यह कहानी इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि जब इंसान का हौसला और उसकी मेहनत अडिग हो, तो दुनिया की कोई भी मुश्किल उसे अपनी मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती। एजुकेशन हब कोटा के रहने वाले आर्यन मालव ने देश की सबसे कठिन मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट (NEET) में अपनी कामयाबी का परचम लहराया है। आर्यन का यह सफर सिर्फ एक छात्र के डॉक्टर बनने की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक पूरे परिवार के जज्बे, उनके संघर्ष और अटूट विश्वास की मिसाल है। एक तरफ जहां लाखों छात्र भारी-भरकम सुविधाओं के साथ इस परीक्षा की तैयारी करते हैं, वहीं आर्यन ने भीषण आर्थिक तंगी, घर में अचानक आई एक बड़ी मेडिकल इमरजेंसी और परीक्षा रद्द होने जैसी मानसिक प्रताड़ना का डटकर सामना किया। यहां तक कि दोबारा परीक्षा देते समय बारिश का पानी उनकी उत्तर पुस्तिका पर गिरने लगा, लेकिन उन्होंने अपना आपा नहीं खोया और यह साबित कर दिया कि सच्ची लगन के सामने हर चुनौती छोटी पड़ जाती है।
एक छोटे से गांव से कोटा तक का सफर और बड़े भाई का सपना
इस बड़ी कामयाबी की नींव कई साल पहले तब पड़ी थी, जब आर्यन के पिता मुरलीधर मालव अपने पैतृक गांव भवानीपुरा (जो बूंदी जिले में स्थित है) से परिवार सहित कोटा आ बसे थे। शहर आकर उन्होंने अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए स्टेशनरी का एक छोटा सा काम शुरू किया। आमदनी बहुत सीमित थी, लेकिन मुरलीधर और उनकी पत्नी ने हमेशा अपने बच्चों की पढ़ाई को अपनी सुख-सुविधाओं से ऊपर रखा। यह पूरा परिवार विनोबा भावे नगर में एक बहुत ही छोटे से किराए के मकान में रहता था, जहां संसाधनों की भारी कमी थी। घर में डॉक्टर बनने का सबसे पहला सपना आर्यन के बड़े भाई राज ने देखा था। राज ने भी नीट की तैयारी में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण उन्हें सफलता नहीं मिल सकी। इसके बाद राज ने हार नहीं मानी और नर्सिंग की पढ़ाई पूरी कर ली, और अब वे एक सरकारी नौकरी की तैयारी में जुटे हैं। अपने बड़े भाई का वह अधूरा सपना आर्यन के दिलोदिमाग में बस गया और यही सपना उनके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा बन गया।
पढ़ाई में शानदार प्रदर्शन और स्कॉलरशिप का सहारा
आर्यन शुरू से ही पढ़ाई-लिखाई में बेहद होनहार थे। उनकी इस प्रतिभा का पहला बड़ा प्रमाण तब मिला जब उन्होंने अपनी दसवीं बोर्ड परीक्षा में शानदार 94 प्रतिशत अंक हासिल किए। इस बेहतरीन नतीजे ने उनके माता-पिता और बड़े भाई के मन में यह पक्का विश्वास जगा दिया कि आर्यन के अंदर डॉक्टर बनने की पूरी काबिलियत है। लेकिन, कोटा जैसे शहर में नीट की कोचिंग का खर्च उठाना इस गरीब परिवार के लिए किसी पहाड़ चढ़ने से कम नहीं था। निजी कोचिंग संस्थानों की भारी-भरकम फीस चुकाना उनके बस की बात नहीं थी। इसी चिंता के बीच एक बहुत बड़ी राहत तब मिली जब आर्यन ने अपनी मेहनत के दम पर एक निजी कोचिंग संस्थान की स्कॉलरशिप योजना में बाजी मारी। इस योजना के तहत उन्हें फीस में 70 प्रतिशत की भारी छूट मिल गई। इस स्कॉलरशिप ने आर्यन की राह के सबसे बड़े आर्थिक रोड़े को हटा दिया और वह पूरे मन से अपनी तैयारी में लग गए।
तैयारी के बीच पिता को लकवा मारने का भयानक संकट
कोचिंग में दाखिला मिलने के बाद परिवार ने राहत की सांस ली थी कि अब आर्यन बिना किसी चिंता के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ सकेगा, लेकिन तभी किस्मत ने एक बहुत ही क्रूर मोड़ लिया। इसी तैयारी के दौरान आर्यन के पिता मुरलीधर मालव को अचानक पैरालिसिस (लकवा) का भयंकर अटैक आ गया। इस एक घटना ने पूरे परिवार को आर्थिक और मानसिक तौर पर बुरी तरह तोड़ कर रख दिया। घर के इकलौते कमाने वाले सदस्य के बिस्तर पर पड़ जाने से घर में पैसों का भारी संकट खड़ा हो गया। ऐसे बेहद नाजुक और तनावपूर्ण माहौल में आर्यन के बड़े भाई राज ने एक सच्चे ढाल की तरह घर की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। राज ने यह सुनिश्चित किया कि घर की इस भयानक स्थिति का असर आर्यन की पढ़ाई पर बिल्कुल न पड़े और वह बिना किसी मानसिक दबाव के अपनी कोचिंग जारी रख सके।
एक ही कमरे में बैठकर पढ़ाई और स्मार्टफोन से दूरी
विनोबा भावे नगर वाले उस छोटे से किराए के मकान में पूरा परिवार एक ही कमरे में गुजारा करता था। आर्यन के पास शांति से बैठकर पढ़ने के लिए कोई अलग कमरा या एकांत जगह नहीं थी। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और उसी भीड़-भाड़ वाले कमरे के एक छोटे से कोने को अपनी दुनिया बना लिया। वह उसी कोने में बैठकर लगातार घंटों तक पढ़ाई करते रहते थे। आर्यन ने खुद से यह कड़ा वादा किया था कि चाहे घर के हालात कितने भी खराब क्यों न हों, वह कोचिंग की एक भी क्लास नहीं छोड़ेंगे। जहां आजकल के ज्यादातर युवा अपना समय स्मार्टफोन और सोशल मीडिया पर बर्बाद करते हैं, वहीं आर्यन ने अपनी परीक्षा की गंभीरता को समझते हुए मोबाइल फोन से पूरी तरह दूरी बना ली। उनकी दिनचर्या में सिर्फ नियमित रूप से पढ़ाई करना, हर टेस्ट को पूरी ईमानदारी से देना और फिर अपनी गलतियों का गहराई से विश्लेषण करना शामिल हो गया था। इसी कड़ी मेहनत की बदौलत उन्होंने सितंबर महीने तक ही नीट का अपना पूरा सिलेबस खत्म कर लिया और फिर सिर्फ रिवीजन और मॉक टेस्ट पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित कर दिया।
नीट परीक्षा रद्द होने का सदमा और बारिश में भीगती कॉपी
कक्षा बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में भी आर्यन ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और 90 प्रतिशत से ज्यादा अंक हासिल किए। जब उन्होंने पहली बार नीट की परीक्षा दी, तो उनकी सारी मेहनत रंग लाई और उन्हें 648 अंक प्राप्त हुए। इतने अंकों के साथ किसी भी अच्छे सरकारी मेडिकल कॉलेज में उनका चयन पक्का था। लेकिन तभी अचानक पूरे देश में नीट परीक्षा को रद्द करने और इसे दोबारा आयोजित कराने का ऐलान हो गया। इस खबर ने मालव परिवार की खुशियों पर पानी फेर दिया और घर में फिर से गहरी चिंता और निराशा का माहौल छा गया। लेकिन आर्यन ने इस मानसिक प्रताड़ना के आगे भी घुटने नहीं टेके। उन्होंने एक बार फिर से किताबों को उठाया और नए सिरे से तैयारी में जुट गए। जब वह पुनर्परीक्षा देने परीक्षा केंद्र पर पहुंचे, तो कुदरत ने फिर उनकी परीक्षा ली। वहां तेज बारिश हो रही थी और खिड़की से पानी सीधा अंदर आ रहा था, जिससे उनकी उत्तर पुस्तिका भीगने लगी। किसी और छात्र के लिए यह घबराने वाली स्थिति हो सकती थी, लेकिन आर्यन ने अपना धैर्य बिल्कुल नहीं खोया और पूरे संयम के साथ अपनी परीक्षा पूरी की। इस कठिन परिस्थिति में दोबारा परीक्षा देकर भी उन्होंने 610 अंकों का शानदार स्कोर खड़ा किया।
लोगों की सेवा करने का बड़ा सपना
अब 610 अंकों के साथ आर्यन को यह पूरी उम्मीद है कि काउंसलिंग के जरिए उन्हें एक बहुत अच्छा सरकारी मेडिकल कॉलेज मिल जाएगा। अपनी इस ऐतिहासिक सफलता का पूरा श्रेय वह अपने माता-पिता के आशीर्वाद, बड़े भाई राज के अनगिनत बलिदानों, अपने गुरुजनों के सही मार्गदर्शन और ईश्वर की कृपा को देते हैं। आर्यन का सपना अब सिर्फ एक डिग्री लेना नहीं है, बल्कि एक काबिल डॉक्टर बनकर समाज और जरूरतमंद लोगों की निस्वार्थ सेवा करना है। कोटा के एक छोटे से कमरे से निकलकर यहां तक पहुंचने वाली आर्यन की यह कहानी हर उस इंसान को यह कड़ा संदेश देती है कि अगर आपके भीतर लक्ष्य को पाने की सच्ची आग है, तो कोई भी मुश्किल परिस्थिति या संकट आपके हौसले की उड़ान को नहीं रोक सकता।


















