बाड़मेर जिले के एक छोटे से सीमावर्ती गांव सांजटा में रहने वाले पोलाराम ने वह कर दिखाया है, जिसकी उम्मीद कभी उनके परिवार ने भी नहीं की थी। मां की असमय मौत, बूढ़े पिता की बेबसी और घर की तंगहाली के बीच पोलाराम ने देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट-यूजी में 657 अंक हासिल किए हैं। इस प्रदर्शन के दम पर उन्हें ऑल इंडिया स्तर पर 1041वीं रैंक और कैटेगरी में 321वीं रैंक मिली है।
मां के जाने के बाद टूटा परिवार, भाई ने संभाला मोर्चा
पोलाराम के लिए यह सफर शुरुआत से ही आसान नहीं था। साल 2021 में उनकी मां का अचानक निधन हो गया, जिसने पूरे परिवार को झकझोर दिया। पिता रामाराम की उम्र ढल चुकी थी और वे शरीर से इतने कमजोर हो गए थे कि मजदूरी करना उनके लिए संभव नहीं रहा। ऐसे में घर की जिम्मेदारी पोलाराम के बड़े भाई के कंधों पर आ गई। उन्होंने खुद मजदूरी करके न सिर्फ घर चलाया, बल्कि छोटे भाई की पढ़ाई भी जारी रखवाई, ताकि पोलाराम का सपना अधूरा न रह जाए।
किताबों तक का खर्च नहीं था, विज्ञान छोड़ने की नौबत आई
हालात इतने बिगड़ गए थे कि एक समय पोलाराम विज्ञान वर्ग छोड़कर कला वर्ग में दाखिला लेने पर विचार करने लगे थे। वजह साफ थी, मेडिकल की तैयारी और विज्ञान की महंगी किताबों का खर्च उनके परिवार की पहुंच से बाहर हो चुका था। घर में कमाने वाला सिर्फ एक भाई था और वह भी मजदूरी के भरोसे परिवार चला रहा था, इसलिए पढ़ाई का खर्च जुटाना किसी चुनौती से कम नहीं था।
फिफ्टी विलेजर्स संस्थान ने बढ़ाया मदद का हाथ
इसी मुश्किल घड़ी में बाड़मेर की चर्चित संस्था फिफ्टी विलेजर्स सेवा संस्थान पोलाराम के लिए संबल बनकर सामने आई। संस्थान ने उनकी काबिलियत को पहचाना और रहने, खाने से लेकर पढ़ाई तक की पूरी व्यवस्था अपने हाथों में ले ली। साथ ही उन्हें सही मार्गदर्शन और अनुशासित माहौल भी मुहैया कराया गया। संस्थान के संस्थापक डॉ. भरत सारण और वहां के शिक्षकों की निगरानी में पोलाराम ने दिन-रात मेहनत की और अपनी तैयारी को नई धार दी।
गांव में इलाज की सुविधा नहीं, इसीलिए चुना डॉक्टरी का रास्ता
पोलाराम बताते हैं कि उनके गांव सांजटा समेत आसपास के सीमावर्ती इलाकों में आज भी अच्छी स्वास्थ्य और चिकित्सा सुविधाओं का भारी अभाव है। मामूली बीमारी होने पर भी ग्रामीणों को इलाज के लिए दूर के बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है। इसी तकलीफ को करीब से देखकर उन्होंने डॉक्टर बनने की ठान ली थी, ताकि पढ़ाई पूरी करने के बाद वे अपने ही इलाके में लौटकर गरीब और जरूरतमंद लोगों का मुफ्त इलाज कर सकें।
सफलता का श्रेय परिवार और गुरुजनों को
अपनी इस बड़ी कामयाबी पर पोलाराम ने पूरा श्रेय अपने स्वर्गीय माता-पिता, मजदूरी कर पढ़ाई का खर्च उठाने वाले भाई, अपने गुरुजनों, डॉ. भरत सारण और फिफ्टी विलेजर्स संस्थान की पूरी टीम को दिया है। पोलाराम की इस उपलब्धि से न सिर्फ उनका गांव सांजटा, बल्कि पूरा बाड़मेर जिला गर्व से भर गया है।




















