. चार भाई-बहनों में साधना सबसे बड़ी है, और यही वजह है कि परिवार की चिंता और जिम्मेदारी उस पर भी आ टिकी है.
एक बहन घर पर ही रह गई है, जबकि बाकी तीनों भाई-बहन अपने पिता के साथ इस पैदल यात्रा पर निकले हैं. रोज की कमाई पर गुजारा करने वाले इस परिवार के लिए इतने दिन घर से दूर रहना आसान नहीं, लेकिन बेटी की जिद के आगे हर हिचक पीछे छूट गई.
कर्ज और फीस की चिंता में डूबे पिता भरत सिंह
साधना के पिता भरत सिंह बताते हैं कि सिलाई के काम से इतनी कमाई नहीं होती कि बच्चों की स्कूल फीस समय पर भरी जा सके. घर बनाने के लिए उन्होंने कर्ज लिया था और अब उसकी किस्तें चुकाना भी उनके लिए मुश्किल हो रहा है. रोजमर्रा का घर खर्च चलाना भी परिवार के लिए टेढ़ी खीर बन गया है, और यह पैसों की चिंता कई दिनों तक पैदल चलने की थकान के साथ-साथ चलती रहती है.
इसी मुश्किल हालात में बेटी ने खुद भोले बाबा पर भरोसा जताते हुए कांवड़ यात्रा पर निकलने का फैसला लिया. भरत सिंह कहते हैं,
मुझे विश्वास है कि भगवान हमारी मनोकामना जरूर पूरी करेंगे.
बेटी के सपनों को उड़ान देने की उम्मीद
भरत सिंह के मुताबिक परिवार की आर्थिक स्थिति भले ही कमजोर हो, लेकिन भगवान पर भरोसा कभी नहीं डगमगाया. उनकी बेटी पढ़-लिखकर आगे बढ़ना चाहती है, और यही उसकी सबसे बड़ी चाहत है. परिवार चाहता है कि किसी भी हालत में साधना की पढ़ाई न रुके.
उन्हें उम्मीद है कि भोले बाबा उनकी प्रार्थना सुनेंगे और बेटी के सपनों को पूरा करने का रास्ता खुद खोल देंगे. गरीबी और कर्ज के बीच भी हार न मानने वाले इस परिवार की आस्था और संघर्ष आज उन सभी के लिए मिसाल बन गया है जो मुश्किल वक्त में भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ते. सिलाई मशीन पर चलते पिता के हाथ और बेटी की किताबों में बसी उम्मीद, यही इस परिवार की सच्ची पूंजी है.



















