नोएडा में जनसुविधाओं को बेहतर बनाने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये की लागत से कई बड़ी विकास परियोजनाएं शुरू की गई थीं। हालांकि, बुनियादी स्तर पर उचित योजना की कमी, लापरवाही और घटिया निर्माण के चलते ये महत्वाकांक्षी योजनाएं अब सरकारी धन की बर्बादी की मिसाल बन चुकी हैं। शहर के बुनियादी ढांचे को मजबूती देने के लिए तैयार किए गए खेल परिसर, परिवहन केंद्र और पैदल यात्रियों के रास्ते आज धूल फांक रहे हैं। भारी वित्तीय संसाधनों के आवंटन के बावजूद ये आठ बड़े प्रोजेक्ट्स आम नागरिकों और खिलाड़ियों को कोई वास्तविक लाभ नहीं पहुंचा पा रहे हैं।
स्टेडियम और एथलेटिक्स ट्रैक का अधूरा सपना
नोएडा के सेक्टर-21ए में स्थित नोएडा क्रिकेट स्टेडियम के जीर्णोद्धार और अपग्रेडेशन पर प्रशासनिक स्तर पर लगभग 350 करोड़ रुपये का भारी खर्च किया जा चुका है। इतने विशाल बजट के बावजूद यह स्टेडियम अंतरराष्ट्रीय स्तर के क्रिकेट मुकाबलों की मेजबानी की दौड़ से काफी बाहर नजर आता है। खेल परिसर के भीतर दर्शकों के बैठने के लिए कुर्सियां और रात के मुकाबलों के लिए बेहद जरूरी फ्लड लाइट जैसी प्राथमिक सुविधाएं अब तक अधूरी हैं। बुनियादी ढांचा पूरा न होने के कारण यह स्टेडियम भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतरता है। वर्षों से जारी निर्माण कार्यों के बाद भी यहां कोई बड़ा राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट आयोजित नहीं हो सका, जिससे करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों को निराशा ही हाथ लगी है।
इसी सेक्टर-21ए परिसर में एथलीटों के लिए करीब 2.9 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से 300 मीटर लंबा सिंथेटिक एथलेटिक्स ट्रैक तैयार किया गया था। हालांकि, यह ट्रैक खिलाड़ियों की जरूरतों को पूरा करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। मानक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं के संचालन के लिए 400 मीटर लंबे ट्रैक की अनिवार्यता होती है, लेकिन यहां महज 300 मीटर का निर्माण कर दिया गया। इस योजनागत खामी के कारण यहां किसी भी आधिकारिक एथलेटिक्स स्पर्धा का आयोजन संभव ही नहीं है। इस तरह के त्रुटिपूर्ण निर्माण को देखकर अभ्यास करने वाले एथलीटों ने इसे तंज कसते हुए दुनिया का आठवां अजूबा करार दिया है। भारी धनराशि खर्च करने के बाद भी यह ट्रैक धावकों के किसी उपयोग में नहीं आ सका।
बस टर्मिनल और स्काईवॉक की जमीनी विफलता
सार्वजनिक परिवहन को सुचारू बनाने के लिए सेक्टर-82 में लगभग 158 करोड़ रुपये का भारी बजट लगाकर आठ मंजिला आधुनिक सिटी बस टर्मिनल का निर्माण कराया गया था। इस बहुमंजिला विशाल इमारत में 40 बसों, 100 टैक्सियों और 522 कारों की एक साथ पार्किंग की विशाल क्षमता विकसित की गई। भव्य उद्घाटन समारोह के बाद भी इस टर्मिनल का नियमित संचालन आज तक शुरू नहीं हो सका है। वर्तमान स्थिति यह है कि इस बहुमंजिला परिसर से बसें और यात्री दोनों ही पूरी तरह नदारद हैं। आधुनिक सुविधाओं से लैस होने के बावजूद यह ढांचा शहर की यातायात व्यवस्था में कोई योगदान नहीं दे पा रहा है और अपनी लागत वसूलने में विफल रहा है।
पैदल यात्रियों की सुविधा के लिए सेक्टर-51 और सेक्टर-52 मेट्रो स्टेशनों के बीच बनाया गया स्काईवॉक त्रुटिपूर्ण इंजीनियरिंग का प्रत्यक्ष उदाहरण बन चुका है। शुरुआती दौर में इस कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट का बजट कुछ करोड़ रुपये तय किया गया था, लेकिन बार-बार डिजाइन में बदलाव और निर्माण संबंधी अड़चनों के कारण इसकी अंतिम लागत बढ़कर 42 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गई। प्रोजेक्ट की त्रासदी यह रही कि निर्माण के अंतिम चरण और उद्घाटन से ठीक पहले मेट्रो स्टेशन का बीम और पक्की दीवार रास्ते में आ गए। इस अक्षम्य योजनागत भूल से स्काईवॉक का रास्ता पूरी तरह बंद हो गया और पूरी परियोजना विफल हो गई। परिणामस्वरूप, दोनों मेट्रो स्टेशनों के बीच आवाजाही करने वाले यात्रियों को आज भी ढाई से तीन मीटर चौड़े संकरे फुटपाथ पर गाड़ियों के बीच जान जोखिम में डालकर चलना पड़ रहा है।
जानलेवा अंडरपास और इंडोर स्टेडियम में सुरक्षा की अनदेखी
सेक्टर-51 और सेक्टर-71 के व्यस्त चौराहे को जोड़ने के लिए लगभग 780 मीटर लंबा छह लेन का अंडरपास निर्मित किया गया था। जून 2019 में शुरू हुई इस परियोजना की प्रारंभिक अनुमानित लागत 52.58 करोड़ रुपये रखी गई थी, जो निर्माण में देरी के साथ बढ़कर 59.35 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। तय समयसीमा से पिछड़ने के बाद आखिरकार नवंबर 2021 में इसे यातायात के लिए खोला गया। हालांकि, घटिया निर्माण गुणवत्ता के कारण स्थानीय निवासी अब इसे मौत का अंडरपास कहने लगे हैं। अंडरपास की दोनों लेन की सड़कें इतनी अधिक ऊबड़-खाबड़ और असंतुलित हैं कि यदि कोई वाहन चालक 20 से 30 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की रफ्तार से गाड़ी चलाता है, तो वाहन का संतुलन बिगड़ने से गंभीर सड़क दुर्घटना होने की आशंका लगातार बनी रहती है।
इसके अलावा, सेक्टर-21ए में ही करीब 100 करोड़ रुपये की विशाल धनराशि से निर्मित नोएडा इंडोर स्टेडियम प्रशासनिक उपेक्षा और सुरक्षा मानकों की अनदेखी के संकट से जूझ रहा है। मुख्य अग्निशमन अधिकारी की टीम द्वारा किए गए हालिया निरीक्षण में यह सनसनीखेज तथ्य सामने आया कि इस विशाल स्टेडियम के पास वैध फायर अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) तक उपलब्ध नहीं है। जांच के दौरान परिसर में लगे कई अग्निशामक सुरक्षा उपकरण पूरी तरह अक्रियाशील पाए गए। जिस खेल परिसर में हर दिन सैकड़ों की संख्या में युवा और बच्चे खेल गतिविधियों के लिए आते हैं, वहां इतने बड़े वित्तीय निवेश के बावजूद सुरक्षा के न्यूनतम मानकों की ऐसी अनदेखी एक बड़े खतरे को आमंत्रण दे रही है।
खुले जिम और ई-साइकिल योजना की बदहाली
शहरी और ग्रामीण आबादी को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के उद्देश्य से नोएडा प्राधिकरण ने करीब 15 करोड़ रुपये खर्च करके विभिन्न सेक्टरों और 15 शुरुआती गांवों में 66 ओपन जिम स्थापित किए थे। इस पहल का मकसद आम नागरिकों को कसरत के लिए प्रेरित करना था, लेकिन देखरेख के अभाव में यह योजना पूरी तरह बदहाल हो चुकी है। अधिकांश स्थानों पर जिम के लोहे के उपकरण या तो टूट चुके हैं या चोरी हो चुके हैं। कई ग्रामीण इलाकों में स्थिति यह है कि स्थानीय निवासी इन कसरत उपकरणों का उपयोग व्यायाम करने के बजाय अपने गीले कपड़े सुखाने के लिए कर रहे हैं। नियमित रख-रखाव न होने से करोड़ों की यह महत्वाकांक्षी योजना अब धीरे-धीरे अपना वजूद खो चुकी है।
पर्यावरण के अनुकूल परिवहन को बढ़ावा देने के लिए शहर भर में 62 डॉकिंग स्टेशनों के साथ ई-साइकिल परियोजना की शुरुआत की गई थी। पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल पर आधारित इस प्रोजेक्ट पर प्राधिकरण और निजी कंपनियों ने मिलकर लगभग 1.5 से 2 करोड़ रुपये का निवेश किया था। योजना के तहत आधारभूत सुविधाएं प्राधिकरण ने दीं, जबकि चक्र संचालन और मरम्मत की जिम्मेदारी निजी एजेंसियों की थी। हालांकि, पर्याप्त यात्रियों की कमी, तकनीकी समस्याओं और कम राजस्व संग्रह के चलते यह मॉडल पूरी तरह फ्लॉप हो गया। वर्तमान में शहर के सभी 62 ई-साइकिल डॉकिंग स्टेशन बंद पड़े हैं और वहां खड़ी साइकिलें सड़ रही हैं।



















