भारतीय खानपान की परंपरा में शुद्ध देसी घी का स्थान हमेशा से सर्वोपरि रहा है, चाहे दाल में तड़का लगाना हो, रोटियों पर चुपड़ना हो या फिर त्योहारों पर मिठाइयां तैयार करनी हों। हाल के वर्षों में खानपान के शौकीनों और सेहत के प्रति जागरूक लोगों के बीच बिलौना घी का चलन अचानक काफी बढ़ गया है। किराना दुकानों और ऑनलाइन मंचों पर अक्सर इसकी कीमत सामान्य घी की तुलना में कई गुना अधिक देखने को मिलती है। ऐसे में उपभोक्ताओं के मन में यह उत्सुकता पैदा होना स्वाभाविक है कि दोनों में बुनियादी फर्क क्या है, यह तकनीक इतनी विशेष क्यों मानी जाती है और क्या इसे पारंपरिक विधि के अनुसार अपनी रसोई में खुद तैयार किया जा सकता है। बिलौना घी की पूरी खासियत असल में इसकी निर्माण प्रक्रिया की उस लंबी यात्रा में छिपी है, जो दूध से शुरू होकर कई चरणों से गुजरती हुई शुद्ध सुनहरे घी तक पहुंचती है।
मलाई से सीधे निकलने वाले घी और बिलौना पद्धति में बुनियादी अंतर
शहरी और कस्बाई घरों में घी बनाने का जो सबसे आम तरीका प्रचलित है, वह है रोजाना गर्म किए गए दूध के ऊपर जमने वाली मलाई को एक बर्तन में हफ्ते या पंद्रह दिनों तक फ्रिज में जमा करते रहना। जब पर्याप्त मात्रा में मलाई इकट्ठी हो जाती है, तो कई लोग उसे सीधे कड़ाही में डालकर तेज आंच पर पका देते हैं, जबकि कुछ लोग उसे थोड़ा फेंटकर मक्खन अलग कर लेते हैं और फिर उसे आंच पर चढ़ाते हैं। इस आधुनिक या प्रचलित विधि में दूध को कभी खट्टा करके दही में तब्दील नहीं किया जाता।
दूसरी तरफ, बिलौना विधि में मलाई जमा करने की कोई गुंजाइश नहीं होती। इस पारंपरिक पद्धति में सबसे पहले पूरे के पूरे दूध को एक साथ उबाला जाता है और फिर जामन डालकर उसका संपूर्ण दही जमाया जाता है। इसके बाद उस पूरे दही को मथकर नवनीत यानी मक्खन निकाला जाता है। दोनों ही विधियों का अंतिम परिणाम भले ही दूध की वसा यानी फैट को अलग करना हो, लेकिन दूध से सीधे घी निकालने और पूरे दूध का दही बनाकर फिर मक्खन मथने की प्रक्रिया में जमीन-आसमान का अंतर है। दही के किण्वन और मथने की इस प्रक्रिया के कारण घी के स्वाद, उसकी सौंधी खुशबू और उसके दानेदार स्वरूप में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
लकड़ी की मथानी और बिलौना नाम के पीछे का इतिहास
प्राचीन काल में जब बिजली से चलने वाले आधुनिक ब्लेंडर, मिक्सर या फूड प्रोसेसर नहीं थे, तब ग्रामीण भारत में मिट्टी या पीतल की बड़ी हांडियों में दही को मथा जाता था। इस काम के लिए लकड़ी से बनी एक विशेष मथानी का उपयोग होता था, जिसके निचले हिस्से में चार या छह खांचे कटे होते थे। मथानी के डंडे पर रस्सी लपेटकर दोनों हाथों से बारी-बारी आगे-पीछे खींचा जाता था, जिससे मथानी दोनों दिशाओं में तेजी से घूमती थी।
देश के कई हिंदी भाषी इलाकों में दही मथने की इस पूरी कसरत को बिलोना या बिलौना कहा जाता है। जब दही को लगातार इस तरह मथा जाता है, तो उसमें मौजूद वसा के कण आपस में जुड़ने लगते हैं और हल्का मक्खन ऊपर की सतह पर तैरने लगता है। पारंपरिक रूप से मथानी की इसी प्रक्रिया से मक्खन निकालकर फिर उसे पकाकर जो घी तैयार किया जाता था, उसी पहचान के चलते इसे बिलौना घी का नाम दिया गया। आज व्यावसायिक स्तर पर कई डेयरियां बड़ी मशीनों से दही मथती हैं, मगर शुद्ध बिलौना की मूल पहचान इसी बात से तय होती है कि वह मलाई के बजाय पूरे दही को मथकर निकाले गए मक्खन से बना हो।
घर पर शुरुआत: दूध उबालने से लेकर सही जामन लगाने तक की विधि
यदि आप अपनी रसोई में प्रामाणिक तरीके से बिलौना घी तैयार करने का अनुभव लेना चाहते हैं, तो इसकी शुरुआत ताजे और अच्छी गुणवत्ता वाले दूध से करनी होगी। सबसे पहले आवश्यकतानुसार दूध लें और उसे किसी मोटे तले वाले गहरे बर्तन या कड़ाही में धीमी से मध्यम आंच पर रखें। दूध को अच्छी तरह उबलने दें ताकि उसमें मौजूद कच्चापन निकल जाए। एक बार जब दूध में अच्छा उबाल आ जाए, तो चूल्हा बंद कर दें और बर्तन को सामान्य तापमान पर ठंडा होने के लिए छोड़ दें।
दूध को पूरी तरह ठंडा नहीं करना है; जब वह छूने पर हल्का गुनगुना महसूस हो, तब उसमें थोड़ा सा पहले से तैयार सादा दही यानी जामन अच्छी तरह चम्मच से घोल दें। बर्तन को ढक्कन से अच्छी तरह ढककर किसी स्थिर और गर्म कोने में रख दें, ताकि दही बिना हिले-डुले जम सके। दही जमने में लगने वाला समय मौसम के मिजाज पर निर्भर करता है। तेज गर्मियों में दही पांच से छह घंटे में जम जाता है, जबकि कड़ाके की सर्दियों में तापमान कम होने की वजह से दही को ठीक से जमने में दस से बारह घंटे या उससे भी अधिक समय लग सकता है।
दही मथने और ताजा मक्खन अलग करने का पारंपरिक हुनर
जब बर्तन में गाढ़ा और चिकना दही पूरी तरह जमकर तैयार हो जाए, तब इसकी सबसे अहम प्रक्रिया शुरू होती है। अगर आपके पास पारंपरिक लकड़ी की मथानी है, तो यह सबसे बेहतर है, अन्यथा आप साधारण हाथ की रई का भी सहारा ले सकते हैं। दही को मथते समय मौसम के हिसाब से उसमें थोड़ा ठंडा पानी या बर्फ के टुकड़े मिलाए जाते हैं, ताकि मक्खन के कण जल्दी सख्त होकर अलग हो सकें।
लगातार एक गति से मथते रहने पर दही के अंदर मौजूद वसा अलग होने लगती है और सफेद, मलाईदार मक्खन सतह पर छोटे-छोटे गोलों के रूप में तैरने लगता है। जब सारा मक्खन अच्छी तरह ऊपर जमा हो जाए, तो साफ हाथों या एक बड़े चम्मच की मदद से उसे हल्के हाथों से दबाते हुए इकट्ठा कर लें और किसी दूसरे बर्तन में निकाल लें। मक्खन निकालने के बाद बर्तन में जो सफेद खट्टा तरल बच जाता है, वह शुद्ध देसी छाछ या मट्ठा है। इसे कभी बेकार समझकर फेंकना नहीं चाहिए, बल्कि इसमें भुना जीरा, काला नमक और पुदीना मिलाकर ताजा पिया जा सकता है या कढ़ी जैसी लजीज चीजें बनाने में काम में लिया जा सकता है।
धीमी आंच पर पकाना: मक्खन से सुनहरे घी बनने का सफर
दही से अलग किए गए ताजा मक्खन को अब एक साफ, भारी तले वाली कड़ाही में डालें। बर्तन का तला भारी होना जरूरी है ताकि पकाते समय वसा नीचे चिपककर जले नहीं। गैस की आंच को धीमा रखें और मक्खन को धीरे-धीरे पिघलने दें। जैसे-जैसे मक्खन गर्म होगा, वह पिघलकर तरल रूप ले लेगा और उसमें मौजूद नमी यानी पानी भाप बनकर उड़ने लगेगी।
कुछ ही मिनटों में कड़ाही में झाग उठने लगेगा और मक्खन में मौजूद दूध के ठोस अंश यानी मिल्क सॉलिड्स नीचे बैठने लगेंगे। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान आंच को कभी भी तेज न करें, क्योंकि तेज आंच पर नीचे जमा ठोस हिस्सा तुरंत जल जाता है, जिससे घी का रंग काला पड़ सकता है और उसमें एक तेज कड़वाहट आ सकती है। जैसे-जैसे पानी पूरी तरह सूखता है, बुलबुले शांत होने लगते हैं और कड़ाही में पारदर्शी, सुनहरे रंग का शुद्ध घी तैरता हुआ दिखाई देने लगता है। जब हल्की सौंधी महक उठने लगे और नीचे के कण हल्के भूरे हो जाएं, तो तुरंत चूल्हा बंद कर दें। इसे थोड़ा ठंडा होने दें, फिर किसी मलमल के बारीक कपड़े या महीन छलनी से छानकर पूरी तरह सूखे कांच या स्टील के मर्तबान में सुरक्षित भर लें।
कितने दूध से निकलेगा कितना घी? जानिए मात्रा का गणित
घर में बिलौना घी बनाने की इच्छा रखने वाले ज्यादातर लोगों के मन में यह सवाल जरूर रहता है कि आखिर एक किलोग्राम या एक लीटर शुद्ध घी पाने के लिए कितने लीटर दूध की जरूरत पड़ेगी। जानकारों के अनुसार, इसका कोई एक तय पैमाना या गणितीय फॉर्मूला कभी तय नहीं किया जा सकता। यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस पशु का दूध इस्तेमाल कर रहे हैं और उसमें वसा यानी फैट का प्रतिशत कितना है।
भैंस के दूध में प्राकृतिक रूप से वसा की मात्रा अधिक होती है, इसलिए उससे मक्खन और घी का अनुपात ज्यादा निकलता है, जबकि गाय के दूध में वसा का स्तर अपेक्षाकृत कम और हल्का होता है। इसके अलावा मौसम, चारे की गुणवत्ता और मक्खन मथते समय पानी के तापमान जैसी बारीकियों से भी अंतिम मात्रा पर असर पड़ता है। उच्च वसा वाले दूध से जहां कम मात्रा में ही भरपूर घी मिल जाता है, वहीं कम फैट वाले दूध से घी की मात्रा काफी कम निकलती है। इसलिए किसी भी निश्चित मात्रा को हर स्थिति के लिए सही मान लेना उचित नहीं होगा।
क्या सेहत के लिहाज से बिलौना घी सामान्य घी से वाकई बेहतर है?
बाजार में बिलौना घी को लेकर कई तरह के चमत्कारी और बड़े स्वास्थ्य दावे किए जाते हैं, जिन्हें देखकर आम लोग भ्रमित हो जाते हैं। चूंकि यह एक प्राचीन और प्राकृतिक विधि से तैयार किया जाता है, इसलिए बहुत से लोग इसके सौंधेपन और शुद्धता के कारण इसे प्राथमिकता देते हैं। हालांकि, केवल बिलौना विधि से बना होने के आधार पर इसे हर व्यक्ति के लिए सामान्य घी की तुलना में जादुई या असीमित रूप से स्वास्थ्यवर्धक मान लेना वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सही नहीं है।
मूल रूप से चाहे बिलौना घी हो या मलाई से निकाला गया सामान्य घी, दोनों ही वसा के मुख्य स्रोत हैं। इसलिए इसका सेवन व्यक्ति को अपनी दिनचर्या, शारीरिक मेहनत और दैनिक कैलोरी की जरूरत को देखकर ही करना चाहिए। जिन लोगों को हृदय रोग, उच्च कोलेस्ट्रॉल या मोटापे जैसी पहले से कोई चिकित्सकीय समस्या है, उन्हें घी की मात्रा और प्रकार का चयन करने से पहले हमेशा किसी योग्य डॉक्टर या आहार विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।
सुरक्षित भंडारण और लंबे समय तक ताजा रखने के जरूरी नियम
घर पर इतनी मेहनत से तैयार किए गए बिलौना घी को लंबे समय तक ताजा और सुगंधित बनाए रखने के लिए उसके रखरखाव पर विशेष ध्यान देना पड़ता है। घी को हमेशा पूरी तरह से साफ, सूखे और एयरटाइट कांच के जार या स्टेनलेस स्टील के डिब्बे में ही रखना चाहिए। डिब्बे में कभी भी नमी या पानी की एक बूंद भी नहीं जानी चाहिए, क्योंकि नमी लगते ही घी में फफूंद लगने या उसका स्वाद बिगड़ने का खतरा बढ़ जाता है।
इसके अलावा, घी निकालते समय हमेशा सूखे चम्मच का ही इस्तेमाल करें और गीले हाथों से जार को छूने से बचें। मर्तबान को सीधे धूप या चूल्हे की तेज गर्मी से दूर किसी ठंडी और सूखी जगह पर रखना चाहिए। सही तरीके से बंद करके रखा गया पारंपरिक घी बिना किसी प्रिजर्वेटिव के भी महीनों तक अपनी प्राकृतिक महक, दानेदार बनावट और बेहतरीन स्वाद को बरकरार रखता है।



















