बिहार के जहानाबाद के किसान अंजनी सिन्हा ने कटहल की खेती से कमाई का ऐसा तरीका निकाला है, जिसमें फसल सिर्फ सर्दियों में बाजार में उतरती है और भाव 150 रुपए किलो तक पहुंच जाता है. पटना जिले के पुनपुन प्रखंड में डेढ़ एकड़ जमीन पर अलग-अलग फल उगाने वाले अंजनी ने अपने खेत में 60 पेड़ कटहल के भी लगाए थे. इनमें से 55 पेड़ आज भी सुरक्षित खड़े हैं और लगातार फल दे रहे हैं.
परंपरागत खेती से अलग रास्ता
धान और गेहूं की खेती में साल-दर-साल मेहनत और खर्च दोनों ज्यादा लगते हैं, जबकि मुनाफा अक्सर सीमित ही रहता है. यही देखकर बिहार के कई किसान अब ऐसी फसलों की तरफ बढ़ रहे हैं, जिनमें खेत पर कम समय देना पड़े और मेहनत के मुकाबले रिटर्न बेहतर मिले. अंजनी सिन्हा ने भी कटहल का पेड़ लगाते वक्त यही सोच अपनाई. उनका कहना है कि उनके इलाके में कटहल की खेती बहुत कम देखने को मिलती है, जबकि एक बार पेड़ जम जाने के बाद यह बेहद मुनाफे वाली फसल साबित होती है. धान-गेहूं की तरह इसमें बार-बार खाद डालने, लगातार पानी देने और बार-बार निकाई-कोड़ाई करने की जरूरत नहीं पड़ती. शुरुआती सालों में ही थोड़ी देखभाल जरूरी होती है, उसके बाद मेहनत और लागत दोनों काफी घट जाते हैं, जो अंजनी की जरूरत के हिसाब से बिल्कुल सही बैठा.
वियतनामी अर्ली सुपर किस्म, स्वाद में लाजवाब
अंजनी के खेत में बचे सभी 55 कटहल के पेड़ करीब डेढ़ साल पुराने हैं और इनसे एक बार फलन भी मिल चुका है. यह पेड़ वियतनामी अर्ली सुपर किस्म के हैं, जो अपने लाजवाब स्वाद के लिए जाने जाते हैं. इस किस्म के कटहल का इस्तेमाल पका खाने के बजाय ज्यादातर सब्जी बनाने में किया जाता है. इस तरह के कटहल के पेड़ों में आमतौर पर साल में दो बार फलन होता है, एक बार गर्मी में और एक बार सर्दी में, जिससे किसान के पास फसल बेचने का समय चुनने की गुंजाइश रहती है.
गर्मी की जगह सर्दी की फसल क्यों चुनी
अंजनी सिन्हा जानबूझकर गर्मी वाली फसल को छोड़ देते हैं. उनका तर्क सीधा है, गर्मी में बाजार में कटहल की भरमार रहने से सही कीमत नहीं मिल पाती, जबकि सर्दियों में एक किलो कटहल का भाव 150 रुपए तक पहुंच जाता है. यही अंतर वजह है कि वे साल में सिर्फ एक बार, सर्दी के मौसम में फसल लेना पसंद करते हैं. इससे कुल उपज भले ही कम हो जाए, क्योंकि एक पूरा फलन चक्र छोड़ दिया जाता है, लेकिन ज्यादा कीमत मिलने से आमदनी पहले से बेहतर हो जाती है.
पांच साल से खेती में जुटे, अमरूद-केले की भी बुआई
अंजनी सिन्हा पिछले 5 साल से कृषि कार्य से जुड़े हुए हैं. कटहल के अलावा वे सीजन के हिसाब से अलग-अलग फल और सब्जियां भी उगाते हैं, जिनमें अमरूद और केला शामिल हैं, ताकि पूरी कमाई सिर्फ एक ही फसल पर निर्भर न रहे. उनका कहना है कि उन्होंने जो किस्में लगाई हैं, वे अच्छी प्रजाति की मानी जाती हैं और इनसे किसानों को ठीक-ठाक आमदनी मिलने की पूरी गुंजाइश रहती है.
अभी शुरुआत, आने वाले समय में बेहतर कमाई की उम्मीद
अंजनी सिन्हा के मुताबिक, परंपरागत खेती से हटकर कम समय में बेहतर आमदनी हासिल करने की सोच के साथ ही उन्होंने यह खेती शुरू की थी. चूंकि बागान अभी शुरुआती दौर में ही है, इसलिए फिलहाल हिसाब-किताब में मुनाफा उतना नजर नहीं आता, लेकिन पेड़ों के और परिपक्व होने के साथ आने वाले सालों में बेहतर कमाई मिलने की उम्मीद जताई जा रही है.




















