उत्तर प्रदेश की राजनीति में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर जुबानी जंग तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव जहां पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए के सामाजिक समीकरण के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की रणनीति बना रहे हैं, वहीं उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने इस फॉर्मूले पर सीधा हमला बोला है। राजभर ने समाजवादी पार्टी की ओर से घोषित किए गए राज्यसभा उम्मीदवारों के संदर्भ में पीडीए का एक अलग ही अर्थ बताते हुए दावा किया कि इसमें से वास्तविक सामाजिक वर्ग पूरी तरह नदारद हैं।
राज्यसभा उम्मीदवारी के जरिए नए अर्थ गढ़ने का दावा
सपा द्वारा राज्यसभा चुनाव के लिए धनराज नथवानी को प्रत्याशी बनाए जाने के कदम को ढाल बनाते हुए ओम प्रकाश राजभर ने कहा कि विपक्षी दल अपनी सुविधानुसार समय-समय पर अपने नारों की परिभाषा बदलता रहता है। राजभर के मुताबिक, इस बार के घटनाक्रम में पीडीए के तीन अक्षरों का मतलब परिवार, दौलतमंद और अपराधी बन चुका है। उन्होंने कहा कि पहले अक्षर 'पी' से परिवार का प्रतिनिधित्व प्रोफेसर रामगोपाल यादव के रूप में सामने आ गया है, जबकि दूसरे अक्षर 'डी' से धनीराम या दौलतमंद का स्थान धनराज नथवानी को उम्मीदवार बनाकर भर दिया गया है।
राजभर ने आगे कटाक्ष करते हुए कहा कि अब केवल तीसरा अक्षर 'ए' बाकी रह गया है। उनके अनुसार, अगर पार्टी अब किसी तीसरे उम्मीदवार के तौर पर किसी अपराधी को तलाश कर मैदान में उतार दे, तो उनका यह पूरा नया समीकरण औपचारिक रूप से मुकम्मल हो जाएगा। उन्होंने तंज भरे लहजे में कहा कि परिवार और धनकुबेर के नाम तय हो चुके हैं, लिहाजा अब बची हुई औपचारिक घोषणा भी जल्द कर दी जानी चाहिए।
दलित, पिछड़े और मुस्लिम नेताओं की चुप्पी पर सवाल
एसबीएसपी प्रमुख ने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी के मौजूदा राजनीतिक कदमों में मूल पीडीए वर्ग कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर पूछा कि इस पूरी प्रक्रिया में ब्राह्मण, पिछड़ा वर्ग, दलित और मुसलमान कहां छूट गए। राजभर का कहना था कि जमीनी स्तर पर जिन वर्गों के नाम पर राजनीति की जा रही है, वे फैसले लेने के मुख्य मंच से पूरी तरह गायब हैं।
इसी क्रम में उन्होंने समाजवादी पार्टी के मुस्लिम सांसदों और विधायकों की भूमिका पर भी तीखा प्रहार किया। राजभर ने कहा कि पार्टी के भीतर मौजूद अल्पसंख्यक जनप्रतिनिधियों में अखिलेश यादव से सीधे सवाल पूछने का साहस नहीं दिखता। उन्होंने जोर देकर कहा कि इन नेताओं को खुलकर यह बात रखनी चाहिए थी कि रामगोपाल यादव जैसे नेता उन्हीं के समर्थकों के वोट से सदन तक पहुंचते हैं और कार्यकर्ता ही विधायकों को जिताने का काम करते हैं। ऐसे में उच्च सदन में प्रतिनिधित्व पाना अल्पसंख्यक वर्ग का सीधा अधिकार बनता है, लेकिन शीर्ष नेतृत्व के सामने कोई भी आवाज उठाने को तैयार नहीं है।
कन्नौज उपचुनाव और निर्विरोध निर्वाचन का पुराना प्रसंग
अपने बयानों के दौरान ओम प्रकाश राजभर ने साल 2012 के चुनावी घटनाक्रम का भी उल्लेख किया। उन्होंने डिंपल यादव के निर्विरोध सांसद चुने जाने के दौर को याद करते हुए उस समय की चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाए। राजभर ने सवाल खड़ा किया कि कन्नौज लोकसभा सीट पर उपचुनाव के दौरान डिंपल यादव आखिरकार निर्विरोध कैसे जीत पाई थीं।
राजभर ने आरोप मढ़ते हुए कहा कि उस समय बाहुबलियों और माफिया तत्वों का सहारा लेकर नामांकन दाखिल करने वाले अन्य प्रत्याशियों को कथित तौर पर उठवा लिया गया था। उन्होंने दावा किया कि विरोधी उम्मीदवारों के पर्चे दबाव बनाकर जबरन वापस करवाए गए थे, जिसके बाद ही वह निर्विरोध निर्वाचन संभव हो सका था।
पंडितों और सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व की मांग
सपा की नीतियों को आड़े हाथों लेते हुए राजभर ने टिप्पणी की कि यह दल वास्तव में किसी भी वर्ग का हितैषी नहीं है, चाहे वह अल्पसंख्यक हों, पिछड़े हों, दलित हों या फिर सामान्य वर्ग के नागरिक हों। उन्होंने विशेष रूप से यह सवाल उठाया कि इस समीकरण में 'पी' से पंडित समाज का प्रतिनिधित्व कहां चला गया। राजभर ने कहा कि अगर पार्टी सामाजिक न्याय की बात करती है, तो कम से कम एक पंडित को भी राज्यसभा भेजने का फैसला लिया जाना चाहिए था। उन्होंने दोहराया कि पार्टी का मौजूदा आचरण उसके घोषित सामाजिक नारों के बिल्कुल विपरीत है।





















