देश की शीर्ष अदालत ने हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान पैदा हुए तनाव के बीच युवाओं के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने का संदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट में छात्र प्रदर्शन की आड़ में अनुचित व्यवहार करने वाले युवाओं के लिए सात दिनों की कम्युनिटी सर्विस और आयोजकों की जवाबदेही तय करने की मांग वाली याचिका पर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने स्पष्ट किया कि भटके हुए युवाओं पर बल प्रयोग करने के स्थान पर उनसे संवाद स्थापित करना और उनकी शिकायतों को सुनना अधिक प्रभावी कदम साबित होगा।
पुलिस और प्रशासन को कोर्ट का संयम बरतने का निर्देश
सुनवाई के दौरान अदालत ने कानून और व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियों को अत्यंत संवेदनशीलता और धैर्य के साथ काम करने की सलाह दी। चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की कि यदि सरकार या पुलिस प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक कठोर अथवा आक्रामक रुख अपनाती है, तो इससे समाज में असंतोष और तनाव और अधिक गहरा सकता है। अदालत के अनुसार, प्राथमिक उद्देश्य हमेशा शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को बढ़ावा देना होना चाहिए। यदि किसी स्थान पर दुर्भाग्यवश पथराव या हिंसा की कोई अप्रिय घटना घटती भी है, तो पुलिस बल को संयम और सावधानी का परिचय देना चाहिए ताकि परिस्थितियां पूरी तरह नियंत्रण से बाहर न जाएं।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने रेखांकित किया कि सुरक्षा एजेंसियां और पुलिस अधिकारी जमीनी स्तर पर ऐसी जटिल परिस्थितियों से निपटने का लंबा अनुभव रखते हैं। वे किसी भी अन्य संस्था की तुलना में बेहतर जानते हैं कि मौके पर स्थिति को किस तरह नियंत्रित किया जाना चाहिए। इसके बावजूद, राज्य व्यवस्था की ओर से उठाया गया हर कदम संतुलित होना चाहिए। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि प्रदर्शन कर रहे युवाओं की नाराजगी के पीछे के वास्तविक कारणों को समझना आवश्यक है कि आखिर वे सड़कों पर उतरकर नारे लगाने के लिए क्यों विवश हुए।
याचिकाकर्ता के वकील ने उठाए आयोजकों की जवाबदेही पर सवाल
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता मनीष कुमार सोलंकी का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता रिज़वान अहमद ने अदालत के सामने तीखी बहस प्रस्तुत की। उन्होंने दलील दी कि घटना को पंद्रह दिन का समय बीत जाने के बाद भी प्रदर्शन का आयोजन करने वाले प्रमुख चेहरों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। वकील का आरोप था कि आयोजक विभिन्न मीडिया चैनलों पर जाकर लगातार भड़काऊ भाषण दे रहे हैं और उत्पन्न हुए तनाव को शांत करने के बजाय माहौल को और बिगाड़ रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसे आयोजकों की कानून के प्रति जवाबदेही कब और कैसे तय की जाएगी।
अधिवक्ता ने तर्क दिया कि सरकारों को प्रदर्शनकारियों के दबाव में आकर अपनी सीमाओं से बाहर जाकर झुकने की परिपाटी से बचना चाहिए। उन्होंने मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए बताया कि इस पूरे घटनाक्रम में एक युवा की जान जा चुकी है। यदि केंद्र या राज्य सरकारें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में होने वाले हिंसक प्रदर्शनों के आगे अत्यधिक नरमी दिखाती हैं, तो इसका गलत प्रभाव देश के अन्य हिस्सों पर पड़ेगा। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि राजस्थान में भी छात्र सरकार पर अपनी अनुचित मांगें मानने के लिए दबाव बनाने लगेंगे।
गलत नजीर बनने और सुरक्षा में चूक की चेतावनी
वकील रिज़वान अहमद ने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कल लखनऊ के किसी डिग्री कॉलेज के छात्र अपनी मांगों को लेकर बसों पर पथराव करने लगें, तो क्या वहां की सरकार भी उनके आगे झुक जाएगी? उन्होंने कहा कि हिंसा और पथराव में शामिल व्यक्तियों को महज इसलिए बिना सजा दिए नहीं छोड़ देना चाहिए क्योंकि सरकार उस समय किसी असहज या दबाव वाली स्थिति में थी। यदि ऐसा किया गया तो कानून व्यवस्था के लिए एक अत्यंत खतरनाक मिसाल कायम हो जाएगी।
अदालत में अतीत की घटनाओं की याद दिलाते हुए वकील ने कहा कि तीन साल पहले किसान सिंघु बॉर्डर पर जमा हुए थे और यदि इसी प्रकार ढील दी गई तो भविष्य में जेनरेशन अल्फा, बीटा और डेल्टा जैसी नई पीढ़ियां भी सड़कों पर कब्जा कर लेंगी। उन्होंने संसद भवन के प्रति अपनी चिंता जताते हुए उसे लोकतंत्र का पवित्र मंदिर करार दिया। उन्होंने सवाल किया कि यदि लगभग 500 लोग संसद परिसर के निकट या भीतर तक पहुंचने में कामयाब हो जाते हैं, तो इस बात की क्या गारंटी है कि उनके पास अवैध हथियार या देसी बंदूकें नहीं थीं?
याचिकाकर्ता के वकील ने जोर देकर कहा कि प्रदर्शनकारी किसी राष्ट्रीय राजमार्ग या रेलवे लाइन पर सामान्य मार्च नहीं निकाल रहे थे, बल्कि वे देश के सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थान की ओर बढ़ रहे थे। यदि उस दौरान कोई अनहोनी होती या गोलीबारी की नौबत आती तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होती? इसलिए ऐसे मामलों में शामिल प्रत्येक व्यक्ति की जवाबदेही तय होना अनिवार्य है। इस पर अदालत ने पुन: दोहराया कि मुख्य प्राथमिकता शांतिपूर्ण विरोध को बढ़ावा देना है और किसी भी अप्रिय घटना की स्थिति में पुलिस प्रशासन को संयम बनाए रखना होगा।



















