इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब एक युवा पेशेवर अपनी करियर की नई शुरुआत करने का सपना देख रहा होता है, तब जीवन की एक अप्रत्याशित चुनौती सब कुछ बदल सकती है। पटना की शम्मी सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। कॉलेज की पढ़ाई खत्म करते ही उन्हें पैर में ट्यूमर का पता चला। लगातार इलाज और ऑपरेशनों के बावजूद बीमारी दोबारा लौट आई, जिसके चलते डॉक्टरों को उनकी जान बचाने के लिए पैर काटने का कठोर कदम उठाना पड़ा। इस भारी संकट के बाद भी उन्होंने अपने हौसले को टूटने नहीं दिया और कृत्रिम पैर के सहारे आज एक निजी स्कूल में सक्रिय शिक्षिका के रूप में नई मिसाल पेश कर रही हैं।
साल 2020 में सामने आया गंभीर ट्यूमर का संकट
शम्मी सिंह का जीवन उस वक्त पूरी तरह बदल गया जब साल 2020 में वैश्विक कोरोना महामारी के दौर में वह कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर घर लौटी थीं। उसी समय उनके पैर में एक गांठ या ट्यूमर का पता चला। परिजनों और डॉक्टरों ने तत्काल इलाज शुरू किया, लेकिन स्थिति में सुधार होने के बजाय ट्यूमर की स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई। बीमारी की गंभीरता को देखते हुए जनवरी 2021 में उनका पहला ऑपरेशन कराया गया। दुर्भाग्य से यह सर्जरी पूरी तरह सफल नहीं रही और कुछ समय बाद संक्रमण और गांठ का प्रभाव फिर से बढ़ने लगा।
साल 2022 में वही ट्यूमर दोबारा उसी जगह पर उभर आया। गहन चिकित्सकीय जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि यह ट्यूमर कैंसरयुक्त था। चूंकि यह बार-बार लौट रहा था और शरीर के अन्य हिस्सों में फैलने का गंभीर खतरा बना हुआ था, इसलिए डॉक्टरों ने आगे की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रभावित पैर को काटने का निर्णायक फैसला लिया। आखिरकार 2 जुलाई 2022 को शम्मी का वह पैर सर्जरी के जरिए शरीर से अलग कर दिया गया। एक होनहार इंजीनियर के लिए यह बेहद दर्दनाक मोड़ था, लेकिन उन्होंने खुद को एक एम्प्यूटी के तौर पर स्वीकार करते हुए नई जिंदगी के लिए मानसिक रूप से तैयार करना शुरू कर दिया।
रिकवरी का कठिन सफर और निशुल्क कृत्रिम अंग की मदद
सर्जरी के बाद का समय किसी भी व्यक्ति के लिए शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है। शम्मी ने अपने ऑपरेशन के बाद करीब एक पूरा साल रिकवरी और घाव भरने की प्रक्रिया में बिताया। यह एक ऐसा दौर था जब हताशा, अनिश्चितता और अवसाद सामने आकर खड़े हो गए थे, मगर उन्होंने कभी अपनी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। इसी कठिन समय में उन्हें एक ऐसी सामाजिक संस्था की जानकारी मिली, जो शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को दोबारा पैरों पर खड़ा करने के लिए आधुनिक चिकित्सा सेवाएं मुहैया कराती है।
शम्मी 17 अप्रैल 2023 को पहली बार पटना के आईएसबीटी के नजदीक संचालित भारत विकास एवं संजय आनंद विकलांग अस्पताल एवं रिसर्च सेंटर पहुंचीं। इस केंद्र पर दिव्यांगजनों को दी जाने वाली सुविधाओं के तहत उन्हें आधुनिक प्रोस्थेटिक पैर पूरी तरह निशुल्क प्रदान किया गया। इसके लिए उनसे एक भी रुपया नहीं लिया गया। शम्मी बताती हैं कि इस कृत्रिम पैर के मिलने से केवल उनके चलने-फिरने की शारीरिक क्षमता ही वापस नहीं आई, बल्कि उनका वर्षों पुराना आत्मविश्वास और आत्मनिर्भर बनने की ललक भी पूरी तरह लौट आई।
कक्षा में घंटों खड़े रहकर विज्ञान पढ़ाती हैं शम्मी
आज शम्मी सिंह केवल मुश्किलों से उबरने वाली एक आम महिला भर नहीं हैं, बल्कि समाज में प्रेरणा का बड़ा स्रोत बन चुकी हैं। वर्तमान में वह दिल्ली पब्लिक स्कूल में एक शिक्षिका के तौर पर अपनी सेवाएं दे रही हैं। स्कूल में वह रोजाना घंटों पैरों पर खड़े रहकर बच्चों को विज्ञान पढ़ाती हैं और इसके साथ ही क्लास टीचर की अहम जिम्मेदारी भी पूरी निष्ठा से निभाती हैं। वह स्कूल के पाठ्येतर कार्यक्रमों और विभिन्न गतिविधियों में पूरी तत्परता के साथ भाग लेती हैं।
शम्मी का कहना है कि आज वह अपने विद्यालय की सबसे सक्रिय टीचर्स में से एक हैं। उनका कृत्रिम पैर उनके दैनिक अध्यापन और जिम्मेदारियों के आड़े कभी नहीं आता। पहले वह अपने प्राकृतिक पैर के सहारे चलती थीं और अब कृत्रिम पैर का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन बच्चों को सिखाने और अपने कर्तव्यों को निभाने के जज्बे में कोई अंतर नहीं आया है। सहकर्मी और छात्र भी उनके इस समर्पण को देखकर प्रेरित होते हैं।
शिक्षिका की भूमिका के साथ सरकारी नौकरी का लक्ष्य
विद्यालय में नियमित अध्यापन के साथ-साथ शम्मी अपनी आगे की तरक्की के लिए सरकारी सेवा की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रही हैं। वह स्पष्ट करती हैं कि वर्तमान समय में एक शिक्षिका के रूप में उनकी आमदनी इतनी अधिक नहीं है कि वह प्रोस्थेटिक लेग से जुड़े महंगे रखरखाव और बदलावों का खर्च स्वयं वहन कर सकें। उच्च गुणवत्ता वाले कृत्रिम अंगों की मरम्मत और उपकरण काफी खर्चीले होते हैं, इसलिए उन्हें अस्पताल से मिलने वाला निरंतर सहयोग बहुत सहारा देता है।
वह बताती हैं कि जब भी प्रोस्थेटिक लेग में कोई तकनीकी दिक्कत आती है या मदद की जरूरत पड़ती है, तो वह संस्था के विवेक सर से सीधे संपर्क करती हैं। उन्हें हमेशा यह पक्का भरोसा रहता है कि उनकी समस्या का समाधान तुरंत किया जाएगा। संस्था का वातावरण हमेशा से बेहद सहयोगात्मक रहा है और वहां जरूरतमंदों को बिना किसी देरी के आवश्यक चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
दिव्यांगजनों के पुनर्वास में जुटा पटना का अस्पताल
भारत विकास एवं संजय आनंद विकलांग अस्पताल एवं रिसर्च सेंटर दिव्यांगों के कल्याण और उनके उपचार के लिए समर्पित एक प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र है। यह अस्पताल जन्मजात शारीरिक विकृतियों से लेकर हादसों या बीमारियों के कारण पैदा हुई शारीरिक कमियों को ठीक करने का कार्य करता है। संस्थान का व्यापक उद्देश्य पूरे समाज को दिव्यांगता की बेड़ियों से मुक्त कराकर जरूरतमंदों को आत्मनिर्भर बनाना है।
इस केंद्र पर मरीजों के लिए प्रारंभिक जांच, आधुनिक ऑपरेशन, निशुल्क कृत्रिम अंग निर्माण, फिजियोथेरेपी और न्यूरोथेरेपी जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं पूरी तरह मुफ्त दी जाती हैं। यह अस्पताल पटना में न्यू आईएसबीटी के पास मेट्रो पिलर नंबर 181 के समीप स्थित है। यहां परामर्श और उपचार प्राप्त करने के लिए बुधवार को छोड़कर सप्ताह के अन्य सभी दिनों में सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे के बीच संपर्क किया जा सकता है।



















