देश के खेल तंत्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए जमीनी स्तर से लेकर शीर्ष व्यवस्था तक व्यापक बदलाव की आवश्यकता रेखांकित की गई है। पूर्व केंद्रीय खेल मंत्री अनुराग ठाकुर ने भारतीय खेलों की प्रगति को गति देने के लिए एक बहुपक्षीय दृष्टिकोण सामने रखा है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल केंद्रीय स्तर के कदमों से पूरे देश का खेल परिदृश्य नहीं बदल सकता। इसके लिए राज्य सरकारों, खेल महासंघों, निजी क्षेत्र और समाज की सामूहिक भागीदारी आवश्यक है।
सहयोग और सहभागिता का पांच सूत्रीय मॉडल
खेल व्यवस्था की मजबूती को लेकर चर्चा करते हुए अनुराग ठाकुर ने कहा कि केंद्र की भूमिका मुख्य रूप से एक सूत्रधार और मार्गदर्शन प्रदान करने वाले तंत्र की तरह होती है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ी तिरंगे के गौरव के लिए उतरते हैं। इसके विपरीत, दैनिक प्रशिक्षण और बुनियादी विकास का दायित्व काफी हद तक राज्यों और खेल निकायों पर निर्भर करता है।
भारतीय खेलों के विकास को गति देने के लिए उन्होंने पांच प्रमुख घटकों को एक मंच पर लाने का आह्वान किया। उनके अनुसार, व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए केंद्र सरकार, प्रांतीय सरकारें, खेल संघ एवं महासंघ, कॉरपोरेट घराने और व्यक्तिगत दानदाताओं व गैर-सरकारी संगठनों का एक साझा तंत्र बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक ये पांचों अंग मिलकर प्रयास नहीं करेंगे, तब तक खेल जगत में अपेक्षित मजबूती हासिल नहीं की जा सकती।
खेल बजट में पारदर्शिता और डिजिटल डैशबोर्ड की मांग
राज्यों द्वारा खेल मद में आवंटित की जाने वाली धनराशि की कार्यप्रणाली पर विचार व्यक्त करते हुए पूर्व खेल मंत्री ने वित्तीय पारदर्शिता पर विशेष बल दिया। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि प्रत्येक राज्य को एक सार्वजनिक स्पोर्ट्स डैशबोर्ड तैयार करना चाहिए, जहां वार्षिक आवंटन और उसके वास्तविक खर्च का पूरा ब्योरा नागरिकों के सामने स्पष्ट रहे।
इस वित्तीय ढांचे को अधिक व्यावहारिक बनाने के लिए उन्होंने बजट को तीन स्पष्ट श्रेणियों में बांटने की सलाह दी। पहली श्रेणी कैपिटल एक्सपेंडिचर की हो, जिसमें स्टेडियम, मैदान और आधुनिक उपकरणों जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण का खर्च शामिल हो। दूसरी श्रेणी ऑपरेशनल खर्चों की हो, जिसके अंतर्गत कोच, तकनीकी विशेषज्ञ, प्रशासनिक अमले और दैनिक रखरखाव की लागत दर्शाई जाए। तीसरी श्रेणी सीधे तौर पर एथलीटों के विकास से जुड़ी होनी चाहिए, जिसमें प्रतियोगिताओं के आयोजन और खिलाड़ियों के विशेष प्रशिक्षण शिविरों के खर्च का स्पष्ट उल्लेख मिले।
पारदर्शिता के अभाव की चर्चा करते हुए उन्होंने हिमाचल प्रदेश की बजटीय व्यवस्था का उल्लेख किया। उन्होंने इंगित किया कि जब शिक्षा, युवा सेवाएं और खेल मदों को एक ही शीर्षक के तहत सम्मिलित कर दिया जाता है, तब यह समझना बेहद कठिन हो जाता है कि खेल के विकास के लिए वास्तव में कितनी राशि धरातल पर पहुंच रही है।
दीर्घकालिक लक्ष्य और प्राथमिकता वाले खेलों का चयन
भविष्य की बड़ी वैश्विक खेल प्रतियोगिताओं को ध्यान में रखते हुए उन्होंने राज्यों को सुविचारित रणनीति अपनाने की सलाह दी। राज्यों को वर्ष 2030 और 2036 के बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों को लक्ष्य बनाकर अपनी पदक संभावनाओं का ठोस आकलन करना चाहिए। इसके तहत प्रत्येक राज्य को अपनी क्षमता के अनुसार कम से कम तीन प्राथमिकता वाले खेल चिह्नित करने चाहिए और उनमें लंबी अवधि का निवेश करना चाहिए।
भारतीय ओलंपिक अभियानों में राज्यों की भूमिका का उल्लेख करते हुए उन्होंने हरियाणा के योगदान की सराहना की, जिसने अपनी केंद्रित नीतियों से देश को अनेक पदक विजेता दिए हैं। हरियाणा ने 2026-27 के दौरान मिशन ओलंपिक 2036 के तहत युवा प्रतिभाओं को तराशने की विशेष कार्ययोजना पर काम शुरू किया है। उनका मानना है कि जब सभी राज्य इसी तरह के केंद्रित प्रयासों को एक एकीकृत राष्ट्रीय तंत्र के साथ जोड़ेंगे, तभी भारतीय खेलों की वास्तविक क्षमता पूरी दुनिया के सामने आ सकेगी।
















