अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में यूरो की कमजोरी लगातार बढ़ती जा रही है और ब्रिटिश पाउंड के मुकाबले इसमें तेज बिकवाली देखी जा रही है। प्रमुख तकनीकी स्तर 0.8500 से फिसलने के बाद यूरो-ब्रिटिश पाउंड जोड़ी में पिछले नौ कारोबारी सत्रों के दौरान लगभग 1.6 प्रतिशत की संचयी गिरावट दर्ज की जा चुकी है। लाइव बाजार आंकड़ों के अनुसार, इस मुद्रा जोड़ी की ताजा विनिमय दर 0.8453 पर पहुंच गई है, जो पिछले बंद स्तर 0.8485 के मुकाबले 0.38 प्रतिशत की गिरावट दर्शाती है। मंगलवार के सत्र में 0.8493 के स्तर पर बिकवाली का दबाव बनने के बाद अब बाजार सहभागियों की नजरें 15 जुलाई के निचले स्तर 0.8455 पर टिकी हुई हैं, जो पिछले 16 महीनों का सबसे निचला स्तर है।
भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों का सीधा असर
यूरोपीय मुद्रा में हालिया मजबूती बेहद अल्पकालिक साबित हुई है और इसके पीछे वैश्विक ऊर्जा बाजार में आया तेज बदलाव प्रमुख कारण रहा है। सऊदी अरब में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के ताजा हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल देखा गया है। इस घटनाक्रम के कारण बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के अहम मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया है। यूरोप अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर करता है, जिसके चलते तेल की यह तेजी सीधे तौर पर यूरोज़ोन की आर्थिक वृद्धि पर भारी दबाव डाल रही है। ऊर्जा लागत में आई इस अचानक वृद्धि के कारण जर्मनी के औद्योगिक उत्पादन के सकारात्मक आंकड़ों का प्रभाव भी पूरी तरह दब गया और बाजार ने इन आंकड़ों को लगभग नजरअंदाज कर दिया।
यूरोपीय सेंट्रल बैंक के सामने नीतिगत दुविधा
यूरोज़ोन में मुद्रास्फीति अपने तय लक्ष्य से लगभग दोगुने स्तर पर बनी हुई है। सामान्य परिस्थितियों में ऐसी स्थिति से निपटने के लिए केंद्रीय बैंक के पास ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने का सीधा रास्ता होता है। हालांकि, मौजूदा आर्थिक हालात बेहद जटिल हैं। बॉन्ड बाजार में प्रतिफल बढ़ने से पहले ही मौद्रिक सख्ती का असर दिखने लगा है, जिससे यूरोपीय सेंट्रल बैंक के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। एक तरफ जहां ऊर्जा कीमतों से महंगाई बढ़ने का जोखिम है, वहीं दूसरी तरफ आक्रामक ब्याज दर बढ़ोतरी से यूरोज़ोन की अर्थव्यवस्था के मंदी में फिसलने की आशंका गहरा रही है।
तकनीकी स्तर और आगे का दृष्टिकोण
चार्ट संरचना पर गौर करें तो यूरो-ब्रिटिश पाउंड जोड़ी लगातार दबाव में बनी हुई है। लाइव तकनीकी संकेतकों के आधार पर 14-दिवसीय आरएसआई 24 के स्तर पर पहुंच गया है, जो ओवरसोल्ड स्थिति का संकेत देता है। इसके अलावा 50-दिवसीय ईएमए 0.8563 पर और 200-दिवसीय ईएमए 0.8631 पर है, जिससे बना डेथ क्रॉस दीर्घकालिक गिरावट की पुष्टि करता है। वर्तमान में 20-दिवसीय बोलिंजर बैंड के निचले दायरे 0.8480 के नीचे कारोबार हो रहा है। यदि 15 जुलाई का निचला स्तर 0.8455 टूटता है, तो जून 2025 के शुरुआती दौर का निचला स्तर 0.8410 अगला प्रमुख लक्ष्य बन सकता है। इसके विपरीत, यदि मुद्रा जोड़ी 0.8500 के ऊपर स्थिरता हासिल करती है, तो बिकवाली का दबाव कम हो सकता है और भाव 2 अक्टूबर के उच्च स्तर 0.8527 तथा इसके बाद पूर्ववर्ती समर्थन स्तर 0.8550 की ओर बढ़ सकते हैं, जो अब मजबूत प्रतिरोध का काम कर रहा है। आज के सत्र में प्रमुख मुद्राओं के सापेक्ष यूरो में सबसे अधिक मजबूती न्यूजीलैंड डॉलर के खिलाफ देखी गई।
अन्य वैश्विक मुद्राओं और बाजारों का हाल
वैश्विक विदेशी मुद्रा और जिंस बाजार में भी व्यापक हलचल देखने को मिल रही है। एशियाई कारोबारी सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपनी हालिया रिकवरी को बरकरार रखने में नाकाम रहा और 0.7000 के नीचे दबाव में बना रहा। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी के कारण अमेरिकी डॉलर को समर्थन मिल रहा है, भले ही ऑस्ट्रेलियाई रिजर्व बैंक से सख्त नीतिगत कदमों की उम्मीद की जा रही हो। वहीं, डॉलर-येन जोड़ी 158.50 के करीब डेढ़ सप्ताह के उच्च स्तर पर कारोबार कर रही है, जहां बैंक ऑफ जापान के नरम रुख और अमेरिकी डॉलर की मजबूती से जोड़ी को बल मिला है।
सोने के बाजार में भी शुरुआती यूरोपीय सत्र के दौरान मंदी का रुख बना रहा और कीमतें पिछले दिन छुए गए दो महीने के निचले स्तर 4,100 डॉलर के करीब टिकी रहीं। निवेशक अमेरिकी फेडरल ओपन मार्केट कमेटी की बैठक के मिनट्स का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। क्रिप्टोकरेंसी बाजार में डॉगकॉइन 0.090 डॉलर के आसपास कारोबार करते हुए इस सप्ताह 5 प्रतिशत से अधिक टूट चुका है, जहां शॉर्ट पोजीशन एक महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं। भारतीय बाजार की बात करें तो भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति बैठक के बाद अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया काफी कमजोर हुआ। नीतिगत बैठक में रेपो दर को 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.5 प्रतिशत करने का निर्णय लिया गया, जो फरवरी 2023 के बाद पहली दर वृद्धि है। इसके बावजूद डॉलर-रुपया विनिमय दर उछलकर 96.72 के करीब पहुंच गई, जो पिछले चार महीनों का उच्चतम स्तर है।























