आज के दौर में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र अक्सर अभिभावकों की अपेक्षाओं और असफलता के डर के भारी बोझ तले दबे रहते हैं। कोटा से लेकर देश के तमाम बड़े शिक्षण केंद्रों तक में प्रवेश परीक्षाओं का तनाव युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल रहा है। इसी माहौल के बीच आईआईटी पासआउट आकाश संपूर्णानंद पांडे की एक सोशल मीडिया पोस्ट तेजी से ध्यान आकर्षित कर रही है। आकाश ने अपनी इस सफलता का श्रेय किसी महंगे कोचिंग संस्थान या विशेष मार्गदर्शन को देने के बजाय वर्ष 1980 में अपने पिता की आईआईटी जेईई परीक्षा में हुई असफलता को दिया है। उनकी यह कहानी न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि आज के माता-पिता और विद्यार्थियों के लिए एक आंख खोलने वाली सीख भी पेश करती है।
10 रुपये की जेब खर्च और 200 किलोमीटर का सफर
आकाश संपूर्णानंद पांडे ने अपने पिता के संघर्ष और उस दौर की परिस्थितियों को याद करते हुए बताया कि वर्ष 1980 की गर्मियों में उनके पिता अपने गांव के सबसे बुद्धिमान छात्र माने जाते थे। हालांकि उस समय ग्रामीण इलाकों में सूचनाओं का अभाव रहता था। उनके पिता को प्रवेश परीक्षा से केवल 6 महीने पहले ही यह जानकारी मिली थी कि आईआईटी में दाखिले के लिए जेईई नाम की कोई कठिन परीक्षा भी होती है। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने परीक्षा देने का फैसला किया। उस समय उनकी जेब में केवल 10 रुपये थे। उन्होंने बसों और गाड़ियों से लिफ्ट लेते हुए 200 किलोमीटर दूर स्थित परीक्षा केंद्र तक का लंबा सफर तय किया। किसी भी पूर्व तैयारी या कोचिंग के बिना वे परीक्षा भवन में बैठे। कठिन प्रश्नों के कारण वे उस दिन एक भी सवाल हल नहीं कर पाए और परीक्षा में पूरी तरह असफल हो गए। लेकिन इस बड़ी नाकामी के बावजूद उनके मन में कभी कोई कड़वाहट या मलाल पैदा नहीं हुआ।
बिना दबाव के परवरिश और अनोखी मानसिक आजादी
अपने पिता की सोच और व्यवहार के बारे में बताते हुए आकाश ने उल्लेख किया कि उनके पिता के मन में अपनी असफलता को लेकर न तो गुस्सा था और न ही कोई निराशा। वे बचपन से ही अपने बेटे के सामने आईआईटी से स्नातक करने वाले लोगों का जिक्र बेहद सम्मान और प्रशंसा के साथ करते थे। इसके बावजूद उन्होंने कभी अपने बेटे पर यह दबाव नहीं डाला कि उसे भी वही राह चुननी है या आईआईटी में ही दाखिला लेना है। जब भी पढ़ाई की बात होती, उनके पिता मुस्कुराकर यही कहते थे कि जिस परीक्षा में वे खुद असफल रह चुके हैं, उसके लिए वे अपने बच्चे पर दबाव कैसे बना सकते हैं। पिता के इस सकारात्मक दृष्टिकोण ने आकाश को एक अनोखी मानसिक स्वतंत्रता दी। आकाश का मानना है कि उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं था। यदि वे असफल होते तो अपने पिता की तरह एक सामान्य और खुशहाल जिंदगी बिताते, लेकिन यदि वे पास हो जाते तो अपने पूरे परिवार के इतिहास में पहले आईआईटी स्नातक बन जाते। इसी बेफिक्री ने उनके भीतर बिना किसी डर के मेहनत करने का जुनून पैदा कर दिया।
वर्ष 2012 में पहले प्रयास में सफलता और पिता का जश्न
बिना किसी मानसिक तनाव और असफलता के भय से मुक्त होकर तैयारी करने का शानदार परिणाम वर्ष 2012 में सामने आया। आकाश संपूर्णानंद पांडे ने अपने पहले ही प्रयास में देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली आईआईटी जेईई परीक्षा को क्रैक कर लिया। परिणाम घोषित होते ही उनके पिता की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा और वे खुशी से झूम उठे। आकाश आज भी जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि यदि उनके पिता 1980 में ही परीक्षा पास कर लेते, तो शायद उनके अपने बचपन का माहौल काफी अलग होता। संभव था कि उन पर भी एक सफल पिता की उम्मीदों का भारी दबाव रहता और वे उस सहजता के साथ पढ़ाई नहीं कर पाते जो उन्हें मिली।
आज के विद्यार्थियों और अभिभावकों के लिए महत्वपूर्ण सबक
आकाश संपूर्णानंद पांडे की यह सोशल मीडिया पोस्ट आज के समय में अत्यधिक प्रासंगिक हो गई है। वर्तमान युग में जहां परीक्षाओं के नतीजों को जीवन और मरण का प्रश्न बना दिया जाता है, वहां यह वाकया सिखाता है कि बच्चों को अपने सपने पूरा करने की आजादी देना कितना जरूरी है। असफलता का डर दिखाए बिना जब बच्चों को आगे बढ़ने का अवसर मिलता है, तो वे अपनी पूरी क्षमता के साथ प्रदर्शन करते हैं। माता-पिता द्वारा अपनी अधूरी इच्छाओं को बच्चों पर थोपने के बजाय उन्हें स्वाभाविक रूप से सीखने का अवसर देना ही सफलता का सबसे बड़ा मूलमंत्र साबित होता है।



















