अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में बुधवार को ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की हालिया तेजी थम गई और इसमें कमजोरी दर्ज की गई। पिछले तीन कारोबारी सत्रों की लगातार बढ़त के बाद ऑस्ट्रेलियाई डॉलर एक सप्ताह के उच्चतम स्तर से फिसलकर दबाव में आ गया। अमेरिकी डॉलर की व्यापक मजबूती और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में आए नए उछाल ने प्रमुख करेंसी जोड़ियों पर दबाव बनाया है, जिसमें AUD/USD प्रमुख रूप से शामिल है। इसके अलावा कारोबारी अब अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति बैठक के विवरण यानी एफओएमसी मिनट्स के आधिकारिक प्रकाशन का इंतजार कर रहे हैं, जिससे भविष्य के ब्याज दर परिदृश्य को लेकर दिशा तय होगी।
बुधवार के कारोबारी सत्र के दौरान AUD/USD जोड़ी में बिकवाली का दबाव देखा गया। पिछले सप्ताह यह जोड़ी 0.6900 के स्तर के करीब पहुंची थी, जो इसका तीन महीने का निचला स्तर था। वहां से शुरू हुई तीन दिवसीय रिकवरी अब कमजोर पड़ती दिख रही है। यूरोपीय कारोबारी सत्र की शुरुआत में यह स्पॉट भाव 0.6970 से 0.6965 के दायरे में घूमता नजर आया, जबकि एशियाई सत्र में भी यह 0.7000 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे नकारात्मक रुख के साथ कारोबार कर रहा था। लाइव मार्केट डेटा के अनुसार, AUD/USD 0.6969 के आसपास बना हुआ है, जबकि इसका पिछला बंद भाव 0.6967 रहा था। तकनीकी रूप से इसका 14-दिवसीय आरएसआई 34 के स्तर पर है, जो मंदी के दबाव को दर्शाता है, जबकि 20-दिवसीय ईएमए 0.7035 और 50-दिवसीय ईएमए 0.7065 पर बना हुआ है।
फेडरल रिजर्व की नीतियां और बॉन्ड यील्ड का असर
अमेरिकी डॉलर की ताजा मांग के पीछे कई वैश्विक और घरेलू आर्थिक कारक काम कर रहे हैं। वैश्विक स्तर पर लगातार बने हुए भू-राजनीतिक जोखिमों ने निवेशकों को सुरक्षित निवेश की तलाश में ग्रीनबैक की ओर आकर्षित किया है। इसके साथ ही कच्चे तेल की कीमतें अपने एक महीने के निचले स्तर से ऊपर टिकी हुई हैं, जिससे ऊर्जा चालित महंगाई का डर फिर से गहराने लगा है। इस स्थिति ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड को कई वर्षों के उच्चतम स्तरों के करीब बनाए रखा है। बॉन्ड बाजार में बढ़ती प्रतिफल दर सीधे तौर पर डॉलर को मजबूती प्रदान करती है, जिससे ऑस्ट्रेलियाई डॉलर जैसी जोखिम से जुड़ी मुद्राओं पर बिकवाली हावी हो जाती है।
सीएमई ग्रुप के फेडवॉच टूल के आंकड़े बताते हैं कि बाजार अभी भी लगभग 85 प्रतिशत संभावना मानकर चल रहा है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक इस साल के अंत तक उधारी लागत में और बढ़ोतरी कर सकता है। हालांकि, मुद्रास्फीति के दबाव में नरमी और श्रम बाजार के ठंडा पड़ने के हालिया संकेतों ने अक्टूबर महीने में ब्याज दर बढ़ने की उम्मीदों को थोड़ा कमजोर किया था। निवेशक अब आगामी एफओएमसी मिनट्स में यह तलाशने की कोशिश करेंगे कि नीति निर्माता आने वाले महीनों को लेकर क्या रुख अपनाते हैं। मौद्रिक नीति का यह दृष्टिकोण डॉलर की निकट अवधि की दिशा को निर्धारित करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।
रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया और वैश्विक केंद्रीय बैंकों का रुख
ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पर दबाव का एक अन्य पहलू रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया यानी आरबीए से जुड़ी ब्याज दर अपेक्षाएं हैं। हालांकि बाजार में कुछ समय तक आरबीए के सख्त रुख की उम्मीदें थीं, लेकिन ब्याज दर में वृद्धि की घटती संभावनाओं ने मंदी के पक्षधरों को हावी होने का मौका दिया है। दूसरी ओर, अमेरिकी केंद्रीय बैंक अपने दो प्रमुख लक्ष्यों को पूरा करने के लिए नीतियों का संचालन करता है, जिनमें मूल्य स्थिरता हासिल करना और अधिकतम रोजगार को बढ़ावा देना शामिल है। इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में बदलाव को मुख्य हथियार के रूप में उपयोग में लाता है।
जब मुद्रास्फीति फेड के 2 प्रतिशत के लक्ष्य से अधिक हो जाती है, तो वह ब्याज दरों में वृद्धि करता है, जिससे अर्थव्यवस्था में उधारी महंगी हो जाती है। इससे अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय निवेशक अधिक रिटर्न पाने के लिए अमेरिका में पूंजी निवेश करना पसंद करते हैं। इसके विपरीत, जब महंगाई 2 प्रतिशत से नीचे गिरती है या बेरोजगारी दर बहुत बढ़ जाती है, तो फेड उधारी को बढ़ावा देने के लिए ब्याज दरों में कटौती करता है, जिससे डॉलर कमजोर पड़ता है। फेडरल रिजर्व साल में आठ बार नीतिगत बैठकें आयोजित करता है, जिसमें बारह अधिकारी शामिल होते हैं। इनमें बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सात सदस्य, न्यूयॉर्क के फेडरल रिजर्व बैंक के अध्यक्ष और शेष ग्यारह क्षेत्रीय रिजर्व बैंकों में से चार अध्यक्ष शामिल होते हैं जो रोटेशन के आधार पर एक वर्ष का कार्यकाल पूरा करते हैं। संकट की स्थिति में फेड क्वांटिटेटिव ईजिंग यानी क्यूई का सहारा लेता है, जिसमें नए डॉलर छापकर वित्तीय संस्थानों से उच्च श्रेणी के बॉन्ड खरीदे जाते हैं, जिससे डॉलर कमजोर होता है। वहीं क्वांटिटेटिव टाइटनिंग यानी क्यूटी के तहत बॉन्ड खरीद बंद की जाती है, जो डॉलर को मजबूती देता है।
वैश्विक फॉरेक्स और कमोडिटी बाजारों की स्थिति
अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने का असर केवल ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य प्रमुख मुद्राओं और संपत्तियों में भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है। जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर यानी USD/JPY जोड़ी बुधवार को एशियाई सत्र में 158.50 के स्तर के पास कारोबार करती रही, जो इसका लगभग डेढ़ सप्ताह का उच्च स्तर है। बैंक ऑफ जापान की नरम टिप्पणियों और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल ने डॉलर को येन के मुकाबले समर्थन दिया है, जहां कारोबारी अब 200-दिवसीय एसएमए के स्तर को पार करने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
कमोडिटी बाजार में सोने की कीमतों पर भी दबाव बना हुआ है। यूरोपीय सत्र में सोना नकारात्मक रुख के साथ कारोबार करता दिखा और यह पिछले दिन छुए गए 4,100 डॉलर के दो महीने के निचले स्तर के करीब नजर आया। डॉलर की ताजा खरीद ने सोने की कीमतों पर वजन डाला है। दूसरी तरफ, क्रिप्टोकरेंसी बाजार में डॉगकॉइन में गिरावट जारी रही और यह 0.090 डॉलर के आसपास ट्रेड कर रहा था, जिसमें सप्ताह के दौरान 5 प्रतिशत से अधिक की कमजोरी आई है। शॉर्ट पोजीशन एक महीने के उच्च स्तर पर पहुंचने से डॉगकॉइन पर मंदी का दबाव बढ़ गया है।
भारतीय रिजर्व बैंक का फैसला और रुपये पर प्रभाव
मुद्रा बाजार के अन्य प्रमुख घटनाक्रमों में भारतीय रुपये में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारी कमजोरी देखने को मिली। भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति बैठक के बाद रुपये की प्रतिक्रिया कमजोर रही और USD/INR जोड़ी उछलकर लगभग 96.72 के स्तर तक पहुंच गई, जो पिछले चार महीनों का उच्चतम स्तर है। नीतिगत बैठक में रिजर्व बैंक ने अपनी रेपो दर को 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.5 प्रतिशत करने का निर्णय लिया, जो फरवरी 2023 के बाद से पहली दर वृद्धि है। इसके बावजूद डॉलर के मजबूत वैश्विक प्रवाह के कारण रुपये को दबाव का सामना करना पड़ा।
यूरोपीय मोर्चे पर भी चुनौतियां कम नहीं हैं। यूरोपीय सेंट्रल बैंक आमतौर पर लक्ष्य से लगभग दोगुनी चल रही मुद्रास्फीति से निपटने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी का रास्ता अपनाता है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियां सामान्य नहीं हैं, क्योंकि बॉन्ड बाजार पहले ही आंशिक रूप से वित्तीय सख्ती कर रहा है। इसके चलते यूरोपीय सेंट्रल बैंक के सामने नीतिगत स्तर पर एक गंभीर दुविधा की स्थिति पैदा हो गई है। आगामी कारोबारी सत्रों में वैश्विक करेंसी जोड़ियों की चाल पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व के मिनट्स से क्या संकेत बाहर आते हैं।






















