घरेलू क्रिकेट में बेहतर मौकों की तलाश में अपने गृह राज्य को छोड़कर दूसरी टीम का रुख करना भारतीय क्रिकेट में एक पुरानी परंपरा रही है। खासतौर पर बिहार से निकलकर बंगाल की ओर रुख करने वाले खिलाड़ियों की फेहरिस्त काफी लंबी है, जिसके सबसे प्रमुख और ताजा उदाहरण तेज गेंदबाज मुकेश कुमार और आकाशदीप हैं। कुछ महीने पहले तक यह दोनों गेंदबाज राष्ट्रीय टीम के पेस अटैक में जसप्रीत बुमराह और मोहम्मद सिराज के साथ मिलकर विरोधी बल्लेबाजों पर दबाव बना रहे थे। चोटों के चलते दोनों खिलाड़ी मैदान से दूर हुए और अब राष्ट्रीय टीम के मुख्य चयनकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींचने की पुरजोर कोशिश में जुटे हैं।
श्रीनगर में चला दोनों तेज गेंदबाजों का जादू
ईरानी कप के मुकाबले में रेस्ट ऑफ इंडिया की तरफ से मैदान पर उतरते हुए इन दोनों तेज गेंदबाजों ने रणजी ट्रॉफी विजेता जम्मू एंड कश्मीर के बल्लेबाजों को टिकने का मौका नहीं दिया। श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में खेले गए इस मैच में घरेलू दर्शकों के सामने दोनों गेंदबाजों की स्विंग का विपक्षी बल्लेबाजों के पास कोई तोड़ नहीं था। आकाशदीप ने मुकाबले में 6 विकेट चटकाए, जबकि मुकेश कुमार ने दोनों पारियों को मिलाकर कुल 8 शिकार किए। यह शानदार प्रदर्शन केवल अपनी टीम को जीत दिलाने तक सीमित नहीं था, बल्कि न्यूजीलैंड के खिलाफ आगामी टेस्ट सीरीज के लिए चयनकर्ताओं और मुख्य कोच गौतम गंभीर को कड़ा संदेश भी था।
चोट से उबरने और वापसी की जद्दोजहद
मुकेश कुमार और आकाशदीप के लिए यह खिताबी मुकाबला केवल एक घरेलू ट्रॉफी जीतने से कहीं ज्यादा अहम था। मुकेश जुलाई 2024 के बाद से भारत की राष्ट्रीय टीम से बाहर चल रहे हैं और मैदान पर लगातार पसीना बहाकर चयनकर्ताओं के फैसले को गलत साबित करना चाहते हैं। दूसरी ओर, आकाशदीप कमर के निचले हिस्से में स्ट्रेस फ्रैक्चर की गंभीर समस्या से उबरने के बाद करीब आठ महीनों के लंबे अंतराल के बाद अपना पहला प्रतिस्पर्धी मैच खेल रहे थे। इस महत्वपूर्ण मुकाबले के दौरान दो राष्ट्रीय चयनकर्ता बाउंड्री के पास बैठकर दोनों गेंदबाजों की फिटनेस और लय पर पैनी नजर रख रहे थे।
सासाराम और गोपालगंज से बंगाल तक का संघर्ष
इन दोनों तेज गेंदबाजों की कहानी बेहद संघर्षपूर्ण रही है। बिहार के सासाराम के मूल निवासी आकाशदीप साल 2010 में अपने चाचा के साथ रहने के लिए पश्चिम बंगाल पहुंचे थे। कुछ वर्षों बाद बिहार के ही गोपालगंज जिले से ताल्लुक रखने वाले मुकेश कुमार भी कोलकाता आए, ताकि वह अपने पिता के टैक्सी के काम में हाथ बंटा सकें। शुरुआती दिनों में दोनों में से किसी के भी माता-पिता को उनके बेटे का क्रिकेटर बनने का सपना रास नहीं आ रहा था। तमाम सामाजिक और पारिवारिक चुनौतियों के बावजूद दोनों ने अपनी मेहनत के दम पर बंगाल की रणजी टीम में जगह पक्की की और आगे चलकर भारतीय टीम की जर्सी पहनने का गौरव हासिल किया। इन दोनों खिलाड़ियों की उपलब्धियों को मान्यता देते हुए कुछ महीने पहले बिहार सरकार ने उन्हें पुलिस विभाग में डीएसपी के पद पर नियुक्त किया था, जहां दोनों ने अपनी ड्यूटी भी संभाल ली है।
काउंटी अनुभव और टीम में जगह बनाने की कड़ी चुनौती
मुकेश कुमार मौजूदा समय में जबर्दस्त लय में नजर आ रहे हैं। दलीप ट्रॉफी में उन्होंने सर्वाधिक 12 विकेट अपने नाम किए थे और इसके साथ ही उन्होंने इंग्लैंड जाकर इंग्लिश काउंटी चैंपियनशिप में भी प्रभावी गेंदबाजी की थी। हालांकि, भारतीय टीम की तेज गेंदबाजी पंक्ति में जगह बनाना अब बिल्कुल आसान नहीं रह गया है। दोनों खिलाड़ियों की गैरमौजूदगी में लंबे कद के तेज गेंदबाज गुरनूर बराड़ की टीम में दस्तक हो चुकी है, जिन्हें शुभमन गिल का नजदीकी माना जाता है। इसके अलावा घरेलू क्रिकेट में आकिब नबी अपनी लगातार धारदार गेंदबाजी से सभी को प्रभावित कर रहे हैं, जबकि प्रसिद्ध कृष्णा और हर्षित राणा भी तेज गेंदबाजी के विकल्प के तौर पर बेहद मजबूत दावेदार हैं। अब देखना होगा कि नवंबर और दिसंबर में न्यूजीलैंड के खिलाफ शुरू होने वाली टेस्ट सीरीज में चयनकर्ता किन तेज गेंदबाजों पर भरोसा जताते हैं।



















